Harmful effects of burning crop residues and management of crop residues

भारत में पहले खेती केवल जीविकोपार्जन के लिए किया जाती थी लेकिन धीरे धीरे खेती ने व्ययसाय का रूप ले लि‍या है।  किसान अधिक उपज प्राप्त करने के लिय अंधाधुंध रासायनिक उर्वरक, कीटनाशकों का प्रयोग कर रहा है जिससे मृदा के साथ-साथ पर्यावरण पर भी हानिकारक प्रभाव हो रहा है फसल अवशेष  को जलना भी एक पर्यावरण तथा मृदा प्रदुषण का महत्वपूर्ण कारण है।

पिछले कुछ वर्षों में एक समस्या मुख्य रूप से देखी जा रही है कि जहां हार्वेस्टर के द्वारा फसलों की कटाई की जाती है उन क्षेत्रों में खेतों में फसल के तने के अधिकतर भाग खेत में खड़े रह जाते हैं तथा वहां के किसान खेत में फसल के अवशेषों को आग लगाकर जला देते हैं।

क्या है फसल अवशेष 

फसल अवशेष पौधे का वह भाग होता है जो फसल की कटाई और गहाई के बाद खेत में छोड़ दिया जाता है। भूसा, तना, डंठल, पत्ते व छिलके आदि फसल अवशेष कहलाते हैं। सरसों, गेहूं, धान, ग्वार, मूंग, बाजरा, गन्ना व अन्य दूसरी फसलों से काफी मात्रा में फसल अवशेष मिलते हैं। सबसे ज्यादा फसल अवशेष अनाज वाली फसलों में तथा सबसे कम अवशेष दलहनी फसलों से मिलते हैं।

खरीफ सीजन में 500 लाख टन फसल अवशेष का उत्पादन होता है। फसल के अवशेषों का सिर्फ 22 प्रतिशत ही इस्तेमाल होता है, बाकी को जला दिया जाता है।

फसलों की कटाई के मौसम में फसल अवशेषों को जलाने तथा इसके मानव स्वास्थ्य पर हो रहे दुष्प्रभाव की खबरें प्राय अखबारों की सुर्खियां बनी रहती है।  वास्तव में ये एक गंभीर समस्या है जिसके लिए बहुत हद खेती की परंपरागत शैली जिम्मेदार है। आपको इस बात की बानगी देखनी है तो पंजाब के गांवों की ओर रूख करना होगा। जहां पर फसल की कटाई के बाद बचे अवशेष जलाने से हवा में लगातार जहर घुल रहा है।

इससे न केवल राज्य के वातावरण में प्रदूषण के स्तर में इजाफा होता है बल्कि स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वर्ष 2014 तथा 2016 में फसल अवशेषों को हरियाणा एवम् पंजाब में जलाने से दिल्ली को प्रदुषण का सामना करना पडा था वह किसी से अछूता नही है चारो तरफ धुयें के कारण घर से बाहर निकलना भी दूभर  हो गया था।

पंजाब के ज्यादातर गांवों में चाहे वह गेहूं या धान की फसल हो, कटाई के अंत में पूरे इलाके में धुएं की चादर फैल जाती है। चारों ओर जहर घुलता धुंआ का साम्राज्य होता है।

इन स्थानों पर किसान अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने से पहले अवांछित पौधों के अवशेषों से छुटकारा पाने के लिए खेत में मौजुद फसल की खूंटी जलाने का विकल्प चुनते रहे हैं। इस पर ज्यादातर किसान कहते हैं कि ये प्रक्रिया एकमात्र व्यवहारिक विकल्प है क्योंकि मशीनों का इस्तेमाल करते हुए वैज्ञानिक तरीके से बची हुई फसल की खूंटी (अवशेषों) का प्रबंधन करना बहुत महंगा है।

फसल अवशेष जलाने के दुष्प्रभाव:-

  • फसल अवशेष जलाने से बढ़ रहा ग्लोबल वार्मिंग- अवशेषों के जलने से ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को बल मिलता है। फसल अवशेष जलाने से ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने वाली व अन्य हानिकारक गैसों जैसे मीथेन कार्बन मोनो आक्साइड नाइट्रस आक्साइड और नाइट्रोजन के अन्य आक्साइड के उत्सर्जन होता है। इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है तथा इसका प्रभाव मानव और पशुओं के अलावा मिट्टी के स्वास्थ्य पर भी पडता है।
  • मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव-फसल अवशेषों को जलाने के कारण मृदा ताप में वृद्धि होती है। जिसके फसलस्वरूप मृदा सतह सख्त हो जाती है एवं मृदा की सघनता में वृद्धि होती है साथ ही मृदा जलधारण क्षमता में कमी आती है तथा मृदा में वायु-संचरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
  • मृदा पर्यावरण पर प्रभाव- फसल अवशेषों को जलाने से मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवों की संख्या पर बुरा प्रभाव पड़ता है और फसल अवशेष जलाए जाने से मिट्टी की सर्वाधिक सक्रिय 15 सेंटीमीटर तक की परत में सभी प्रकार के लाभदायक सूक्ष्म जीवियों का नाश हो जाता है। फसल अवशिष्ट जलाने से केचुएं, मकड़ी जैसे मित्र कीटों की संख्या कम हो जाती है इससे हानिकारक कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण नहीं हो पाता, फलस्वरुप महंगे कीटनाशकों का इस्तेमाल करना आवश्यक हो जाता है। इससे खेती की लागत बढ़ जाती है।
  • मृदा में उपस्थित पोषक तत्वों की कमी-  फसल अवशेषों को जलाने के कारण मिट्टी में पाए जाने वाले पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश एवं सल्फर नष्ट हो जाते हैं, इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। । कृषि वैज्ञानिकों ने एक अनुमान के अनुसार बताया कि एक टन धान के पैरों को जलाने से 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटेशियम तथा 1.2 किलोग्राम सल्फर नष्ट हो जाता है।
  • मृदा में उपलब्ध कार्बनिक पदार्थ में कमी- फसल अवशेष जलाने से मृदा में उपस्थित मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की उपलब्धता में कमी आती है।
  • जानवरों के लिए चारे की कमी-  फसल अवशेषों को पशुओं के लिए सूखे चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है अतः फसल अवशेषों को जलाने से पशुओं को चारे की कमी का सामना करना पड़ता है।

फसल अवशेषों को खेत की मिट्टी में मिलाने के लाभ:-

यदि किसान उपलब्ध फसल अवशेषों को जलाने की बजाए उनको वापस भूमि में मिला देते हैं तो निम्न लाभ प्राप्त होते है-

  • कार्बनिक पदार्थ की उपलब्धता में वृद्धि- कार्बनिक पदार्थ ही एकमात्र ऐसा स्रोत है जिसके द्वारा मृदा में उपस्थित विभिन्न पोषक तत्व फसलों को उपलब्ध हो पाते हैं तथा कम्बाइन द्वारा कटाई किए गए प्रक्षेत्र उत्पादित अनाज की तुलना में लगभग 1.29 गुना अन्य फसल अवशेष होते हैं। ये खेत में सड़कर मृदा कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करते हैं। जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि  फसल अवशेष से बने खाद में पोषक तत्वों का भण्डार होता है। फसल अवशेषों में लगभग सभी आवश्यक पोषक तत्वों के साथ 0.45 प्रतिशत नाइट्रोजन की मात्रा पाई जाती है, जो कि एक प्रमुख पोषक तत्व है।
  • मृदा के भौतिक गुणों में सुधार- मृदा में फसल अवशेषों को मिलाने से मृदा की परत में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढने से मृदा सतह की कठोरता कम होती है तथा जलधारण क्षमता एवं मृदा में वायु-संचरण में वृद्धि होती है। भूमि से पानी के भाप बनकर उड़ने में कमी आती है।
  • मृदा की उर्वराशक्ति में सुधार- फसल अवशेषों को मृदा में मिलाने से मृदा के रसायनिक गुण जैसे उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा, मृदा की विद्युत चालकता एवं मृदा पीएच में सुधार होता हैै तथा फसल को पोषक तत्व अधिक मात्रा में मिलते है।
  • मृदा तापमान-फसल अवशेष भूमि के तापमान को बनाये रखते हैं। गर्मियों में छायांकन प्रभाव के कारण तापमान कम होता है तथा सर्दियों में गर्मी का प्रवाह ऊपर की तरफ कम होता है, जिससे तापमान बढ़ता है।
  • फसल उत्पादकता में वृद्धि -  भूमि में खरपतवारों के अंकुरण व बढ़वार में कमी होती है। फसल अवशेषों को मृदा में मिलाने पर आने वाली फसलों की उत्पादकता में भी काफी मात्रा में वृद्धि होती है।

खेतों के अन्दर सस्यावशेष प्रबन्ध -

फसल अवशेषों को उचित तरीके से प्रबंधन करने पर फसलों को मुख्य और सूक्ष्म पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। फसल कटाई के उपरांत खेतों में पडे़ पैरा या भूसा आदि को गहरी जोताई कर जमीन में दबा देने और उसमें पानी भर देने से फसल अवशेष कम्पोस्ट में बदल जाते है।

फसल की कटाई के बाद खेत में बचे अवशेष घास.फूंस, पत्तियां व ठूंठ आदि को सड़ाने के लिये किसान भाई फसल को काटने के पश्चात 20-25 किग्रा नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़क कर कल्टीवेटर या रोटावेटर से काटकर मिट्टी में मिला देना चाहिये इस प्रकार अवशेष खेत में विघटित होना प्रारम्भ कर देंगे तथा लगभग एक माह में स्वयं सड़कर आगे बोई जाने वाली फसल को पोषक तत्व प्रदान कर देंगे क्योंकि कटाई के पश्चात दी गई नाइट्रोजन अवशेषों में सड़न की क्रिया को तेज कर देती है।

अगर फसल अवशेष खेत में ही पड़े रहे तो फसल बोने पर जब नई फसल के पौधे छोटे रहते हैं तो वे पीले पड़ जाते हैं क्योंकि उस समय अवशेषों के सड़ाव में जीवाणु भूमि की नाइट्रोजन का उपयोग कर लेते है तथा प्रारम्भ में फसल पीली पड़ जाती है अत फसल अवशेषों का प्रबन्ध करना अत्यन्त आवश्यक है तभी हम अपनी जमीन में जीवांश पदार्थ  की मात्रा में वृद्धि कर जमीन को खेती योग्य सुरक्षित रख सकते हैं।

फसल कटाई के बाद अवशेषों को खेतों में ही इकट्ठा कर कम्पोस्ट गड्ढे में या वर्मी कम्पोस्ट टांके में डालकर कम्पोस्ट बनाने के लिए भी उपयोग किया जा सकता है।

फसल अवशेष का उपयोग मशरूम उत्पादन के लिए भी किया जाता है।

खेतों में फसल अवशेष को बिना जलाए बीजों को बोने के लिए जीरो सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल या हैप्पी सीडर आदि बोने वाले यंत्र तथा फसल अवशेष प्रबंधन के यंत्रों का उपयोग किए जाने से बीजों का प्रतिस्थापन उपयुक्त नमी स्तर पर होता है। साथ ही खेतों में ऊपर बिछे फसल अवशेष नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण एवं बीजों के सही अंकुरण के लिए मल्चग का कार्य करते हैं ।

फसल अवशेषों से बोर्ड बनाने के साथ-साथ इसका उपयोग रफ कागज  और पैकेजिंग मटेरियल तैयार करने तथा पशुओं के चारे के रूप में भी किया जा सकता है। इसका उपयोग इथेनाल उत्पादन तथा ऊर्जा उत्पादन में कच्चे माल के रूप में भी हो सकता हैं।

निष्कर्ष

फसल अवशेषों को जलाने से इनसे मिलने वाले लाभों से तो किसान वंचित रह जाते हैं वहीं भूमि की उपजाऊ शक्ति भी कम होती है। क्योंकि भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने वाले जीवाणु आग से जल जाते हैं। फसल अवशेषों को जलाने से नुकसान ही है, कोई फायदा नहीं है। इसलिए इनको जलाना नहीं चाहिए।


 Authors

कविता सिन्हा

डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर ( आत्मा ) कांकेर छत्तीसग़ढ़ 494334

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