Improved cultivation of Fennel through transplanting.

seeds of Fennel or Shonfसौंफ की खेती मुख्य रूप से मसाले के रूप में की जाती हैI सौंफ के बीजो से ओलेटाइल तेल  (0.7-1.2 %) भी निकाला जाता है, सौंफ एक खुशबु धार बीज वाला मसाला होता है | सौंफ के दाने आकार में छोटे और हरे रंग के होते है | आमतौर पर इसके छोटे और बड़े दाने भी होते है | दोनों में खुशबु होती है |

सौंफ का उपयोग आचार बनाने में और सब्जियों में खशबू और स्वाद बढाने में किया जाता है  | इसके आलावा इसका उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है | सौंफ एक त्रिदोष नाशक औषधि होती है | भारत में सोंफ को राजस्थान ( सिरोही, टोंक ) , आंध्रप्रदेश , पंजाब , उत्तरप्रदेश , गुजरात , कर्नाटक और हरियाणा के भागों में उगाया जाता है | इन क्षेत्रों में सौंफ का अधिक मात्रा में उत्पादन होता है |  

सौंफ के लाभ

सौंफ मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होती है | इससे एनीमिया जैसी बीमारी का उपचार किया जाता है | इसके आलावा पेट फूलना, दस्त, कब्ज, गुर्दे पेट का दर्द और साँस की बिमारियों को ठीक करने के लिए सौंफ का उपयोग किया जाता है | यदि किसी व्यक्ति का भोजन उचित प्रकार से नही पच रहा है तो उसे खाना खाने के बाद सौंफ का सेवन करना चाहिए | सौंफ में अनेक औषधिय गुण होते है | मुंह को फ्रेश रखने के लिए या बदबू को दूर करने के लिए सौंफ के साथ चीनी, मिश्ररी मिलाकर खाना चाहिए | सौंफ के पानी को आमतौर पर दवा के रूप में छोटे बच्चों को दिया जाता है |

सौंफ के तेल का उपयोग

सौंफ के तेल का उपयोग साबुन और शेम्पू में सुगंध लाने के लिए किया जाता है | लेकिन इस तेल का अधिक उपयोग पकवान और मिठाई को स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता है |

सौंफ के लिए जलवायु

इसकी खेती शरद ऋतु में अच्छी तरह से की जाती है सौंफ की खेती के लिए शुष्क और ठंडी जलवायु सबसे उत्तम होती है | इस जलवायु में पौधे की वृद्धि उचित प्रकार से होती है | सौंफ की अच्छी उपज केवल मौसम पर ही आधारित होती है | फसल पकते समय शुष्क जलवायु की आवश्यकता पड़ती हैI

सौंफ के लिए भूमि

इसकी खेती सभी प्रकार की मिटटी में की जा सकती है | लेकिन इसकी खेती के लिए दोमट मिटटी सबसे उत्तम मानी जाती है | इसके आलावा चुने से युक्त बलुई मिटटी में भी इसकी खेती की जा सकती है| इसकी अच्छी फसल लेने के लिए भूमि में से पानी का उचित निकास आवश्यक है | रेतीली मिटटी में इसकी खेती नही की जा सकती |

सौंफ  की  किस्मे

क्र.स.

किस्मे

पकने की अवधि ( दिन )

उपज (किवंट्ल/हेक्टेयर)

1

आरएफ 35

220 – 225

12 – 13

2

आरएफ 101

150 – 160

15.5

3

आरएफ 125

110 – 130

17.3

4

गुजरात सौंफ 1

225

12.5

5

अजमेर सौंफ-2

 

 

6

उदयपुर ऍफ़ 31

 

 

7

उदयपुर ऍफ़ 32

 

 


चबाने वाली सौंफ की लखनवी किस्म को परपरागण के 30-45 दीन बाद तुडाई करते है |

खेत की तैयारी  

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में 3 से 4 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके खेत को समतल बनाकर पाटा लगते हुए एक सा बना लिया जाता हैI आख़िरी जुताई में 150 से 200 कुंटल सड़ी गोबर की खाद को मिलाकर खेत को पाटा लगाकर समतल कर लिया जाता हैI इसके आलावा बीजों की बुवाई करने के 30 और 60 दिन के बाद फास्फेट की 40 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर फसल में डालें |

cultivation of Fennelसौंफ की बीज बुवाई

बीज द्वारा सीधे बुवाई करने पर लगभग 9 से 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लगता हैI

अक्टूबर माह बुवाई के लिए सर्वोत्तम माना जाता हैI लेकिन 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक बुवाई कर देना चाहिए I बुवाई लाइनो में करना चाहिए तथा छिटककर भी बुवाई की जाती हैI तथा लाइनो में इसकी रोपाई भी की जाती हैI रोपाई में लाइन से लाइन की दूरी 60 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखनी चाहिएI

सौंफ की रोपाई

पौध दवारा रोपाई करने पर लगभग 3 से 4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लगता है I रोपाई के लिए बीजों को नर्सरी में बोयें | पौधे तेयार करने के लिए 100 वर्ग मीटर भूमि की आवश्यकता होती है । जब पोध 5-6 सप्ताह कि होजाए तब पोध खेत मे रोपण करना चाहीए इसके बीजों को जून या जुलाई के महीने में बोए जब बीजों में अंकुरण हो जाये तो इसे खेत में रोपित किया जाता है | सौंफ के बीजों को हम सीधे खेत बो सकते है | लेकिन यदि इसे पौधशाला में बोकर इसके पौध तैयार कर लें | और इसके पौध की बवाई करें तो इससे हम अधिक और अच्छी गुणवता वाली सौंफ प्राप्त होती है | ओर पौधा छोटा रहता है। जो हवा मे भी नही गिरता |

खाद एव उरवर्क

गोबर की सडी हुए खाद 10-15 टन प्रति हेक्टेर बुवाई के एक माह पूर्व खेत मे डाले ओर उरवर्क की मात्र 80 किलोग्रान नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रति हेक्टेयर देना चाहिएI नत्रजन, फास्फोरस की आधी मात्रा तथा पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय आख़िरी जुताई के समय देना चाहिएI तथा शेष नत्रजन की आधी मात्रा की 1/2 बुवाई के 60 दिन बाद तथा शेष 1/2 भाग 90 दिन बाद खड़ी फसल में देना चाहिएI

सौंफ की सिंचाई

सौंफ की फसल में पहली सिंचाई बुवाई के 5 या 7 दिन के अंतर पर कर देनी चाहिए | इसकी फसल की पहली सिंचाई करने के बाद 15 – 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए | सिंचाई करते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखे कि खेत में पानी का भराव ना हो | यदि खेत में पानी भर जाता है तो इससे फसल और उसके बीज को हानि पंहुचती है | इसलिए खेत में पानी का भराव नहीं होना चाहिए |

खरपतवार की रोकथाम

सौंफ की फसल में खरपतवार जल्दी ही उग आते है | यह इसकी फसल के लिए नुकसानदायक है | इसलिए इसकी फसल में इन खरपतवार को निकालने के लिए बुवाई के 30 दिन के बाद निराई करनी चाहिए | इसके आलावा खेत से खरपतवार को दूर करने के लिए हम खरपतवार नासक दवा (पेंडामेथालिन 1.0 लिटर / हेक्टर, बुवाई पूर्व) का भी प्रयोग कर सकते है | जिस खेत में सौंफ की खेती की जा रही हो उसे हमेशा खरपतवार मुक्त रखना चाहिए |

रोग प्रबंधन

छाछिया रोग (पाउडरी मिल्ड्यू):

यह रोग ‘इरीसाईफी पोलीगोनी  नामक कवक से होता है। इस रोग में पत्तियों, टहनियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है जो बाद में पूर्ण पौधे पर फैल जाता है। अधिक प्रकोप से उत्पादन एवं गुणवता कमजोर हो जाते हैं।
रोकथाम: गन्धक चूर्ण 20-25 किलोग्राम/हेक्टेयर का भुरकाव करें या घुलनशील गंधक 2 ग्राम प्रति लीटर पानी या केराथेन एल.सी.1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार 15 दिन बाद दोहरावें।

जड़ एवं तना गलन:

यह रोग ‘स्क्लेरेाटेनिया स्क्लेरोटियेारम व ‘फ्यूजेरियम सोलेनाई  नामक कवक से होता है। इस रोग के प्रकोप से तना नीचे मुलायम हो जाता है व जड़ गल जाती है। जड़ों पर छोटे-बड़े काले रंग के स्कलेरोशिया दिखाई देते है।

रोकथाम: बुवाई पूर्व बीज को कार्बेण्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करनी चाहिये या केप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से भूमि उपचारित करना चाहिये। ट्राइकोडर्मा विरिडी मित्र फफूंद 2.5 किलो प्रति हैक्टेयर गोबर खाद में मिलाकर बुवाई पूर्व भूमि में देने से रोग में कमी होती है।

झुलसा (ब्लाईट) :

सौंफ में झुलसा रोग रेमुलेरिया व ऑल्टरनेरिया नामक कवक से होता है। रोग के सर्वप्रथम लक्षण पौधे भी पत्तियों पर भूरे रंग के घब्बों के रूप में दिखाई देते है। धीरे-धीरे ये काले रंग में बदल जाते है। पत्तियों से वृत, तने एवं बीज पर इसका प्रकोप बढ़ता है। संक्रमण के बाद यदि आद्र्रता लगातार बनी रहें तो रोग उग्र हो जाता है। रोग ग्रसित पौधों पर या तो बीज नहीं बनते या बहुत कम और छोटे आकार के बनते है। बीजों की विपणन गुणवता का हृास हो जाता है। नियंत्रण कार्य न कराया जाये तो फसल को बहुत नुकसान होता है।

रोकथाम: स्वस्थ बीजों को बोने के काम में लिजिए। फसल में अधिक सिंचाई नही करें। इस रोग के लगने की प्रारम्भिक अवस्था में फसल पर मेंकोजेब 0.2 प्रतिशत के घोल का छिड़काव करें आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन बाद दोहरायें। रेमुलेरिया झुलसा रोग रोधी आर एफ 15, आर एफ 18, आर एफ 21, आर एफ 31, जी एफ 2 सौंफ बोये।
सौंफ की फसल में रेमुलेरिया झुलसा, ऑल्टरनेरिया झुलसा तथा गमोसिस रोगों का प्रकोप भी बहुत होता है जिससे उत्पादन एवं गुणवता निम्न स्तर की हो जाती है। रोग रहित फसल से प्राप्त स्वस्थ बीज को ही बोयें। बीजोपचार तथा फसल चक्र अपनाकर तथा मेन्कोजेब 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव कर कम किया जा सकता है।

सौंफ में कीट प्रबंधन

माहू व पत्ती खाने वाले कीट : इनके नियंत्रण के लिए डाइमिथोएट 30 ई.सी. एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर  छिड़काव करना चाहिएI

फसल की कटाई 

सौंफ की फसल लगभग 160 से 170 दिन में पककर तैयार हो जाती है | इसकी फसल की कटाई उस समय करें जब इसके बीज पूरी तरह से विकसित हो जाए | हलांकि इसके बीज का रंग हरा ही रहता है | इसलिए पहले एक डंडी को तोड्कर उसमे से बीज को निकालकर दोनों हाथों के बीच रगडकर देखे कि ये पूरी तरह से पके चुके है या नही | इसके बाद ही फसल की कटाई करें | इसकी फसल की कटाई लगभग 10 दिन में पूरी कर लेनी चाहिए | 

सौंफ की कटाई के बाद बीज सुखाना

सौंफ की कटाई के बाद सोंफ को 7 से 10 दिन तक छाया में सुखाया जाता है | इसके बाद एक या दो दिन तक धुप में सुखाया जाता है | इसके बीजों को लम्बे समय तक धुप में ना सुखाएं | इससे सौंफ की गुणवत्ता में कमी आ जाती है |

साफ सफाई व ग्रेडींग

सौंफ के बीजों को अच्छी तरह से सुखाने के बाद इसकी सफाई की जाती है | इसके बीजों को साफ करने के लिए वैक्यूम गुरुत्वाकर्षण या सर्पिल गुरुत्वाकर्षण विभाजक नामक यंत्र की सहयता लेनी चाहिए | इसके साफ और अच्छी गुणवत्ता के आधार पर पैक किया जाता है | इसे जुट से बनी ही थैलियो में पैक किया जाता है |

सौंफ की उपज  

सौंफ की उपज 10 से 15 कुंटल प्रति हेक्टेयर होती है और जब कुछ हरे बीज प्राप्त करने के बाद पकाकर फसल काटते है तो पैदावार कम होकर 9 से 10 कुंतल प्रति हेक्टेयर रह जाती हैI


Authors:

*मुकेश नागर वरिष्ट, ** डॉ. बालू राम चौधरी , *** हुकमराज सैनी 

*अनुसंधान अध्येता के.शु.बा.स॰ बीकानेर

**वरिष्ट वैज्ञानिक के.शु.बा.स॰ बीकानेर

***वरिष्ट अनुसंधान अध्येता के.शु.बा.स॰ बीकानेर

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