Different practices of Organic farming

कृषि‍ उत्‍पादों की लगातार बढती जरूरत को पूरा करने के लि‍ए व उत्पादन बढ़ााने के लिए कि‍सान रासायनिक उर्वको का प्रयोग करते है ।  निरंतर रसायनो का उपयोग मानव एवं मृदा के स्वास्थ्य पर बहुत गलत तरीके से असर कर रहा हे।मृदा में क्षारीयता, कार्बनिक तत्वों का प्रमाण कम होना, मृदा, पर्यावरण, जल एवम वायु प्रदूषण जैसे अनिछनीय बदलाव मे रासायनिक उर्वको का भी योगदान है।

रासायनिक उर्वको खेती का खर्च बढ़ा देते हे, इसी लिए किसानो की महेनत का ज्यादा लाभ नहीं मिल पाता। एसी स्थिति मे जैविक खेति एक मात्रा विकल्प हे जो मृदा, मानव को स्वस्थ रखती है, एवं किसानोंको मुनाफा भी देती है।

जैविक खेती की व्याख्या:

कृषि‍ की पद्धति जिसमे रासायनिक उर्वको, किट नाशको तथा खरपतवार नासियो की जगह गोबर, कम्पोस्ट की खाद्य, बेक्टेरिया कल्चर , हरी खाद्य, जैविक कीटनाशीी, जैविक पाक, फसल अवशेषों आदि का उपयोग किया जाता है, उसका मुख्य मकसद मृदा की उर्वरता एवं भूमि की उत्पादक लम्बे समय तक अच्छी और टिकाव बानी रहे, एवम कम खर्च में ज़्यादा उत्पादन प्राप्त हो बिना किसी पर्यावरण और मृदा को हानि पहुचाए । जैविक कृषि की वि‍भि‍‍‍‍न्‍ न क्रि‍याऐं इस प्रकार है।

भूमि उपचार:

बोवाई पूर्व आखिरी जुताई से पहले ट्राइकोडर्मा को भूमि में मिलाइए। ट्राइकोडर्मा एक जैविक फुग है। २।५ किलो ट्राइकोडर्मा पावडर को ५०० किलो गोबर में मिलाकर १०-१५ दिनों तक छाया में रख दे। बोवाई के समय ये मिश्रण को एक हेक्टर भूमि में मिलाकर बाद में बोवाई करे। दीमक की रोकथाम के लिए अंतिम जुताई के समय १२५ किलो एरंडी की खली और १५० किलोग्राम नीम के खली प्रति बीघा के दर से उपयोग करे। एरंडी की खली को खेत में डालने से पहले उस्लो पानीसे गीली लार ले और बाद में सख्त चीज़ से रगड़ कर पावडर के रूप में खेत में डेल ताकि एरंडी की खली का जल्दी विघटन हो जाये।

बीजोपचार

भूमि के साथ साथ बीज को भी जैविक वस्तु ओ के साथ उपचारित करे। उसके कई लाभ हे, जैसे बीज का स्फुरण बढ़ेगा, एवम किटको और बीज आधारित रोगो का निंयत्रण होगा।

नाइट्रोजन जीवाणु के लिए दलहनी फसलों जैसे उड़द, मूँग, चना, मोठ जैसे कठोल पाको में राइजोबियम कल्चर तथा अनाज वाली फसलों में एजोटोबेक्टर से उपचारित करे। बीज उपचार के बाद बीजो को छायादार जगह में सुकाये। उपचारित बीजो की बुवाई सूखने के तुरंत बाद कर देनी चाहिए।

पौध जड़ उपचार विधि

धान तथा सब्जी वाले फसले जिनके पौधों की रोपाई की जाती हैं, जैसे टमाटर, पत्तागोभी। फूलगोभी, बेंगन, प्याज जैसी फसलों में पौधों की जड़ो को जैव उर्वरको द्वारा उपचारित किया जा सकता है। इसीलिए किसी बड़े बर्तन में जीवाणु खाद्य लेके नर्सरी के पौधों को उखाड़कर जड़ो को मिटटी से साफ करकर पौधों को जीवाणु खाद्य में १० मिनट तक डूबकर रखे। उसके बाद तुरंत रोपाई करे।

कन्द उपचार विधि

आलू, अदरख, अरबी, गणना जैसी कन्द फलो को १० मिनट २०-३० लीटर जैव उर्वरको में थोड़ी देर दबाकर बादमे बुवाई करने से काफी फायदे होते हैं।

पोषक तत्व प्रबंधन

गोबर खाद्य, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, हरी खाद्य जैसे जैविक खाद्य जैविक खेती में पोषक तत्व प्रबंधन करते है। फसलों के अवशेषों, अनुपयोगी जैव पदार्थो का उपयोग कम्पोस्ट बनाने के लिए करे जो पौधों को पोषण देता है।

खरपतवार नियंत्रण

जैविक कृषि विधियों जैसे की खरपतवार बीज रहित फसल बीजो का उपयोग, कृषि यंत्रो की साफ सफाई, मजदूरों द्वारा खरपतवार नियंत्रण, संचाई में उपयोग होए वाली नलियों की साफ सफाई, जैविक खरपतवार नाशको का उपयोग किया जाता हैं। प्रोटोजोआ, कवक, परजीवी किटक जैसे परमुह बायो एजंटका उपयोग भी किया जा सकता है।

कीट प्रबंधन

फसल में मित्र कीट एवम परजीवी कीट छोड़े।
लेडी बर्ड बीतल, क्राइसोपा, हरतीला सफ़ेद मक्खी, थ्रिप्स, माइट, पीड़ के अंडो को प्रथम अवस्था में ही खा जाते है।
ट्राइकोग्रामा एक परजीवी किटक हैं, जो इल्लियों के अनडू के ऊपर रहकर अपना जीवन समाप्त करता है।
पत्येक पाक में अलग अलग ट्रैप फसल होती है जिसको उगाए। हरी सुंडी के निंयत्रण के लिए जैसे की चने के साथ गेंदा
फैरोमॉन ट्रैप एवम प्रकाश पाश (५-८ प्रति हैक्टर) का उपयोग करे। वो रात्रि में निकलने वाले किटको आकर्षित कर के नष्ट करता है। जैसे की, कातर, हरी सुंडी, बीटल्स।
हरी सुंडी को नष्ट करने के लिए निम् के तेल का ५ मिलीलीटर/ लीटर पानी लेकर छंटकाव करे,एवम अमेरिकन सुंडी के लिए ऍन।पी।वी। २५० एल।इ।का छिंडकाव करे ।
सुंडी ओ के नियंत्रण के लिए बी।टी। की एक किलोग्राम मात्रा को ५०० लीटर पानी में घोल कर छिंडकाव करे ।
निमेटोड के नियत्रण के लिए नीम की खली १ टन प्रति हेक्टर बोवाई से पहले खेत में डाले।
कड़ी फसलों मे डिमक की रोकथाम के लिए नीम का तेल ४ लीटर प्रति हेक्टर बोवाई पूर्व खेत में डाले।
बिवेरिया बेसियाना और मेटाराइज़ियम ऐनीसोपालाएई सुंडीयो, दीमक, सफ़ेद लट को नियंत्रित करती हैं। २।५ किलो बावेरिया को १०० किलो गोबर की खाद में मिलाकार भूमि में डाले।
इसके अलावा मट्ठे के गोमूत्र, आधा किलो छिला हुवा लहसुन, आक/नीम/धतूरे के मिश्रण से जैविक कीटनाशक तैयार करके भी किटको का नियत्रण कर सकते है।

फसल अवशेष प्रबंधन

जैविक खेती के अंतर्गत फसलों के अवशेष को खेत में ही सड़ा दिया जाता है, जिससे मृदा में अव्घतन से कार्बन की मात्रा बढ़ती हैं। एवं मृदा की संरचना में सुधार होता है। फसल अवशेषों को जलने से पर्यावरण प्रदूषित होता है। इससे अच्छा खेत में ही सड़ा दिया जाये।

पौध-व्याधि प्रबंधन

गेहू में बीजो को तेज धुप में दोपहर के १२ से ५ बजे तक सुखाये।
बीज को २० % नमक के पानी में डुबाकर बाद में सुखाकर उपयोग करे।
बीज को गरम पानी में डुबाकर भी रोग का नियत्रण किया जा सकता हे।
ट्राईकोडर्मा, स्यूडोमोनास जैसे जैविक नियंत्रको कोलर रॉट, रोगो में उपयोगी है।

जैव उर्वरक के प्रयोग में राखी जाने वाली सावधानियां:

जैव उर्वरक को कायम में सूखे स्थान पर रखे।
फसल के अनुसार ही जैव उर्वरक का चुनाव करे।
उचित मात्रा में ही उपयोग करे।
जैव उर्वरक को रसयांकिक किट नाशक के साथ उपयोग न करे।
जैव उर्वरक का प्रयोग समाप्ति की तिथि के पश्चात न करे।
जैव उर्वरक खरीदते समय उर्वरक का नाम बनाने की विधि एवम फसल का नाम इत्यादि ध्यान से देख ले।


Authors
Ginoya Aarti V1 and Delvadiya Indrajay R2, Bavisa Rupa V3
Department of Seed science and Technology1
Department of Genetics and Plant Breeding2
Department of Agricultural Entomology3
College of agriculture, Junagadh agriculture university, junagadh (362001) Gujarat, India
E-mail- aartiginoya3347@gmail।com