Author: Keshav Kshirsagar

गेहूँ उत्पादन की आधुनिक सस्य तकनिकी  देश में लगभग 3.02 करोड़ हेक्टेअर क्षेत्रफल से 9.68 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हो रहा है। देश की बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वर्ष 2030 के अन्त तक 28.4 करोड़ टन गेहूँ की आवश्यकता होगी। इसे हमे प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण, भूमि, जल एवं श्रमिक कमी तथा उत्पादन अवयवों के बढ़ते मूल्य के सापेक्ष प्राप्त करनी होगी। उत्तर प्रदेश के वर्ष 2001-02 से वर्ष 2016-17 के गेहूँ उत्पादन एवं उत्पादकता के आंकड़ो से स्पष्ट है, कि इसमें एक ठहराव सा आ गया है। जिसको हम मुख्य रूप से उन्नतशील बीज, पोषक तत्व, नाशीजीव, खरपतवार एवं जल प्रबन्ध को एक साथ समायोजित कर ही...

फलों की फसल के सुधार में पादप विकास नियामकों की भूमिका Plant growth regulators refer to an organic compound other than nutrients and vitamins which are active at low concentrations in promoting, inhibiting or modifying growth and development. The naturally occurring (endogenous) growth substances are commonly known as plant hormones, while the synthetic ones are called growth regulator. Plant hormone is synthesised in one part of the plant and translocated to another part, where in very low concentrations it causes a physiological response. The plant hormones are identified as promoters (auxins, gibberellin and cytokinin), inhibitors (abscissic acid and ethylene) and other hypothetical growth substance (florigen, flowering hormone, etc). Application of plant growth regulators results...

Monthly agricultural  activities for vegetable availability throughout the year आधुनिक युग में बढ़ते हुए जनसंख्या के पोषण हेतु सब्जी की माँग दिन-प्रति बढ़ती जा रही है अत: किसान भाई प्रति माह में कि जाने वाली कृषि कार्य को अपनाकर अपनी आय कई गुना तक बढ़ा सकते हैं वैसे तो बहुत सी सब्जी फसलों की बुवाई के समय को किसान भाई बाजार की माँग एवं भूमि की उपलब्धता के अनुसार परिवर्तित कर लाभ कमाते है प्रस्तुत कार्यक्रम व्यवसायिक खेती के साथ-साथ गृह उद्यान के लिए भी काफी लाभप्रद है ! प्रति माह में किये जाने वाले कृषि कार्य:- माह सब्जियाँ कृषि कार्य फरवरी आलू खुदाई कद्दू वर्गीय सब्जियाँ बीज की बुवाई भिण्डी, लोबिया, ग्वार एवं अरवी बीज की बुवाई मटर तैयार फलियों की तुड़ाई टमाटर, बैंगन...

Biofortification technology to improve food security and fight malnutrition सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी शरीर को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करती है जिसे दूसरे शब्दों में कुपोषण भी कहते हैं।  कुपोषण हमारे दैनिक आहार में पोषक तत्वों की कमी के कारण होता है। दुनिया की लगभग आधी आबादी को अपने आहार में सूक्ष्म पोषक तत्वों, प्रोटीन, विटामिन और अन्य आवश्यक तत्वों की कमी का सामना करना पड़ता है। कुपोषण मानव की क्षमता के विकास में बाधक तो है ही उसके साथ-साथ ये देश में खासकर औरतों एवं बच्चों के आर्थिक एवं सामाजिक विकास को भी रोकता है। मनुष्यों को उनकी सेहत के लिए कम से कम 22 खनिज तत्वों की आवश्यकता होती...

अफारा रोग: पशुओं में आकस्मिक मौत का प्रमुख कारण  जुगाली करने वाले पशुओं में अफरा एक आम समस्या है । इनके रुमेन (पेट) में पाचन के दौरान गैस का बनना एक सामान्य प्रक्रिया है तथा यह गैस थोड़े थोड़े अंतराल पर  मुँह के रास्ते से हमेशा निकलती रहती है । परन्तु जब किसी कारण बस गैस बाहर नहीं निकल पाती है, तब गैस भरने की वजह से पेट फूल जाता है। इस अवस्‍था अफारा कहते है। अफारे के कारण पशु की कृति या छायाचित्र बदल जाती है और पशु को साँस लेने में परेशानी होती है। कुछ पशुओं में तीव्र अफरा की वजह से आकस्मिक मृत्यु भी हो जाती है । अफरा दो तरह...

Management practices to Protect the rabi crops from untimely, excessive rain पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि रबी फसल के समय असामयिक वर्षा या अधिक वर्षा के कारण फसलों को भारी नुकसान पहुंचता है। इन परिस्थितियों में फसल को बचाने के लिए निम्नलिखित तुरंत एवं दूरगामी प्रबंधन की अवश्यकता होती है इन प्रबंधन क्रि‍याओं को किसान भाई अपनी जरूरत, परिस्थितियों एवं सोहलियत के अनुसार अपनाकर रबी फसलों को बचा सकतेे है या नुकसान को कम कर सकते है । खेत समतलीकरणः- असमतल खेत के विभिन्न भागों में पानी की कमी अथवा पानी की अधिकता होना दोनों ही स्थितियों में ये फसलों को नुकसान पंहुचाता है। खेतों के उंचा-नीचा होने के...

Water requirements of major crops and their critical states फसलों से अधिक व अच्छी पैदावर लेने के लिये उनकी सिंचाई के लिये विभिन्न क्रांतिक अवस्थाओं पर मृदा में पर्याप्त मात्रा में नमी का होना अति आवश्यक है। फसलो में क्रांतिक अवस्थाए वे अवस्थाएं कहलाती है, जिन पर फसलों में सिंचाई करने या न करने से पैदावार में प्रभाव पडता है अर्थात सिंचाई करने से पैदावार में आशातीत बढोतरी होती है और इन क्रांतिक अवस्थाओं पर फसलो में सिंचाई न करने से पैदावर में कमी आती है। इसके साथ साथ फसलों में उचित समय पर सिंचाई न करने से भी पौधों की उचित वृद्धि नहीं हो पाती जिसका पैदावार पर प्रतिकुल प्रभाव पड्ता...

वैज्ञानिक खेती के उन्‍नत तरीकों को अपनाकर गेहूं का उत्पादन बढ़ाऐं  भारत में गेहूँ की खेती करीब 27 मिलियन हेक्टेयर में होती हैं, विगत 40 वर्षों में देश में गेहूँ उत्पादन में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की हैं और भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूँ उत्पादक देश बन गया हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या को ध्यान में रखकर इस बात का अनुमान लगाया जा रहा हैं की अन्न की मांग प्रतिवर्ष 2% बढ़ेगी। इस मांग को पूरा करने के लिए उत्पादकता को बढ़ाना होगा, क्योंकि क्षेत्रफल के बढ़ने की संभावना नहीं के बराबर हैं। राजस्थान में गेहूँ का उत्पादन एवं उसका लाभांश, खेती की लागत के अनुरूप नहीं हैं। उन्नत तकनीको के प्रयोग...