23 Jan सफल ऊंट पालन में सूक्ष्म जीवों की भूमिका
The role of microorganisms in successful camel farming
सूक्ष्मजीव बहुत छोटे जीव होते हैं, जिन्हें देखने के लिए माइक्रोस्कोप यानी सूक्ष्मदर्शी का उपयोग किया जाता है। सूक्ष्मजीव बहुत प्रकार के होते हैं, इनमें जीवाणु यानी बैक्टीरिया, विसाणु यानी वायरस, कवक या फफूंद यानी फंगी व एककोसी यानी प्रोटोजोआ इत्यादि शामिल होते हैं।
सूक्ष्मजीव हर जगह पाए जाते हैं, हवा में, पानी में, मिट्टी में और तो और हमारे व अन्य जीवों के अंदर भी। अक्सर हम सूक्ष्मजीव का संबंध बीमारी करने वाले जीव के रूप में रखते हैं, पर वास्तविकता में हर सूक्ष्मजीव बीमारी पैदा नहीं करता, ज्यादातर सूक्ष्मजीव अच्छे होते हैं, व किसी न किसी रूप में हमारी मदद करते हैं। सूक्ष्मजीव ऊंट के शरीर में हर जगह पाए जाते हैं, उनके बाहरी अंगों में भी व उनके भीतरी अंगों में भी।
बाहरी अंगों जैसे उनकी त्वचा में, थनों में, उनके मुंह में, खुर में वह भीतर उनकी आंतों में, पेट में, थूक में इत्यादि। इसके अलावा ऊंट के दूध, मल-मूत्र में भी तरह-तरह के सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं।
सूक्ष्मजीवों का ऊंट पालन में महत्व
सूक्ष्मजीव ऊंट के भोजन को पचाने में मददगार होते हैं। ऊंट कठिन, रेशेदार वनस्पतियां जैसे कंटीली झाड़ियाँ, सूखी घास, नमकयुक्त पौधे, वृक्ष की छाल, और सूखा चारा खाते हैं। इन पौधों में उपस्थित जटिल कार्बोहाइड्रेट मुख्यतः सैलूलोज, हेमीसेल्युलोज, लिग्निन को ऊंट स्वयं नहीं पचा सकते हैं। उनके पेट के पहले भाग (जिसे की रूमेन कहते हैं) में लाखों प्रकार के सूक्ष्मजीव रहते हैं, जो इन जटिल कार्बोहाइड्रेट और अन्य जटिल रेशों को तोड़कर आंतों द्वारा अवशोषित करने योग्य छोटे यौगिकों में बदलते हैं, व वाष्पशील वसा अम्ल (जिसे Volatile Fatty Acid कहते हैं) का निर्माण करते हैं, जिससे ऊंट को ऊर्जा मिलती है। और क्योंकि वाष्पशील वसा अम्ल के चयापचय (यानी मेटाबॉलिज्म) से पानी भी उत्पन्न होता है, यह भी एक माध्यम है जिससे ऊंट बिना पानी के भी लंबे समय तक रह सकते हैं।
सूक्ष्मजीवों के कारण ऊंट के रूमेन में भोजन का अवधारण (रिटेंशन) समय भी ज्यादा होता है, जिससे फाइबर युक्त भोजन का पाचन बेहतर रूप से होता है—यह गुण ऊंट को अन्य पशुओं से भिन्न बनाता है।
ऊँट के आंतों में रहने वाले सूक्ष्मजीव जलवायु और आहार के अनुसार अपने कार्य में बदलाव कर लेते हैं। गर्मी, लंबा उपवास या सीमित चारा उपलब्ध होने पर:
– सूक्ष्मजीव धीमे पाचन क्रियाओं को तेज करते हैं।
– वे मेथेन उत्सर्जन को नियंत्रित करते हैं, जिससे ऊर्जा की हानि कम होती है।
– ऊर्जा और जल संरक्षण की प्रक्रिया बेहतर होती है।
इस कारण, ऊँट महीनों तक बगैर पानी के रह सकता है और फिर भी उसका शरीर संतुलन बनाए रखता है।
सूक्ष्मजीव विटामिन B12, विटामिन B6, विटामिन K और कुछ अमीनो एसिड्स जैसे पोषक तत्वों का संश्लेषण भी करते हैं, जिन्हें की ऊंट का शरीर स्वयं नहीं बना सकता। इसके अलावा, ये सूक्ष्मजीव खनिजों (जैसे कि कैल्शियम, फास्फोरस) के अवशोषण को भी आसान बनाते हैं।
जंगल या झाड़ियों में मिलने वाले कुछ जहरीले पौधों के तत्वों को ये सूक्ष्मजीव शरीर के लिए सुरक्षित बना देते हैं।
सूक्ष्मजीव ऊंट की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं, लाभकारी सूक्ष्मजीव रोगजनक या हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पेट व आंत में बढ़ने से रोकते हैं, व उनके प्रति प्राकृतिक सुरक्षा दीवार के रूप में कार्य करते हैं। कुछ सूक्ष्मजीव ऐसे योगिक बनाते हैं जो शरीर की रक्षा प्रणाली को सक्रिय करते हैं जिसकी वजह से ऊंट में दस्त, पेट संबंधी समस्याएं व अन्य बाह्य संक्रमणों व बीमारियों की संभावनाएं भी कम हो जाती है।
सूक्ष्मजीवों का ऊंट पालक के जीवन महत्व
1) कम खर्चे में ऊंट को पोषण देना संभव – ऊँट के पेट में मौजूद सूक्ष्मजीव कठोर, सूखा और रेशेदार चारा भी पचा सकते हैं। इससे ऊँट पालकों को महंगे और पौष्टिक चारे की जरूरत नहीं पड़ती,और वे कम लागत में पशुपालन कर सकते हैं।
2) ऊंट की बेहतर सेहत – सूक्ष्मजीव पाचन को मजबूत करते हैं, रोगों से लड़ने की ताकत बढ़ाते हैं, आंतों की सफाई और संतुलन बनाए रखते हैं। इससे ऊँट कम बीमार पड़ता है, इलाज पर खर्च कम होता है, और पशु का कार्यकाल भी लंबा होता है।
3) दूध की गुणवत्ता में सुधार – ऊंटनी के दूध में भी सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं, जिनमें से एक अच्छे समूह को लेक्ट्रिक एसिड बैक्टीरिया के नाम से जाना जाता है, जिनमें लैक्टोबैसिलस, बिफीडोबैक्टीरियम, एंटरोकोकस और स्ट्रेप्टोकोकस की प्रजातियां शामिल है। यह जीवाणु प्राकृतिक तरीके से ऊंटनी के दूध को लंबे समय तक संरक्षित करते हैं। इन सूक्ष्मजीवों में प्रोबायोटिक गुण होते हैं, जो आंत के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, रोगाणुओं से सुरक्षा प्रदान करने में मददगार है, व मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। आजकल मानव में स्वास्थ्य जागरूकता को ध्यान में रखते हुए प्रोबायोटिक दूध की मांग बढ़ रही है, इसलिए ऊंटनी के दूध की विपणन और प्रसंस्करण (मार्केटिंग और प्रोसेसिंग) से ऊंट पालक अब अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं।
4) प्रजनन क्षमता में सुधार – सूक्ष्मजीवों का संतुलन, हार्मोन संतुलन और पोषण में मदद करता है। इससे ऊँटों की प्रजनन क्षमता में वृद्धि होती है। इसका अर्थ है, ज़्यादा ऊँट के बच्चे और अधिक पशुधन।
5) रोग नियंत्रण व उपचार में मदद – वैज्ञानिक रूप से यह पाया गया है कि कुछ रोग जैसे डायरिया, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन आदि में सूक्ष्मजीवों की भूमिका प्रमुख होती है। सही सूक्ष्मजीवों का प्रबंधन करके रोगों की रोकथाम संभव है। इससे ऊँट पालकों को कम दवाओं और कम पशु चिकित्सकीय खर्च का लाभ मिलता है।
6) पर्यावरण सहनशीलता बनाए रखना – ऊँटों के पेट के सूक्ष्मजीव ऊष्मा, पानी की कमी और कठिन परिस्थितियों में भी सक्रिय रहते हैं। ये सूक्ष्मजीव ऊँट को लंबी यात्रा, गर्मी और भूख में जीवित रखने में मदद करते हैं। किसान बिना विशेष देखभाल के ऊँटों को लंबे समय तक काम में ले सकते हैं, जैसे परिवहन या रेगिस्तानी यात्रा।
7) मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाना – इनके अलावा ऊंट का गोबर भी सूक्ष्मजीवों से भरपूर होता है, जिनके अनेक लाभकारी प्रभाव होते हैं। ये सूक्ष्मजीव जैविक खाद के रूप में मिट्टी में डाले जाने पर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, और उसमें कार्बनिक पदार्थ एवं पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन पहुँचाते हैं, जिससे फसलों की वृद्धि में सहायता मिलती है।
इसके अलावा, ऊंट के मल में मौजूद कुछ जीवाणु जैसे सल्फेट–रिड्यूसिंग बैक्टीरिया पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण धातुओं के यौगिकों का निर्माण करने में सक्षम होते हैं, जो भूमि की जैव–रासायनिक गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। यही सूक्ष्मजीव, खेतों में फसलों के लिए आवश्यक खनिजों की उपलब्धता को भी बढ़ा सकते हैं, जिससे पौधों को बेहतर पोषण मिलता है।
इस प्रकार, ऊंट के मल में उपस्थित सूक्ष्मजीव कृषि एवं पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन के लिए लाभकारी सिद्ध होते हैं। यह सूक्ष्मजीव बायोगैस के उत्पादन में उपयोगी है, व सूखने के बाद इसे ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ऊंट के गोबर व मूत्र में मिलने वाले सूक्ष्मजीव की मदद से जैविक खाद तैयार की जा सकती है, जिससे किसान न सिर्फ अपनी जमीन की उर्वरता बढ़ा सकते हैं, बल्कि महंगे केमिकल फर्टिलाइजर पर भी निर्भरता घटा सकते हैं।
ऊंट के पेट में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों के प्रभावित होने के कारण व इनका संतुलन बनाए रखने के उपाय
1) आहार – ऊंट का भोजन उसकी आंत और पेट में मौजूद सूक्ष्मजीवों की विविधता व संतुलन को सबसे अधिक प्रभावित करता है, किसी नए या बदलते आहार पर जाने से ऊँट के पेट के सूक्ष्मजीवों में भी त्वरित बदलाव आ सकते हैं, जिससे पोषक तत्वों की उपलब्धता, पाचन और प्रतिरक्षा पर असर पड़ता है। इसलिए सूक्ष्मजीवों का संतुलन बनाए रखने के लिए झाड़ियां, घास, अनाज आदि विभिन्न वनस्पति खाद्य पदार्थ का मिश्रित सेवन करवाना चाहिए, जिससे पेट में विविध प्रकार के सूक्ष्मजीव फल–फुल सके।
2) एंटीबायोटिक का उपयोग – ऊंट मे एंटीबायोटिक के दुरुपयोग या अनावश्यक प्रयोग से सूक्ष्मजीवों में प्रतिरोधी जीवाणु का विकास होता है, इससे पूरे सूक्ष्मजीव समूह की संरचना तथा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। ऐसे जीवाणु पर्यावरण में फेलकर अन्य जीवन को भी प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए ऊंट पालक अनावश्यक एंटीबायोटिक का प्रयोग ना करें और डॉक्टर की सलाह पर ही दवाएँ दे।
3) प्राकृतिक आवास एवं भौगोलिक क्षेत्र – ऊंट कहां रहते हैं, उस स्थान की जलवायु, मिट्टी व जल स्रोत भी उनके पेट के सूक्ष्मजीवों को प्रभावित करते हैं। इसलिए ऊंट को साफ पानी, साफ वातावरण और खुला व विविध वृक्ष/ झाड़ियां वाले क्षेत्रों में चराई करवाकर उनके अंदर के लाभकारी सूक्ष्मजीवों का स्वस्थ विकास करें। चराई उपलब्ध न हो तो वहाँ समय-समय पर प्रोबायोटिक फीड सप्लीमेंट दें।
4) दवा, तनाव और स्वास्थ्य स्थिति – यदि ऊंट बीमार होते हैं या अन्य दवा ली जाती है तो भी सूक्ष्मजीवों का संतुलन बदल सकता है, संक्रमण व तनाव भी जैव विविधता घटा सकते हैं। इसलिए ऊंट के निवास स्थान व आसपास के वातावरण का उचित प्रबंधन ऊंट के स्वास्थ्य और उसके जैविक संतुलन के लिए जरूरी है।
5) दूध और दूध उत्पादों को साफ–सुथरे तरीके से निकालें और रखें ताकि फायदेमंद बैक्टीरिया रहें और नुकसानदायक सूक्ष्मजीवों से बचाव हो सके।
ऊंट की गतिविधियों की जानकारी रखकर ऊंट पालक ऊंट के अंदर सूक्ष्मजीव का संतुलन परख सकते हैं जैसे की ऊंट का सक्रिय, चुस्त होना , चमकदार बाल व स्वस्थ त्वचा होना, ऊंट का गोबर सामान्य होना (ना ज्यादा पतला ना ज्यादा ठोस), ऊंट में खाना खाने की इच्छा बरकरार होना, ऊंट में अधिक दूध उत्पादन होना, बीमारी में जल्दी सुधार होना
निष्कर्ष
ऊंट पालन में सूक्ष्मजीव एक अहम भूमिका निभाते हैं, इनके दूध, मल-मूत्र, एवं शरीर में पाए जाने वाले अनेक सूक्ष्मजीव समुदाय न केवल स्वयं ऊँट को कठोर वातावरण में पनपने, पोषक तत्वों को कुशलतापूर्वक निकालने और बीमारियों से बचाने में मदद करता है, बल्कि इनका मानव स्वास्थ्य व पशु–पालन में भी बहुमूल्य योगदान है। जिन किसानों के पास ऊंट है उन्हें इसकी देखभाल के साथ–साथ सूक्ष्मजीवों के महत्व को भी समझना चाहिए। सूक्ष्मजीव का संतुलन बनाए रखना जरूरी है, इससे न केवल ऊंट स्वस्थ रहेगा बल्कि दूध की गुणवत्ता, दूध की मात्रा और खेत की उर्वरता में भी वृद्धि संभव हो सकेगी।
Authors:
डॉ अरुणा कुनियाल1, डॉ कार्तिक भट्ट2, डॉ विश्व रंजन उपाध्याय1, डॉ स्वागतिका प्रियदर्शनी1, डॉ राकेश रंजन1