30 Sep फसल विविधीकरण꞉ संसाधन संरक्षण एिं कृ वि स्थिरता
फसल विविधीकरण कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने की महत्वपूर्ण रणनीति है। जानिए इसके लाभ, उपाय, रणनीतियाँ और विभिन्न फसल प्रणालियों की भूमिका।...
फसल विविधीकरण कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने की महत्वपूर्ण रणनीति है। जानिए इसके लाभ, उपाय, रणनीतियाँ और विभिन्न फसल प्रणालियों की भूमिका।...
धान के खेत में मछली पालन यानी Rice Fish Farming खेती का ऐसा तरीका है जिसमें किसान धान की फसल के साथ उसी खेत के पानी का इस्तेमाल मछली पालन के लिए भी करता है। सही खेत और सही प्रबंधन हो तो एक ही जमीन से धान के साथ मछली का अतिरिक्त उत्पादन लिया जा सकता है। इसी वजह से पिछले कुछ वर्षों में Rice Fish Farming, Paddy Fish Farming और Integrated Rice-Fish Farming जैसे तरीकों पर किसानों और कृषि संस्थानों का ध्यान बढ़ा है। यह कोई नया विचार भी नहीं है। भारत में paddy-cum-fish culture पर वैज्ञानिक स्तर पर कई दशकों से काम किया जा रहा है। ICAR के दस्तावेजों में paddy-cum-fish culture के package of practices के विकास का उल्लेख 1970 से मिलता है। लेकिन एक बात शुरुआत में साफ समझ लेना जरूरी है। धान के खेत में मछली डालने का मतलब यह नहीं है कि हर किसान की कमाई अपने आप दोगुनी हो जाएगी। फायदा खेत में पानी की उपलब्धता, मछली की प्रजाति, stocking, मछली की survival और growth, चारा, श्रम, धान की खेती की लागत और स्थानीय बाजार भाव पर निर्भर करता है। सीधी बात: Rice-Fish Farming का फायदा यह है कि किसान एक ही खेत और पानी से एक से ज्यादा उत्पादन लेने की कोशिश करता है।...
Coconut based cropping system for income generation and nutrition of farmwomen 60% से अधिक जनसंख्या की आजीविका का मुख्य साधन कृषि है। भारत में कृषि क्षेत्र में लगभग 85% महिलाएँ शामिल हैं। ऊंचे पहाड़ों से लेकर गहरी घाटियों तक लगभग सभी कृषि-जलवायु स्थितियों में महिलाएं खेती में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में कृषि उत्पादन और पद्धतियाँ अलग-अलग हैं इसलिए किसानों और कृषक महिलाओं की भूमिका भी अलग-अलग है। तटीय भारत में महिलाओं के लिए नारियल की खेती एक महत्वपूर्ण आजीविका विकल्प है। ओडिशा में नारियल का क्षेत्रफल 50910 हेक्टेयर है और कुल उत्पादन 32838 मिलियन नारियल है, जो क्षेत्रफल और उत्पादन में भारतीय राज्यों में पांचवें स्थान पर है। नारियल का लगभग 60% क्षेत्र और उत्पादन पुरी, गंजम, कटक, बालासोर और नयागढ़ के तटीय जिलों के अंतर्गत आता है। ओडिशा में नारियल की उत्पादकता 6451 नट/हेक्टेयर है, जो भारत में नारियल उत्पादकता की तुलना में कम है। नारियल की खेती किसान परिवारों को आय के अलावा पोषण, ईंधन, फाइबर भी प्रदान करती है। यह भोजन, पेय पदार्थ, तेल, फाइबर, लकड़ी और कई स्वास्थ्य उत्पादों का स्रोत है। नारियल के स्वास्थ्य और पोषण लाभ को कम नहीं आंका जा सकता क्योंकि इसके तेल में कोलेस्ट्रॉल नहीं होता है और यह आसानी से पच जाता है। इसमें विटामिन ई होता है और यह लॉरिक...
How to do mixed farming of creeper vegetables with yam ओल एक प्रमुख कन्दीय फसल है, भारतवर्ष में इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसेः जिमीकन्द (हिन्दी) ओल (बंगाली), सूरन (गुजराती),कन्द (तेलगु), करनाईकिलंगु (तमिल), सवर्णगही (कन्नड़) तथा चीना (मलयालम) आदि परन्तु बिहार में इसे केवल ओल के नाम से जाना जता है। इसके कन्द से सब्जी, आचार तथा हरे पते का उपयोग अनेक प्रकार के व्यंजन बनाने में किये जाते हैं इसी प्रकार लतेदार सब्जी का भी उपयोग सालोभर किया जाता है। अगस्त-सितम्बर माह में जब बाजार से हरी सब्जी की उपलब्धता कम हो जाती है तो इसे एक वैकल्पिक सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है। ओल की खेती आंशिक छाया में भी किया जा सकता है। इसीलिए ओल के साथ किसी प्रकार की लतेदार सब्जी की मिश्रित खेती किया जा सकता है जो प्रभेद 60-70 दिनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं जैसेः स्पंज गार्ड, खीरा, करैला,कैता, स्नेक गार्ड, लोबिया, आदि। ओल के साथ सब्जी की मिश्रित कर किसान बंधू एक ही खेत से अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते है क्योंकि लातेदार सब्जी वाले पौधे को अलग से किसी भी प्रकार के उर्बरक देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है इस फसल को पोषक तत्त्व की आपूर्ति ओल में उपयोग की जाने वाली उर्वरक से हो जाते हैं।...
सजावटी पत्तेदार पौधे वयस्क तेल ताड़ के बागानों के लिए आदर्श अंत: फसलें Ornamental plants grown for foliage or leaves are called cut foliage plants or greens. Background and shape of the flower arrangements are mainly decided by foliage. Most of the foliage plants are perennial in nature, common ornamental garden/ indoor plants, shade loving and shade tolerant and they can up well under dense shady environments. Oil palm (Elaeis guineensis Jacq.) is the fasting growing plantation cum oil seed crop which is grown to extent of 4.00lakh ha in the country. It is a perennial crop with a productive life of 30 years and yields about 5 tonnes palm oil per hectare. Grown up oil palm utilizes only 40% area for its growth and production and rest of the area (60%) remains vacant which offers the scope for efficient use of natural resources like space, sun light and aerial environment through inter cropping. However, the major constraint in grown up oil palm plantation is incidence of poor sun light which hardly ranges from18-25% which offers the scope for shade loving crops to some extent. Studies at ICAR-Indian Institute of Oil Palm Research, Pedavegi, Andhra Pradesh revealed that foliage plants like fish tail fern, asparagus, fox tail fern, ti plant, philodendron, dracaena, dumb...
पोपलर के साथ सहफसली खेती से किसानों को दोगुना मुनाफा By growing trees in agricultural crops, farmers can increase their income as well as improve the fertility of the land and the deteriorating environment. By planting poplar tree saplings, one can earn good profit from them in 6 to 7 years. Due to falling of its leaves in winter, the damage to rabi crops is reduced. The poplar tree grows straight, so its shade rarely harms even the Kharif crops. All rabi or kharif crops can be grown with poplar in the first two years. पोपलर के साथ सहफसली खेती से किसानों को दोगुना मुनाफा भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां आज भी किसान खेती-किसानी से जुड़कर अपनी आजीविका (livelihood) चलते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से किसानों की आय को दोगुना करने की मुहिम में काफी तेज हो रही है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये किसानों को नई तकनीकों, नई फसलों, नवाचार और खेती के साथ-साथ पेड़-पौधे लगाने (Plantation Drive) के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। जिससे सीमांत एवं छोटे स्तर के किसानों का भी आर्थिक उत्थान हो सके। खेत की बाउंड्री पर पेड़ लगाकर किसानों को ना सिर्फ फसलों का बेहतरीन उत्पादन मिल सकता है बल्कि यह किसानों के लिये फिक्स डिपोजिट की तरह काम करता है, जिसमें...
कृषि उद्योग में मोनोकल्चर खेती Monoculture farming is a form of agriculture based on growing only one type of crop, at a time, in a specific area. In contrast, in a multiple cropping system, two or more crops are sown in a field at a time. कृषि उद्योग में मोनोकल्चर खेती मोनोकल्चर खेती आज के कृषि उद्योग में सबसे विवादास्पद विषयों में से एक है। जैसे-जैसे दुनिया की आबादी बढ़ती जा रही है और वैश्विक स्तर पर भोजन की मांग बढ़ती जा रही है, कई किसान भोजन की लगातार बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए मोनोकल्चर कृषि को सबसे सरल उपाय मानते हैं। इसके बावजूूद लोगों की आजीविका पर प्रभाव डालने वाले हर महत्वपूर्ण मुद्दे के साथ, मोनोकल्चर खेती की अवधारणा, इसके पेशेवरों , विरोधियों और इसके विकल्प पर करीब से नज़र डाली जानी चाहिए। इस लेख में इन और विषय से संबंधित कुछ अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों को शामिल किया गया है। आइए एक सामान्य बिंदु से शुरू करें और पता करें कि पहली जगह में मोनोकल्चर खेती क्या है। मोनोकल्चर खेती क्या है? मोनोकल्चर खेती कृषि का एक रूप है जो एक विशिष्ट क्षेत्र में, एक समय में, केवल एक प्रकार की फसल, उगाने पर आधारित होती है। इसके विपरीत एक बहुखेती प्रणाली में एक समय में दो या दो से अधिक फसलों को...
Harmful effects of current agricultural systems हरित क्रांति ने भारतवर्ष में खाद्यान्न के उत्पादन एवं आपूर्ति तथा खाद्यान्न सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। परिणामस्वरूप पारम्परिक कृषि पद्धतियां का स्थान कृषि की आधुनिक तकनीकों जैसे कि रासायनिक खादों, कृषि रसायनों (कीटनाशी) तथा फार्म मशीनरी ने ले लिया है तथा इस प्रकार का क्रांतिकारी परिवर्तन सिर्फ भारतीय परिदृश्य में ही नहीं अपितु समस्त विश्व की कृषि में देखा जा सकता है। बहुआयामी विकास एवं आधुनिकीकरण के पश्चात भी वर्तमान कृषि विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रही है। वाह्य कृषि निवेशों के अत्यधिक प्रयोग से मृदा, जल एव अनुवांशकीय स्रोतों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है तथा मृदा अपरदन, मृदा में पोषक तत्वों की कमी , घटता हुआ भूजलस्तर तथा जैव विविधता का क्षय इत्यादि प्रमुख रूप से देखे जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर लगभग 100 लाख हैक्टेयर उच्च गुणवत्तायुक्त भूमि की हानि प्रतिवर्ष हो जाती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का अभाव होता है तथा गरीब एवं छोटे किसानों के जीवनयापन के साधनों में कमी होती है। संयुक्त राष्ट्र की फूड एण्ड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन के एक अध्ययन के अनुसार लगभग 1.5 अरब मनुष्य उपरोक्त प्रकार से क्षय होने वाली मृदा पर आश्रित हैं। मृदा की संरचना एवं पोषक तत्वों में कमी के लिए मुख्य रूप से मृदा कार्बन में कमी को एक महत्वपूर्ण...