कृषि का पुनर्जागरण: जलवायु परिवर्तन के दौर में कृषि की नई रणनीति

कृषि का पुनर्जागरण: जलवायु परिवर्तन के दौर में कृषि की नई रणनीति

The Renaissance of Agriculture: New Strategies for Agriculture in the Era of Climate Change

जिन खेतों की मिट्टी में कभी जीवन की खुशबू थी, आज उसी मिट्टी में थकान और खालीपन का एहसास है। जो कभी करोड़ों सूक्ष्म और वृहद जीवों का पोषण करती थी, आज वह खुद अपने पोषण की मोहताज है।

आज इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में, जहाँ एक ओर महंगाई सातवें आसमान पर है, जलवायु परिवर्तन एक कड़वी सच्चाई बन चुका है, बदलते वैश्विक और भू-राजनीतिक समीकरण खेती को सीधे प्रभावित कर रहे हैं, वहाँ खेती से जीवनयापन करना अब किसानों के लिए पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।

एक समय था जब खेत किसान के गर्व और आत्मसम्मान का प्रतीक थे, अब वही खेत उसके लिए चिंता, जोखिम और असुरक्षा का प्रतीक बनते जा रहे हैं। तापमान में असमानता, बारिश के अनियमित चक्र, बढ़ती लागत, फसल के घटते दाम और मिट्टी की घटती उर्वरता, ये सब मिलकर खेती को एक सतत संघर्ष बना रहे हैं।

एक तरफ खेती में लागत लगातार बढ़ रही है, बीज, खाद, दवाई और मजदूरी के दाम तेज़ी से ऊपर जा रहे हैं जबकि दूसरी तरफ उपज पर मौसम की मार और बाजार में कम मूल्य किसानों को दोहरी चोट दे रहे हैं। परिणामस्वरूप, किसान का श्रम और उम्मीद दोनों ही टूट रहे हैं।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहाँ हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी रूप में खेती पर निर्भर है, यह संकट केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और भावनात्मक भी है। अब सवाल यह नहीं है कि “खेती कैसे की जाए”, बल्कि यह है कि “खेती और मिट्टी को कैसे जिंदा रखा जाए, किसानो की आय कैसे सुनिश्चित की जाये और आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती को कैसे टिकाऊ बनाया जाए।”

इन सवालो का जवाब तथ्यों, अनुभव और सोच के पुनर्गठन में छिपा है और यहीं से शुरू होता है “कृषि का पुनर्जागरण।”

कृषि के पुर्नजागरण पर प्रकाश डालने से पहले हमें वर्तमान कृषि की कुछ कड़वी सच्चाई जननी चाहिए –

  • UNDRR की रिपोर्ट के अनुसार हर साल दुनिया भर से लगभग 75 अरब टन उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी परत का क्षरण हो रहा है l
  • UNDRR रिपोर्ट के अनुसार हर साल लगभग 12 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि बंजर हो रही है l
  • भारत में हुए कई राष्ट्रीय सर्वे/अध्ययनों के आधार पर लगभग 146–147 मिलियन हेक्टेयर भूमि कुछ न कुछ रूप में क्षय/डिग्रेडेड बताई जा चुकी है l
  • वैश्विक स्तर पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि मिट्टी के संरक्षण न होने पर 2050 तक खाद्य, पारिस्थितिक और आय आधारित नुक़सान $23 ट्रिलियन तक पहुँच सकता है, यह सिर्फ सांख्यिकीय चेतावनी नहीं, भविष्य की आर्थिक तबाही का संकेत है।

यह आंकड़े बतलाते हैं कि मिट्टी, खेती और किसान सभी आज परिवर्तन के दौर में हैं, अगर हम इसके संभावित कारणों की पड़ताल करे तो निश्चित रूप से यह होंगे –

प्राकृतिक और पारिस्थितिक चुनौतियाँ

  • मिट्टी क्षरण, लवणता और पोषक तत्वों की कमी
  • भूजल स्तर में कमी और असंगत वर्षा
  • अत्यधिक अप्रिय मौसमी घटनाएँ जैसे सूखा, अतिवर्षा, तेज आँधी आदि

समश्रृंखला/आर्थिक चुनौतियाँ

  • बाजार में मुनाफाखोरी एवं अनिश्चितता
  • ऋण और वित्तीय जोखिम

सामाजिक-मानवीय व संरचनात्मक चुनौतियाँ

  • किसानों की घटती संख्या
  • औसत खेत का आकार कम होना
  • नीतिगत और संस्थागत कमजोरियाँ

इन सभी से अलावा भी कई और कारण हो सकते है जो वर्तमान परिस्थिति कृषि परिदृश्य को परिभाषित करते है l

कृषि का पुनर्जागरण: एक सम्भावित दृष्टिकोण

मेरे अनुसार वर्तमान कृषि की इन चुनोतियो से उभरने के लिए कोई निर्धारित उपाय या तकनिकी नहीं बल्कि एक व्यापक बदलाव ज्यादा यथार्थवादी हो सकता है l इसके लिए सरकार, संस्था, बाजार और बैंक नहीं बल्कि किसानो को भी कुछ मुलभुत बदलाव अपनी खेती में लाने होंगे

जलवायु परिवर्तन या अन्य किसी भी कारण से यदि खेती पर प्रभाव होता है तो इससे सबसे पहले किसान की आजीविका ही प्रभावित होती है और उन्हें ही सबसे पहले खेती के इस पुर्नजागरण की नींव रखनी होगी और इसके लिए उन्हें अपने कृषि से जुड़े दृष्टिकोण को और अधिक व्यापक बनाना होगा । इसके कुछ संभावित तरीके निम्न है –

भूमि और मिट्टी को दीर्घकालीन संपत्ति के रूप में देखें –

मिट्टी को खर्च की विषयवस्तु न मानकर पूंजी/संपत्ति समझें, यानी आज के तात्कालिक लाभ के लिए मिट्टी को दीर्घकालिक नुकसान न पहुँचाएँ। इसकी प्राथमिकता निवेश-पर-बचत वाली सोच से करें। (उदा. मिट्टी-कार्ड बनाएँ, मिट्टी परीक्षण को नियमित आदत बनाएं, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, एकीकृत किट एवं व्याधि नियंत्रण, फसल चक्र आदि अपनाये, मिटटी की संरचना और जैव – विविधता की सुरक्षा करें)।

जोखिम-आधारित खेती की दिशा में सोचें –

अधिक लाभ के लिए हर वर्ष खेती में सामान व सघन खेती न करें । फसल-चयन, बीज, खाद, दवाई इत्यादि में जोखिम-प्रोफ़ाइल बनाएं -उपलब्ध तकनिकी ज्ञान का उपयोग कर देखे की किस वर्ष में कौन-सा जोखिम ज्यादा है और उसकी तैयारी क्या हो सकती है, या वह कौन से टिकाऊ तरीके है जिन्हे अपनाने से वह रिस्क कम हो सकती है ।

विविधीकरण को केंद्र में रखें –

फसल विविधीकरण, मिश्रित कृषि (कृषि + पशुपालन + बागवानी), और मूल्य-सवर्धन गतिविधियाँ एक ही समय में अपनाने का रुख रखे ताकि एक फसल के नुकसान से पूरी आमदनी पर बोझ न पड़े।

संसाधन-कुशलता को व्यावहारिक मानक बनाएं – जल, पोषक तत्व और ऊर्जा का योजनाबद्ध उपयोग सुनिश्चित करें । हर बूंद और हर मिट्टी के कण का मूल्य समझे और बिना अत्यधिक निवेश पर निर्भर हुए इनके अत्यधिक की जगह समुचित उपयोग पर धयान दे ।

पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक अनुकूलन के साथ जोड़ें –

नविन तकनिकी अच्छी होती है लेकिन यह सभी परिष्तिथि में हो यह जरुरी नहीं, इसलिए पुरानी विधियाँ (हरी खाद, गोबर, गौ-मूत्र, कंपोस्ट, जैविक खाद, स्थानीय किस्मों का संरक्षण, आदि) और आधुनिक विज्ञान (प्रिसिशन कृषि, G।S, बायोफर्टिलाइज़र, मिट्टी परीक्षण, आदि) को मिलाकर एक संतुलित आदान प्रणाली बनाएं ।

संयोजित बाजार रणनीति और सहकारीता की ओर बढ़ें –

व्यावसायिक सोच जैसे एफपीओ/सहकारी/समूह को प्राथमिकता दें । हो सके तो सामूहिक खरीद, सामूहिक प्रोसेसिंग और सामूहिक विपणन को प्रोत्साहन दे जिससे लागत और जोखिम दोनों घटते हैं।

नविन तकनीकों को किसान-मित्र के रूप में अपनाना लेकिन अंधानुकरण न करना – A।-

आधारित मौसम-सहायता, मोबाइल पर तकनिकी सुझाव, ड्रोन, ड्रिप, स्मार्ट सिंचाई, G।S आधारित सटीक आदान वाले उपकरण आदि का यथा-संभव प्रयोग करें । तकनीक को अपनाते समय स्थानीय ज्ञान और ट्वीक्स जोड़ें — “टूल + लोकल फिट” वाला रुख अपनाएँ, जिससे ये आसान, कम कीमत पर उपयोग करने योग्य बन सके।

दीर्घकालिकता के लिए छोटे उद्यम और वैकल्पिक आय धाराएँ विकसित करना –

खेत-आधारित छोटे उद्यम जैसे वर्मी-कम्पोस्ट, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, डेरी, जैविक आदान केंद्र आदि विकसित करे । इन्हें एक पूर्ण बिजनेस मॉडल के रूप में न देख कर, पहले छोटे उद्यम के रूप में अपनाएँ; जो सफल हो, उसे कुछ हद तक बढ़ा कर सकते है ।

खेती का हिसाब रखे –

आमतौर पर किसान खेती का सही हिसाब नहीं रख पाते है और खाद या दवाई पर जरुरत से ज्यादा खर्च कर देते है जबकि तुलनात्मक रूप से वह खर्च लाभकारी नहीं होता । इससे खेती में होने वाले कुछ गैर-जरुरी खर्चो से बचा जा सकता है या जिस मद में ज्यादा खर्च हो उसमे अधिक विविधीकरण द्वारा खर्च को कम करने पर जोर दिया जा सकता है । अगर खेती को लाभ का व्यवसाय बनाना है तो यह उस उद्यम का एक जरुरी पहलु है ।

सिखने की आदत विकसित करें –

किसी भी सफल उद्यम के लिए यह जरुरी होता है वह लगातार विकसित होता रहे फिर चाहे वह खेती ही क्यों न हो, समय के साथ खेती के तरीको को वास्तविक और अनुकूल बनाने के लिए लगातार कुछ सुधारो की जरुरत होती है और इसके लिए किसानो को नई और अच्छी तकनीकों, उन्नत किस्मो, जलवाणु जोखिमो, नए उन्नत उत्पादों आदि की समय पर जानकारी आवश्यक होती है ।

लगातार सीखने की आदत किसान को कभी पीछे नहीं रहने देगी साथ ही यह उसे वर्तमान चुनोतिये से निपटने की लिए और अधिक सशक्त बनने में सहायक होगी । किसान यदि सिखने के लिए कुछ समय निकले तो सरकार, सामाजिक संस्था, अन्य किसान या मोबाइल के माध्यम से उन्नत तकनिकी ज्ञान प्राप्त कर सकते है ।

निष्कर्ष

वर्तमान कृषि का समय अब साधारण संरचनाओं, व्यक्तिगत लाभ और स्थानीय बाजार तक सिमित  नहीं है यह परिवर्तन का वह समय है जब हमें एक कदम पीछे हटकर अपनी मिट्टी, अपने प्राकृतिक संसाधन और अपनी अगली पीढ़ी के भविष्य के बारे में सोचना होगा। आज की उच्च-इनपुट माँगती खेती (जो जल्दी लाभ दे सकती है) ने कई जगह मिट्टी की उत्पादकता घटा दी है, पानी को जलरीला बना दिया है साथ ही किसान की जेब पर भी अधिक भार डाला है । दीर्घकालिक सम्पन्नता उसी किसान को मिलेगी जो आज मिट्टी की सेहत में निवेश, जोखिम-समझ और विविध आय के छोटे-छोटे कदम उठाएगा।

यह आग्रह से ज्यादा एक सम्भव और सुरक्षित रास्ता है जो अपने खेत, अपने बच्चे, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के लिए आपके योगदान को सशक्त बनाता है । यह आज के समय की जरुरत है की हमारे किसान, खेती को सिर्फ रुचि, परंपरा, या व्यक्तिगत लाभ के लिए न करें, वह हमारी विरासत है। उच्च-इनपुट खेती के आकर्षण से कुछ समय तक लाभ हो सकता है, पर स्थायी आजीविका वहीं है जो मिट्टी को बचाकर रखे। आज समझदारी इसी में है की हम मिट्टी को फिर से संपन्न बनाएं, इनपुट बाजार पर किसान की निर्भरता कम करके उसे सशक्त बनाएं, और स्थानीय बाजार की सीमाओं से आगे निकलकर समूह के साथ नए रास्ते बनाएं।

स्रोत (Reference):- (Can be added ।n the publ।sh।ng of art।cle, ।f requ।red)

  1. Global so।l eros।on / topso।l loss — UNDRR / FAO est।mates (≈75 b।ll।on tonnes so।l lost yearly; ~12 m।ll।on ha/year land loss).
  2. Global econom।c ।mpact est।mate of so।l degradat।on — FAO / UN Global So।l Partnersh।p ($23 tr।ll।on by 2050).
  3. So।l degradat।on area ।n ।nd।a — नेशनल/रिसर्च पेपर और NBSS आंकड़े (≈146–147 m।ll।on ha degraded).
  4. परिवर्तन में cult।vator/किसान संख्या का घटता रुझान (Census / Agr।culture Census 2021-22 रिपोर्टें).

Authors:

लखन पाटीदार

कार्यक्रम प्रबंधक. एक्शन फॉर सोशल एडवांसमेंट, भोपाल

lakhan0707@zohoma।l.।n


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