पोषण और क्षेत्र-आधारित लचीलापन के लिए लिंग उत्तरदायी प्राकृतिक खेती

पोषण और क्षेत्र-आधारित लचीलापन के लिए लिंग उत्तरदायी प्राकृतिक खेती

Gender responsive natural farming for nutrition and zone-based resilience

भारत की कृषि दृश्यपट में प्राकृतिक खेती एक संसाधन-कुशल, पारिस्थितिक-संवेदनशील कृषि दृष्टिकोण के रूप में उभरी है, जो मृदा जैविक प्रक्रियाओं, स्थानीय इनपुट और जैव विविधता-आधारित उत्पादन प्रणालियों पर जोर देती है।

भारतीय संदर्भ में जहाँ महिलाएं कृषि कार्यबल का लगभग आधा हिस्सा हैं, वहां प्राकृतिक खेती  विशेष महत्वपूर्ण  है क्यूंकि वह पर्यावरणीय की सुरक्ष्या के साथ साथ  महिलाओं की अजिबिका को भी सुनिश्चित करता  हैं ।

यह अनिवार्यता  प्राकृतिक खेती को लिंग-संवेदनशील विकास ढांचे में स्थापित करता है, और इसकी सामाजिक-आर्थिक व्यवहार्यता, सामुदायिक गतिशीलता, पोषण परिणाम और कृषि-पर्यावरणीय अनुकूलन क्षमता की समीक्षा करता है ।

भारत के विविध कृषि-पर्यावरणीय क्षेत्रों से प्राप्त साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि प्राकृतिक खेती  मुख्यतः केवल अधिकतम उपज  पाने तक सीमित न होकर लागत में कमी के जरिये कृषि में कुल आय को बढ़ने की बिकल्प प्रदान करता हैं। बाहरी रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करने और खेत पर जैविक इनपुट पर जोर देने से प्राकृतिक खेती लघु और सीमांत किसानों के लिए वित्तीय जोखिम को घटने में कारगर हैं ।

भारत देश के ओडिशा राज्य में वर्षा-निर्भर और मिश्रित कृषि प्रणालियों पर किए गए क्षेत्र स्तर के अध्ययन यह दर्शाती हैं कि प्राकृतिक खेती की प्रथाएँ, बाजरा, तिलहन और सब्ज़ियों जैसी फसलों में तुलनीय या बेहतर उपज प्राप्त कर सकती हैं, साथ ही खेती की लागत भी काफी कम होती है।

ये परिणाम विशेष रूप से महिला किसानों के लिए प्रासंगिक हैं, जो अक्सर पूंजी, ऋण और यंत्रीकरण तक सीमित पहुँच वाले खेतों  का प्रबंधन करती हैं। इसलिए, प्राकृतिक खेती की आर्थिक तर्कशीलता महिलाओं की आजीविका की वास्तविकताओं के साथ घनिष्ठ रूप से मेल खाती है।

प्राकृतिक खेती केवल एक तकनीकी हस्तक्षेप नहीं है, बल्कि यह एक सामुदायिक-संलग्न अभ्यास है। महिलाओं की भूमिका बायो-इनपुट तैयार करना, बीज प्रबंधन, कंपोस्टिंग और फसल विविधता बनाए रखना जैसी प्रमुख गतिविधियों में केंद्रित होती है। ये गतिविधियाँ सामूहिक परंपरा, विश्वास और पारस्परिक समर्थन को प्रोत्साहित करती हैं, जिससे स्थानीय सामाजिक पूंजी मजबूत होती है।

ओडिशा के आदिवासी और अर्ध-आदिवासी क्षेत्रों में प्राकृतिक और जैविक विधियाँ अपनाने वाली महिला-नेतृत्व वाली समूहों ने सामूहिक निर्णय और ज्ञान विनिमय में सुधार प्रदर्शित किया है। प्राकृतिक खेती में सहभागिता महिलाओं केवल सहायक श्रमिक के रूप में नहीं बल्कि  किसान के रूप में उनके दृश्यता को बढ़ाती है, और धीरे धीरे घर और समुदाय में लिंग संबंधों को पुनः आकार देती है।

प्राकृतिक खेती की एक विशेषता इसका विविधीकृत फसल प्रणाली पर जोर है, जिसमें बाजरा, दलहन, सब्ज़ियाँ और स्थानीय फसलें शामिल हैं। इस तरह का विविधीकरण सीधे आहार विविधता और घरेलू पोषण में योगदान देता है, ऐसे क्षेत्र जहाँ महिलाएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं।

डॉ बेहेरा अदि (2025) के ओडिशा में  एक अध्ययन से पता चला की महिलाओं द्वारा प्रबंधित पोषण उद्यान और मिश्रित फसल प्रणाली ने ताज़ी सब्ज़ियों तक पूरे वर्ष की पहुँच, खाद्य व्यय में कमी और सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध खाद्य पदार्थों के सेवन में उनके स्वस्थ्य और परिबरिक पोषण में  सुधार परिलक्षित हुआ है।

महिलाओं के खेती संबंधी निर्णय और घरेलू पोषण के बीच यह संबंध प्राकृतिक खेती को एक पोषण-संवेदनशील कृषि दृष्टिकोण के रूप में स्थापित करता है, जो विशेष रूप से छिपे हुए कुपोषण और पीढ़ीगत कुपोषण से निपटने के लिए प्रासंगिक है।

भारत के विविध कृषि-पर्यावरणीय क्षेत्रों में संदर्भ-विशिष्ट कृषि प्रणालियों को अपनाने की आवश्यकता है जो पर्यबरण अनुकूल हो और जिसमे जलबायु परिवर्तन को झेलने की लचीलापन के साथ साथ भाग लेने वाले कृषि महिलाओं की जीवनशैली एबं अजिबिबिका के लिए सम्बेदंशील भी हो सके  ।

उदहारण स्वरुप ओडिशा  जैसे राज्य में  बिभिन्न भुमिरूप है जैसे की तटीय मैदान, केंद्रीय टेबललैंड, उत्तरी पठार और पर्वतीय आदिवासी क्षेत्र , जिनमें प्रत्येक की जलवायु और मृदा विशेषताएँ अलग हैं और भुमिरुप उपयोगी  प्राकृतिक खेती ज्यादातर उच्च अनुकूलन क्षमता प्रदर्शित करती है, क्योंकि यह स्थान-विशिष्ट फसल चयन, स्थानीय ज्ञान का एकीकरण और लचीले प्रबंधन प्रथाओं की अनुमति देती है।

विशेष रूप से वर्षा-निर्भर और जलवायु असुरक्षित क्षेत्रों में कार्यरत महिला किसान, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का उपयोग करके प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों को अपनाती हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन, सूखा और मृदा क्षरण के प्रति लचीलापन बढ़ता है। यह क्षेत्र आधारित अनुकूलन  क्षमता फसल  प्रणालियों की दीर्घकालिक निरंतरता  को मजबूत करती है।

लिंग-संवेदनशील दृष्टिकोण से मूल्यांकित प्राकृतिक खेती बहुआयामी लाभ प्रदान करती है। यह केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है; कम लागत और जोखिम प्रबंधन के माध्यम से यह किसानों के लिए आर्थिक लचीलापन सुनिश्चित करती है। साथ ही, महिलाओं की सामूहिक भागीदारी और जिम्मेदारी साझा करने  से यह सामाजिक सशक्तिकरण को भी बढ़ावा देती है।

विविधीकृत खाद्य प्रणालियाँ अपनाकर प्राकृतिक खेती घरेलू पोषण में सुधार लाती है और अनुकूल, कम इनपुट प्रयोग से यह पारिस्थितिकीय लचीलापन भी मजबूत करती है। हालांकि, इस परिवर्तनकाल में अनेक चुनौतियाँ भी सामने आती हैं, जैसे प्रारंभिक उपज में उतार चढ़ाव, अधिक श्रम की आवश्यकता और ज्ञान में अंतर। ये अनुभव यह स्पष्ट करते हैं कि संदर्भ-संवेदनशील समर्थन और क्षमता निर्माण विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है।

अतः प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि तकनीकी परिवर्तन नहीं है; यह एक सामाजिक,पर्यावरणीय परिवर्तनकाल  है, जिसका महिलाओं के सशक्तिकरण, सामुदायिक लचीलापन और पोषण सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भारत और ओडिशा से प्राप्त साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि जब महिलाएं नेतृत्व की भूमिका में हों, तो प्राकृतिक खेती आर्थिक रूप से व्यवहार्य, पोषण संवेदनशील और पारिस्थितिक रूप से अनुकूल परिणाम प्रदान कर सकती है।


Authors

डॉ लक्ष्मी प्रिया  साहू,  श्री आशीष कुमार ब्रह्मा, डॉ लिपि दास एबं डॉ अरुण कुमार पंडा

भा.कृ.अनु.प- केन्द्रीय कृषिरत महिला संस्थान , भुबनेश्वर

Corresponding Author E mail : laxminrcwa@yahoo.co.in

डॉ लक्ष्मी प्रिया  साहू