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 करी पत्ते के पौधे के स्वास्थ्य लाभ (मुरैया कोएनिगी लिन. स्प्रेंगल)  The word curry comes from the Tamil word 'kari,' which means spiced sauces. Curry leaves (Murraya koenigii), also known as sweet neem leaves, are widely utilised in Indian cuisine and medicine. They're little green leaves with a distinct aroma and flavour. They're commonly used to season South Indian meals like sambhar, rasam, and chutney. Curry leaf (Murraya koenigii Spreng.) is a perennial leaf vegetable that grows on an aromatic deciduous tree. Although it is classified as a minor spice, its flavor-enhancing abilities complement eastern cooking, and the leaves retain their flavour and perfume long after drying; as a result, it is frequently employed in both culinary and Ayurvedic medicine. It is one of the richest sources of carbozole alkaloids, in addition to the extensive chemical ingredients responsible for the plant's medicinal properties. M. koenigii extracts caused a spike in blood sugar levels and were very toxic to major pathogens. Curry leaves don't have the same flavor as the curry we're used to. They have a garlic flavour comparable to asafoetida, but are more herbal, like basil or kafir lime leaves. They have a lemony fragrance to them. Nutritional Value of Curry Leaves Curry leaves contain roughly 108 calories per 100 grams. Carbohydrates, proteins, fibre, calcium, phosphorus,...

लहसुन की वैज्ञानिक तरीके से खेती लहसुन दक्षिणी यूरोप का मूल निवासी है और पूरे भारत में मसाले या मसालों के रूप में उगाया जाता है। उड़ीसा के बाद गुजरात सबसे बड़े उत्पादक राज्य हैं। इसका उपयोग पेट की बीमारी, गले में खराश और कान में दर्द के इलाज के रूप में किया जाता है। यह आमतौर पर विभिन्न व्यंजनों की तैयारी में उपयोग किया जाता है।  लहसुन की खेती के लि‍ए जलवायु और मिट्टी यह जलवायु परिस्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला के तहत उगाया जाता है। हालाँकि  बहुत गर्म या बहुत ठंडा मौसम इसके लिए अनुकूल नही होता है। यह गर्मियों के साथ.साथ सर्दियों में भी मध्यम तापमान पसंद करता है। बल्ब के निर्माण के लिए लघु दिन बहुत अनुकूल हैं। इसे 1000 से 1300 मीटर की ऊंचाई पर अच्छी तरह से उगाया जा सकता है। लहसुन को पोटाश की अच्छी मात्रा के साथ अच्छी तरह से सूखी दोमट मिट्ट की आवश्यकता होती है। रेतीली या ढीली मिट्टी पर उगाई गई फसल से उत्पादित बल्ब विकृत होते हैं और कटाई के दौरान कई बल्ब टूट जाते हैं और उखड़ जाते हैं और इसलिए वे भंडारण में अच्छी तरह से नहीं रहते हैं। भूमि की तैयारी लहसुन की खेती के लिए दो गहरी जुताई और इसके बाद हैरो से भूमि की जुताई करना उपयुक्त रहता है। जिससे...

Indigenous Turmeric Processing Methods छत्तीसगढ़ में हल्दी की फसल कि खेती विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग समय में की जाती है। इस फसल के लगभग 50% उत्पादक किसान आदिवासी होते हैं और आम तौर पर अपने बड़ियो में स्वदेशी तरीकों के माध्यम से फसल उत्पादन करते हैं। वार्षिक रिपोर्ट, 2015-16 के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य का पुरे भारत में हल्दी उत्पादन के क्षेत्र में लगभग 11.80 प्रतिशत योगदान रहा है। राज्य में हल्दी का उत्पादन 9, 747 हेक्टेयर भूमि से लगभग 83,470 लाख टन का था तथा साल दर साल राज्य का उत्पादन क्षेत्र बढ़ रहा है,   हल्दी उत्पादन के मुख्य जिले धमतरी, कोरबा, जगदलपुर, सरगुजा, जशपुर, कोंडगाँव, बालोद, सूरजपुर और बलरामपुर है। किए गए सर्वेक्षण के अनुसार हल्दी उत्पादक क्षेत्र में हल्‍दी प्रसंस्करण के लिए तीन तरीकों का प्रयोग किया जाता है। गोबर के साथ हल्दी को उबालना गोबर के बिना हल्दी को उबलकर 2-3 सेमी आकार कि मोटाई में काटकर धुप में सुखाना गोबर के बिना हल्दी को उबालना- वाणिज्यिक विधि 1. हल्‍दी प्रसंस्करण की परंपरागत विधि गोबर के साथ हल्दी को उबालना पारंपरिक पद्धति में, साफ धुली हुई हल्दी प्रकन्दको पर्याप्त पानी के साथ तांबे, जस्ता लोहा या मिट्टी के बर्तन में उबाला जाता है। कुछ जगहों परहल्दी प्रकन्द को उबालने के लिए गोबर का घोल एक माध्यम के रूप में उपयोग किया जाता...

Improved cultivation of Fennel through transplanting. सौंफ की खेती मुख्य रूप से मसाले के रूप में की जाती हैI सौंफ के बीजो से ओलेटाइल तेल  (0.7-1.2 %) भी निकाला जाता है, सौंफ एक खुशबु धार बीज वाला मसाला होता है | सौंफ के दाने आकार में छोटे और हरे रंग के होते है | आमतौर पर इसके छोटे और बड़े दाने भी होते है | दोनों में खुशबु होती है | सौंफ का उपयोग आचार बनाने में और सब्जियों में खशबू और स्वाद बढाने में किया जाता है  | इसके आलावा इसका उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है | सौंफ एक त्रिदोष नाशक औषधि होती है | भारत में सोंफ को राजस्थान ( सिरोही, टोंक ) , आंध्रप्रदेश , पंजाब , उत्तरप्रदेश , गुजरात , कर्नाटक और हरियाणा के भागों में उगाया जाता है | इन क्षेत्रों में सौंफ का अधिक मात्रा में उत्पादन होता है |   सौंफ के लाभ सौंफ मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होती है | इससे एनीमिया जैसी बीमारी का उपचार किया जाता है | इसके आलावा पेट फूलना, दस्त, कब्ज, गुर्दे पेट का दर्द और साँस की बिमारियों को ठीक करने के लिए सौंफ का उपयोग किया जाता है | यदि किसी व्यक्ति का भोजन उचित प्रकार से नही पच रहा है तो उसे खाना खाने के...

Production technology of Coriander धनिया अम्बेलीफेरी या एपिएसी कुल का पौधा है। इसके वंश को कोरिएन्डम एवं प्रजाति सटाइवम है। इसका गुणसूत्र संख्या 2n = 22 होता है। धनिया के पौधे चिकनी सतह वाले 20-90 सेमी0 ऊॅंचाई के होते हैं। इसके नीचे की पत्तियाँ साधारणतया 2.5-10 सेमी0 लम्बी एवं 2.75 सेमी0 चौड़ी होती है। ऊपर की पत्तियाँ छोटे-छोटे भागों में विभक्त होकर पतले पर्ण फलकों में बदल जाती है। इसके पुष्प छोटे आकार के छत्रक में आते हैं। पत्ती वाली सब्जियों में धनिया का प्रमुख स्थान है। इसकी मुलायम पत्तियाँ को चटनी एवं सॉस आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है। इसकी हरी पत्तियों को सब्जी एवं अन्य व्यजंनों को सुगन्धित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके दाने को मसाले के रूप् में प्रयोग किया जाता है। धनिया की पत्तियाँ पोषण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं।  इसमें पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी, कैरोटीन एवं अन्य खनिज तत्व पाये जाते हैं। इसकी पत्तियों में पाये जाने वाले पोषक तत्व की सारणी निम्नलिखित है पौष्टिक तत्व पत्ती (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग) नमी 86.3 ग्राम प्रोटीन 3.3 ग्राम वसा 0.6 ग्राम खनिज लवण 2.3 ग्राम रेशा 1.2 ग्राम कार्बोहाइडेटस 6.3 ग्राम ऊर्जा 44 किलो कैलोरी कैल्शियम 184 मि0ग्रा0 फास्फोरस 7.0 मि0ग्रा0 आयरन 1.42 मि0ग्रा0 कैरोटीन 6918 माइक्रोग्राम मैग्नीशियम 31.0 मि0ग्रा0 सोडियम 583 मि0ग्रा0 पोटैशियम 256 मि0ग्रा0 कॉपर 0.14 मि0ग्रा0 मैंगनीज 0.50 मि0ग्रा0 मालिब्डेनम 1.12 मि0ग्रा0 जिंक 0.32 मि0ग्रा0 क्रोमियम 0.014 मि0ग्रा0 सल्फर 49.0 मि0ग्रा0 क्लोरीन 43.0 मि0ग्रा0 धनि‍ये की खेती के लि‍ए जलवायु एवं भूमि: धनिया की खेती शीतोष्ण एवं उपोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में की जाती...

Advanced Production Techniques of Fenugreek सामान्य मेथी का वानस्पतिक नाम ट्राइगोनेला फोइनमग्रेसियम एवं एक और वर्ग कस्तूरी मेथी का है जिसका वानस्पतिक नाम ट्राइगोनेला कार्निकुलाटा है। मेथी की खेती मुख्यतः हरी सब्जियों, दानो (मसालों) एवं कुछ स्थानो पर चारो के लिये किया जाता है।  मेथी के सूखे दानो का उपयोग मसाले के रूप मे, सब्जियो के छौकने व बघारने, अचारो मे एवं दवाइयो के निर्माण मे किया जाता है। इसकी भाजी अत्यंत गुणकारी है जिसकी तुलना काड लीवर आयल से की जाती है। इसके बीज में डायोस्जेनिंग नामक स्टेरायड के कारण फार्मास्यूटिकल उधोग में इसकी मांग रहती है। इसका उपयोग विभिन्न आयुर्वेदिक दवाओं को बनाने में किया जाता है। इस लेख मे सामान्य मेथी की उन्नत उत्पादन तकनीक का वर्णन किया जा रहा है। मेथी के लिए जलवायु : मेथी शरदकालीन फसल है तथा इसकी खेती रबी के मौसम में की जाती है। इसकी वानस्पतिक वृद्धि के लिए लम्बे ठंडे मौसम, आर्द्र जलवायु तथा कम तापमान उपयुक्त रहता है। फूल बनते समय या दाने बनते समय वायु में अधिक नमी और बादल छाये रहने पर बीमारी तथा कीड़ों का प्रकोप बढ़ जाता है। फसल पकने के समय ठण्डा एवं शुष्क मौसम उपज के लिये लाभप्रद होता है। मेथी अन्य फसलो की तुलना मे अधिक पाला सहनशील होता है। मेथी के लिए भूमि एवं भूमि की तैयारी : दोमट या बलुर्इ दोमट...

Improved Techniques of Turmeric Cultivation  हल्दी एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है जिसका उपयोग औषधि से लेकर अनेकों कार्यो में किया जाता है। इसके गुणों का जितना भी बखान किया जाए थोड़ा ही है, क्योंकि यह फसल गुणों से परिपूर्ण है हल्दी की खेती आसानी से की जा सकती है तथा कम लागत तकनीक को अपनाकर इसे आमदनी का एक अच्छा साधन बनाया जा सकता है। यदि किसान भाई इसकी खेती ज्यादा मात्रा में नहीं करना चाहते तो कम से कम इतना अवश्य करें जिसका उनकी प्रति दिन की हल्दी की मांग को पूरा किया जा सकें। निम्नलिखित शास्त्र वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना कर हल्दी की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है। हल्‍दी उगाने के लि‍ए भूमि का चुनाव:-  हल्दी की खेती बलुई दोमट या मटियार दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जाती है। जल निकास की उचित व्यवस्था होना चाहिए। यदि जमीन थोडी अम्लीय है तो उसमें हल्दी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। हल्‍दी फसल के लि‍ए भूमि की तैयारी:- हल्दी की खेती हेतु भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक है। मोल्ड बोल्ड प्लाऊ से कम से कम एक फीट गहरी जुताई करने के बाद दो तीन बार कल्टीवेटर चलाकर जमीन को अच्दी तरह...