12 Oct मूंगफली की उन्नत खेतीः खेत की तैयारी, बीज उपचार और रोग प्रबंधन की संपूर्ण जानकारी
परिचयः-
मूंगफली तिलहनी फसलों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। मूंगफली का उपयोग कई प्रकार से किया जाता है जैसे तेल, बीज, घरेलू उपयोग एवं निर्यात। यह खाद्य तेल का बहुत ही अच्छा स्रोत हैं। दानों में 48-55 प्रतिशत तेल, 27 प्रतिशत प्रोटीन व 10-21 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पायी जाती है। इसके तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, साबुन क्रीम आदि में किया जाता है। राजस्थान में मूंगफली की खेती मुख्यतः बीकानेर, जोधपुर, नागौर, जयुपर, सीकर, दौसा, चित्तौड़गढ़, सवाई माधोपुर, टोंक, झुंझुनू आदि जिलों में की जाती हैं।

जलवायुः-
मूंगफली उष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा होने के कारण इसे लम्बे एवं गर्म मौसम की आवश्यकता होती है। उत्तरी भारत व राजस्थान में मूंगफली की खेती खरीफ ऋतु में की जाती है। मूंगफली को 50-100 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। इसकी वृद्धि के समय 27-30° सेल्सियस तथा प्रजनन के लिए 24-27° सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है। राजस्थान में कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचित फसल के रूप उगाई जाती है। फूल आने के बाद पौधों को पर्याप्त नमी व प्रकाश मिलते रहना चाहिए।
मृदाः-
मूंगफली फसल के लिए अच्छे जल निकास युक्त बलुई, बलुई दोमट मृदा सर्वोत्तम मानी जाती है। मृदा का पी.एच. मान 6 से 8.5 के बीच होना चाहिए।
खेत की तैयारीः-
मूंगफली जमीन के अन्दर लगती है। इसलिए बोने से पहले 2-3 बार अच्छी गहरी जुताई करनी चाहिए और पाटा चलाकर मिट्टी भुरभुरी कर लेनी चाहिए भूमिगत कीटो को नष्ट करने के लिए अन्तिम जुताई के समय 25 किग्रा. मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत या क्युनालफॉस 1.5 प्रतिशत प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए।
उन्नतशील किस्मेः-
मूंगफली के आकार प्रकार के अनुसार किस्मों को तीन वर्गो मे बाँट सकते हैं-
- झुमका या गुच्छेदारः- इस वर्ग के पौधे भूमि से ऊपर सीधे गुच्छो मे बढ़ते है। फलियाँ मुख्य जड़ के पास ही लगती है। दाना गुलाबी या लाल रंग का होता है तथा जल्दी पकने वाली होती है। इनकी उपज फैलने वाली किस्मों से कम होती है। ये भारी मृदाओ के लिए उपयुक्त होती है।
- विस्तारः- इन पौधो की शाखायें जमीन के समानात्तार फैलती हैं। मूंगफली दूर-दूर लगती है दाना मोटा तथा भूरे रंग का होता है पकने में समय अधिक लगता है। ये किस्में रेतीली व दोमट मृदाओ के लिए उपयुक्त होती हैं।
- अर्द्ध विस्तारीः- इन पौधो की शाखायें कम फैलने वाली होती हैं यह गुच्छेदार व विस्तारी के बीच की किस्में हैं। यह मध्यम उपज देने वाली होती हैं।
राजस्थान के लिए उपयुक्त किस्मे निम्न प्रकार है- ए.के. 12-24, ए.एच-114, जी.जी.-2, जी.जी.-20, गिरनार-2 (पी.बी. एस 24030), एच.एन.जी.-10, एच.एन.जी.-123, जे.एल.-24, एम.-13, प्रताप मूंगफली, आर.जी-141, आर.जी.-382 (दुर्गा), आर.जी.-425 (राज. दुर्गा), आर.जी.-510, आर.एस.बी.-87, टी.ए.जी.-24, टी.जी.-37 ए, टी.बी.जी.-39, टी.जी.-39 ।
बीज दर एवं बीजोपचारः-
मूंगफली का बीज 80 से 100 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर पर्याप्त होता है। बीज का दाना 10-12 दिन पूर्व निकालना चाहिए। बीजोपचार के लिए प्रति किलो बीज 3 ग्रा. क्लोरोथेलीनील या 8-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा से इस के बाद प्रति किलो बीज 25 मिली क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी से तथा अंत में प्रति हेक्टेयर बीजों के लिए राइजोबियम व पीएसबी कल्चर प्रत्येक के 3 पैकेट से उपचारित करे।
बुआई का समय एवं बुआई की विधिः-
मूंगफली की अगेती बुआई 15-20 जून, समय पर बीजाई 20 जून से 15 जुलाई पिछेती बुआई जुलाई 31 तक। मूंगफली की बुआई कतारों में फैलने वाली किस्म की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 40-45 सेमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी. तथा गुच्छेदार किस्म की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी. होनी चाहिए। बीज की गहराई 5-7 सेमी. रखनी चाहिए।
खाद एवं उर्वरकः-
- बुआई से 4 सप्ताह पूर्व प्रति हेक्टेयर 10-15 टन गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करे।
- बुआई से पूर्व प्रति हेक्टेयर 30-50 किग्रा यूरिया या 75 किग्रा अमोनियम सल्फेट 310-375 किग्रा एसएसपी, 40-80 किग्रा एमओपी तथा 25 किग्रा जिंक सल्फेट का उपयोग करें। सिंचाई के बाद आवश्यकतानुसार यूरिया का उपयोग करें। अंतिम जुताई से पूर्व प्रति हेक्टेयर 250 किग्रा जिप्सम की भी सिफारिश की जाती है क्योंकि कैल्शियम की कमी से मूंगफली के दानों का भराव ठीक से नहीं होता है मृदा परीक्षण के आधार पर बोरोन उर्वरक का भी प्रयोग करें क्योंकि इसकी कमी से मूंगफली के दानों के भीतर खाली स्थान रह जाता हैं। जिसे होलोहर्ट के नाम से जाना जाता है।
सिंचाईः-
मूंगफली ग्रीष्मकालीन फसल होने के कारण आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। फूल आने के समय नमी आवश्यक है। वर्षा न होने (सूखा पड़ने) पर 1-2 सिंचाई करनी चाहिए। प्रथम सिंचाई बुआई के 3-4 सप्ताह पर देवें एवं अंतिम सिंचाई अक्टूबर के अंतिम पखवाड़े तक फसलावस्था अनुसार पूरी कर लें।
अंतरा कृषिः-
यदि खेत में खरपतवार हो तो 1-2 निराई गुड़ाई कर खरपतवार निकाल देने चाहिए। अन्तिम निराई गुड़ाई 30-40 दिन तक कर देनी चाहिए उसके बाद नहीं करनी चाहिए। फसल में सुइयाँ (अधिकीलन की किया) बनना प्रारम्भ होने के बाद निराई-गुड़ाई नहीं करनी चाहिए। घास कुल के खरपतवारों के प्रभावी नियंत्रण हेतु मूंगफली की खड़ी फसल में बुआई के 20-25 दिन बाद क्यूनॉलफास 5 प्रतिशत ईसी की 1000 मिली. दवा प्रति हेक्टेयर की दर से 500 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। रेतीली भूमि के अलावा अन्य भूमियों में 30-40 दिन में जड़ों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।
पादप संरक्षणः-
कीट-दीमक, सफेद लट, लाल भडूली, सुरंग बनाने वाले कीट, माइट आदि मूंगफली की फसल को हानि पहुँचाते है। इनके नियंत्रण के लिए प्रति किलो बीज में 4 मिली क्लोरोपाइरीफॉस 20 ईसी दवा मिला कर उपचार करें एवं अन्य कीटों के लिए 300 मिली. मिथाइल डेमेटोन 25 ईसी या 600 मिली. फॉस्फोमिडोन 40 ईसी को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
मूंगफली के प्रमुख रोग
अगेती पर्ण चित्तीः-
इस रोग के धब्बे पौधे उगने के 10 से 18 दिनों के बाद पत्ती की उपरी सतह पर प्रकट होने शुरू हो जाते हैं। इस रोग के धब्बे 1 से 10 मि. मी. के गोलाकार या अनियमित आकार के हल्के पीले रंग के होते हैं बाद में यह धब्बे लाल – भूरे या काले रंग के होते हैं। इन धब्बों की निचली सतह नारंगी रंग की होती है।
पछेती पर्ण चित्तीः-
यह रोग पौधे उगने के 28 सड़े 35 दिनों के बाद पत्ती की निचली सतह पर प्रकट होता है। इस रोग के वृत्तकार धब्बों का आकार 1.5 से 5 मि. मी. का होता है। इस रोग के धब्बों का रंग पहले पीले रंग का होता है बाद में यह धब्बे पत्तियों के दोनों सतहों पर काले रंग के हो जाते है। निचली सतह पर यह धब्बे कार्बन की तरह काले नजर आते हैं।
स्तंभमूलसंधि विगलन रोगः-
यह मूंगफली का बीज जनित रोग है जो प्रभावित पौधों को शतप्रतिशत हानि पहुंचाता हैं। रोग के लक्षण पौधों के उस भाग पर प्रकट होते हैं जो मिट्टी की सतह से लगा होता है। मिट्टी की सतह का तने का भाग (कालर भाग) रोग जनक फफूंद से ग्रसित हो जाता हैं। यह रोग पौधों के आधार को कमजोर कर देती है। जिससे पौधे गिर जाते हैं एवं सूखकर मुरझा जाते हैं। इन प्रभावित पौधों के सूखी सड़न वाले स्थान पर रोगजनक फफूंद की उभरी हुई काली – काली रचनाएँ स्पष्ट दिखाई देती है।
तना विगलनः-
तने पर रोग का संक्रमण मिट्टी की सतह के पास या तने के सबसे निचले हिस्से पर होता है। इस रोग के लक्षण सूखे मौसम में मिट्टी की सतह के नीचे एवं गीले मौसम में मिट्टी की सतह के नीचे एवं गीले मौसम में मिट्टी की सतह के ऊपर तने पर पाए जाते है। शुरू में मिट्टी की सतह के पास तने पर गहरी घूसर विक्षति प्रकट होती है फिर यह विक्षति सफेद कवक जाल से तने के प्रभावित भाग को ढक लेती है। स्पष्ट सड़न नीचे की ओर प्रकट होती है एवं पौधे के हरे भाग पीलापन एवं घूसर रंग के होकर मुरझा जाते हैं। रोग के संक्रमण से एक या दो शाखाएं या फिर पौधा मर जाता है।
उखटा, रोजेट रोग, चित्तीदार रोग, किट्ट रोग, जड़ गलन, अंगमारी, कालर गलन आदि से हानि होती हैं। नियंत्रण के लिए 4 किग्रा. ट्राइकोडर्मा हरजेनियम प्रति हेक्टेयर की दर से 50-60 किलो गोबर की खाद में मिलाकर 15 दिन छाया में रखकर बुआई के समय भूमि में मिला दें। जड़ गलन के लिए 100 किग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश एवं 60 किग्रा. जिंक सल्फेट को बुआई से पूर्व भूमि में मिलाना भी लाभप्रद रहता है।
टिक्का रोग के नियत्रंण के लिए आधा ग्राम कार्बेण्डाजिम प्रति लीटर पानी के घोल का या 1.5 किग्रा मैन्कोजेब का प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। इसके बाद 10-15 दिन के अन्तराल पर दो बार छिड़काव और करें। छछिया रोग के लिए फसल में फूल आने से पहले गंधक अम्ल का 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव दो बार करें।
कटाईः-
मूंगफली के पकने का समय अक्टूबर से नवम्बर तक है जब 75 प्रतिशत फलियाँ पक जावे एवं पतियाँ पीली पड़ जाये तो खुदाई कर लेनी चाहिए। खुदाई से पहले कई स्थानों से पौधे उखाड़ कर जाँच कर लें। खुदाई से पूर्व हल्की सिंचाई कर दे जिससे फलियाँ टूट कर जमीन में नहीं रहती हैं।
उपजः-
गुच्छेदार किस्मों से 12-15 क्विंटल फैलने वाली किस्मों से 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हैं। सिंचित क्षेत्रों में 20-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है। फलियों के अलावा 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखा चारा भी प्राप्त होता है।
Author
मूंगफली की उन्नत खेतीः खेत की तैयारी, बीज उपचार और रोग प्रबंधन की संपूर्ण जानकारी
बबीता कुमारी, स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर।
डॉ. जुगल किशोर सिल्ला, राजस्थान कृषि अनुसन्धान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर।
डॉ तनूजा पी, महाराणा प्रताप कृषि एंव प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर।