10 Oct मखाना प्रसंस्करण एवं मूल्यवर्धन: पोषण और उद्यमिता का नया क्षितिज
1. प्रस्तावना
मखाना (Euryale ferox), जिसे ‘फॉक्स नट’ या ‘ब्लैक डायमंड’ के नाम से भी जाना जाता है, भारत की एक महत्वपूर्ण जलीय फसल है। मखाना गॉर्गन नट का पॉप्ड बीज है, जो एक बारहमासी जलीय पौधा है जो तालाबों, झीलों और आर्द्रभमिू जैसे स्थिर जल निकायों में उगता है। यह बिहार के मिथिला क्षेत्र में और पश्चिम बंगाल, असम, उत्तर प्रदशे और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में उगाया जाता है। विश्व के कुल मखाना उत्पादन का लगभग 80-90% हिस्सा अकेले भारत (मुख्यतः उत्तर बिहार) से आता है। आज के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक युग में, मखाना अपनी उच्च पोषण क्षमता और औषधीय गुणों के कारण “सुपरफूड” के रूप में उभरा है। भारत में, मखाना राजस्थान, जम्मू कश्मीर और मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों वाले सभी हिस्सों में उगता है। हालाँकि, मखाना फसल की व्यावसायिक खेती ज्यादातर बिहार के उत्तरी हिस्सों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और आस-पास के क्षेत्रों तक ही सीमित है। मखाना जिसे गोरगन नट के नाम से जाना जाता है, अपने उल्लेखनीय पोषण और औषधीय गणों के कारण वैश्विक सपरफुड के रूप में उभर रहा है। भारत वैश्विक उत्पादन में सबसे आगे है, जिसकी आपर्ति में 90 प्रतिशत की हिस्सेदारी है, जिसमें अकेले बिहार 85-90 प्रतिशत का योगदान देता है। इस के बावजद वैश्विक मखाना निर्यात में भारत की हिस्सेदारी अनपातहीन रूप से कम है। इसके उतपादन का केवल लगभग 1-2 प्रतिशत ही निर्यात किया जाता है। जैसे-जैसे पौधे-आधारित, ग्लूटन-मक्त और कार्यात्मक खाद्य पदार्थों की मां ग अतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रही है, भारत के पास वैश्विक मखाना व्यापार में अपनी स्थिति मजबत करने का एक महतवपर्ण अवसर है।
2. मखाना का पोषण संबंधी महत्व
मखाना में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और खनिज तत्वों का संतुलित मिश्रण होता है। इसमें वसा की मात्रा नगण्य होती है।
| पोषक तत्व | मात्रा (प्रति 100 ग्राम) |
|---|---|
| कार्बोहाइड्रेट | 76-77% |
| प्रोटीन | 9.7-10.5% |
| वसा | 0.1-0.5% |
| खनिज (कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन) | 0.5% |
| कैलोरी | 347-350 kcal |
नोट: मखाना ग्लूटेन-मुक्त होता है और इसमें ‘कैम्पफेरोल’ (Kaempferol) नामक फ्लेवोनोइड होता है, जिसमें एंटी-एजिंग गुण होते हैं।
3. प्रसंस्करण विधियाँ
मखाना प्रसंस्करण एक श्रमसाध्य कार्य है। वैज्ञानिकों को पारंपरिक विधि की कमियों और आधुनिक मशीनीकरण की आवश्यकता पर बल देना चाहिए।
क. पारंपरिक विधि :
- सफाई और ग्रेडिंग: बीजों को पानी से साफ करना।
- धूप में सुखाना: नमी को 25-30% से घटाकर 10% तक लाना।
- प्री-हीटिंग: लोहे की कड़ाही में भूनना।
- टेंपरिंग: बीजों को कुछ दिनों के लिए बोरों में रखना।
- रोस्टिंग और पॉपिंग: उच्च तापमान पर भूनकर लकड़ी के हथौड़े से मारना।
ख. आधुनिक मशीनीकरण :
ICAR-CIPHET और अन्य संस्थानों ने मखाना ग्रेडिंग और पॉपिंग मशीनें विकसित की हैं।
- मखाना ग्रेडर: यह बीजों को उनके आकार (5mm से 10mm) के आधार पर अलग करता है, जिससे समान पॉपिंग सुनिश्चित होती है।
- मखाना पॉपिंग मशीन: यह श्रम को कम करती है और उत्पादन क्षमता को 10-15% तक बढ़ा देती है।
4. मूल्यवर्धन विधियाँ
क. प्राथमिक मूल्यवर्धन :
किसानों के स्तर पर प्राथमिक मूल्यवर्धन से आय में 30-40% की वृद्धि की जा सकती है।
- ग्रेडिंग और सॉर्टिंग: पॉप किए हुए मखाने को उनके आकार और सफेदी के आधार पर वर्गीकृत करना।
- पॉलिशिंग: मखाने की ऊपरी सतह को साफ और चमकदार बनाने के लिए मखाना पॉलिशर का उपयोग।
- पैकेजिंग: नाइट्रोजन-फ्लश पैकेजिंग (Nitrogen-flushed packaging) ताकि उत्पाद की शेल्फ-लाइफ बनी रहे और वह कुरकुरा रहे।
ख. माध्यमिक मूल्यवर्धन: नवीन उत्पाद :
मखाना को सीधे स्नैक के रूप में या पाउडर के रूप में उपयोग करके कई उत्पाद बनाए जा सकते हैं:
- फ्लेवर्ड रोस्टेड मखाना: पेरी-पेरी, पुदीना, पनीर, चॉकलेट और गुड़ आधारित मखाना स्नैक्स।
- मखाना पाउडर (Kheer Mix): बुजुर्गों और शिशुओं के लिए इंस्टेंट खीर या सप्लीमेंट के रूप में।
- बेकरी उत्पाद: मखाना आटा मिलाकर कुकीज़, बिस्कुट और केक तैयार करना।
- मखाना पास्ता और नूडल्स: स्वास्थ्य के प्रति जागरूक युवाओं के लिए एक स्वस्थ विकल्प।
- पॉप्ड मखाना: पॉप्ड मखाना को सं साधन प्रक्रिया द्वारा, शिशुदावा के घटक/दध छुड़ाने वाले खाद्य पदार्थ के एक घटक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है । सीधे उपभोग के लिए पैक किया गया।
- बिना पका हुआ मखाना: विस्तारित स्नैक्स, पास्ता, गाढ़ा करने वाला पदार्थ।
- अन्य खाद्य पदार्थों की सामग्री के रूप में पॉपिंग के बिना डेरोकेटेड कर्नेल।
5. गुणवत्ता नियंत्रण और मानक
- नमी : तैयार मखाने में नमी 5% से कम होनी चाहिए।
- हाइजीन: प्रसंस्करण इकाई में स्वच्छता (HACCP सिद्धांतों का पालन)।
- माइकोटॉक्सिन: लंबे समय तक भंडारण के दौरान फफूंद से बचाव।
6. उप-उत्पाद प्रबंधन विधियाँ
मखाना प्रसंस्करण के दौरान निकलने वाले छिलके (Hull) और टूटे हुए दानों का भी आर्थिक महत्व है:
- मखाना हस्ट: इसे जैविक खाद या कम लागत वाले पशु आहार में शामिल किया जा सकता है।
- ब्रोकन मखाना: इसे पीसकर सत्तू या अन्य मिश्रित आटे में मिलाया जा सकता है।
7. आर्थिक व्यवहार्यता और विपणन रणनीतियाँ
मखाना उद्योग के लिए सरकारी सहायता और बाजार की समझ आवश्यक है।
पीएमएफएमई योजना (PMFME Scheme): प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण योजना मखाना उद्योग के लिए एक वरदान है, विशेष रूप से बिहार जैसे राज्यों में जहां मखाना का उत्पादन प्रमुखता से होता है। यह योजना मखाना के मूल्यवर्धन, प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करती है।
PMFME योजना के तहत मखाना के मुख्य बिंदु:
- वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP): मखाना को कई जिलों में (जैसे- दरभंगा, कटिहार, मधुबनी, पूर्णिया, सहरसा, सुपौल) ODOP के रूप में चुना गया है, जिससे इस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
- वित्तीय सहायता (सब्सिडी): मखाना प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने के लिए परियोजना लागत का 35% तक सब्सिडी (अधिकतम 10 लाख रुपये तक) मिलती है।
- मूल्यवर्धन उत्पाद: पारंपरिक मखाने को आधुनिक तकनीक से प्रोसेस कर हेल्दी ड्रिंक्स, स्नैक्स, मखाना खीर मिक्स, तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है।
- इन्क्यूबेशन सेंटर: मखाना प्रोसेसिंग के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता के लिए NIFTEM के सहयोग से इन्क्यूबेशन केंद्र उपलब्ध कराए गए हैं।
- महिला स्वयं सहायता समूह (SHG): SHG सदस्यों को मखाना प्रसंस्करण के लिए कार्यशील पूंजी के रूप में प्रति सदस्य 40,000 रुपये तक की सीड कैपिटल सहायता मिलती है।
आवेदन और पात्रता:
- कौन आवेदन कर सकता है? व्यक्तिगत सूक्ष्म उद्यम, किसान उत्पादक संगठन (FPO), स्वयं सहायता समूह (SHG), और सहकारी समितियां।
- आवेदन कैसे करें? pmfme.mofpi.gov.in पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है।
- आवश्यक दस्तावेज: आधार कार्ड, बैंक पासबुक, प्रोजेक्ट रिपोर्ट, पैन कार्ड, आदि।
मखाना के मूल्यवर्धन के माध्यम से किसान अब केवल कच्चा माल न बेचकर, प्रसंस्कृत उत्पाद बेचकर अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।
‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) के तहत मखाना प्रसंस्करण इकाइयों के लिए 35% सब्सिडी का प्रावधान।
- ब्रांडिंग: ‘मिथिला मखाना’ को मिले GI Tag का लाभ उठाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार (USA, यूरोप, खाड़ी देश) में पैठ बनाना।
- ई-कॉमर्स: अमेज़न, फ्लिपकार्ट और बिगबास्केट जैसे प्लेटफार्मों पर सीधे बिक्री।
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के वैज्ञानिकों के लिए वर्तमान परिदृश्य में, किसानों को केवल पारंपरिक उत्पादन तक सीमित न रखकर उन्हें मूल्यवर्धन और प्रसंस्करण के माध्यम से ‘कृषि-उद्यमी’ बनाना सबसे बड़ी चुनौती भी है और एक बड़ा अवसर भी।
निष्कर्ष
मखाना अब केवल एक पूजा की सामग्री नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य का पर्याय बन चुका है। KVK वैज्ञानिकों की भूमिका तकनीकी हस्तांतरण, प्रशिक्षण और क्लस्टर विकास (FPOs के माध्यम से) में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि हम “बीज से बाजार” के दृष्टिकोण को अपनाएं, तो मखाना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकता है। मखाना के मलू्यवर्धित उत्पादों में विविधीकरण भारत पारं परिक रूप से सफ़ेद पॉप्ड मखाना का उत्पादन करता है, फिर भी कच्चेबीजों और अन्य मलू्य-वर्धित उत्पादों के निर्यात की काफी सं भावनाएँ हैं। फ्लेवर्ड स्नैक्स या रेडी-टू-ईट मखाना जैसे मलू्य-वर्धित उत्पादों का विकास विविध उपभोक्ता प्राथमिकताओं को परा करता है और निर्यात मार्जिन में सधार करता है। मखाना की निर्यात क्षमता का एहसास करने के लिए, भारतीय उत्पादकों और निर्यातकों को निवेश करने की ज़रूरत है, ताकि पोषण और अन्य स्वास्थ्य लाभों के साथ इसके सपरफुड दर्जे को उजागर किया जा सके। मज़बत आपर्ति श्रृंखला स्थापित करना, गणु वत्ता प्रमाणन में निवेश करना और लगातार उत्पाद मानकों को सनिश्चित करना वैश्विक बाज़ार में भारत की प्रतिस्पर्धी स्थिति को मज़बत करेगा
Author
आकांक्षा सिंह (वैज्ञानिक खाद्य प्रसंस्करण), वी के सिंह (वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष), अंगद प्रसाद (वैज्ञानिक सस्य विज्ञान)
कृषि विज्ञान केन्द्र मऊ, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या, 224229
Email: akanksha513510@gmial.com