Scientific method of Garlic cultivation

Scientific method of Garlic cultivation

लहसुन की वैज्ञानिक तरीके से खेती

लहसुन दक्षिणी यूरोप का मूल निवासी है और पूरे भारत में मसाले या मसालों के रूप में उगाया जाता है। उड़ीसा के बाद गुजरात सबसे बड़े उत्पादक राज्य हैं। इसका उपयोग पेट की बीमारी, गले में खराश और कान में दर्द के इलाज के रूप में किया जाता है। यह आमतौर पर विभिन्न व्यंजनों की तैयारी में उपयोग किया जाता है।

 लहसुन की खेती के लि‍ए जलवायु और मिट्टी

यह जलवायु परिस्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला के तहत उगाया जाता है। हालाँकि  बहुत गर्म या बहुत ठंडा मौसम इसके लिए अनुकूल नही होता है। यह गर्मियों के साथ.साथ सर्दियों में भी मध्यम तापमान पसंद करता है। बल्ब के निर्माण के लिए लघु दिन बहुत अनुकूल हैं। इसे 1000 से 1300 मीटर की ऊंचाई पर अच्छी तरह से उगाया जा सकता है।

लहसुन को पोटाश की अच्छी मात्रा के साथ अच्छी तरह से सूखी दोमट मिट्ट की आवश्यकता होती है। रेतीली या ढीली मिट्टी पर उगाई गई फसल से उत्पादित बल्ब विकृत होते हैं और कटाई के दौरान कई बल्ब टूट जाते हैं और उखड़ जाते हैं और इसलिए वे भंडारण में अच्छी तरह से नहीं रहते हैं।

भूमि की तैयारी

लहसुन की खेती के लिए दो गहरी जुताई और इसके बाद हैरो से भूमि की जुताई करना उपयुक्त रहता है। जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाती है।इसके बाद खरपतवार निकालकर खेत को समतल कर लेते है।

उन्नत किस्मे

लहसुन की उन्नत खेती से अधिक उत्पादन के लिए अपने क्षेत्र की प्रचलित किस्म का चुनाव किया जाता है। साथ में किस्म विकार रोधी और अधिकतम पैदावार देने वाली होनी चाहिए। भारतवर्ष की जलवायु के लिए उपयुक्त और प्रचलित उन्नत किस्में इस प्रकार है।

यमुना सफेद (जी-20)  , यमुना सफेद- 2 (जी.- 50) , यमुना सफेद -3 (जी- 282), यमुना सफेद -5 (जी. 189) , एग्रीफाउण्ड व्हाइट (जी. 41) , एग्रीफाउण्ड पार्वती (जी- 313) , पार्वती (जी – 323) , जामनगर सफेद गोदावरी , सेलेक्सन- 2 , स्वेता , सेलेक्सन- 10 (टी- 56.4ए) भीमा ओंकार, भीमा पर्पल, वीएल गार्लिक. 1 और वीएल लहसुन. 2 आदि।

लहसुन प्रवर्धंन

लहसुन को क्लोव द्वारा प्रचारित किया जाता है। बल्ब के केंद्र में एक बार लंबे पतले को छोड़कर सभी लौंग लगाए जाते हैं। साइड ग्रोथ वाले बल्बों को त्याग दिया जाना चाहिए। रोग से मुक्त स्वस्थ क्लोव या बल्ब को बुवाई के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए और एक हेक्टेयर में रोपण के लिए लगभग 150 से 200 किलोग्राम लौंग की आवश्यकता होती है।

इन्हें डिबलिंग या फरो प्लांटिंग द्वारा बोया जाता है।

डिब्बलिंग वि‍धि-

खेत को छोटे प्लॉटों में बांटा जाता है जो सिंचाई के लिए सुविधाजनक होता है। क्लोव 5 से 7.5 सेंटीमीटर तक गहरे हो सकते हैं। जिससे उनका बढ़ता हुआ सिरा ऊपर की ओर हो जाता है।

उन्हें 15 सेमी की पंक्तियों में 7.5 सेमी के अलावा एक दूसरे से अलग किया जाता है और फिर उन्हें ढीली मिट्टी से ढक दिया जाता है। जून.जुलाई और अक्टूबर.नवंबर लहसुन के लिए सामान्य रोपण सीजन हैं।

फरो प्लांटिंग –

फर्र्स को हाथ से 15 सेमी बनाया जाता है  इन फरो में क्लोव को हाथ से 7.5 से 10 सेमी अलग करके गिराया जाता है। उन्हें ढीली मिट्टी से हल्के से ढंका जाता है और एक हल्की सिंचाई दी जाती है।

खाद और उर्वरक

फॉस्फोरस और पोटाश में लगभग 25 टन फार्म यार्ड खाद को 60 किलोग्राम नाइट्रोजन और 50 किलोग्राम के साथ बेसल खुराक के रूप में लगाया जाता है। 60 किग्रा नत्रजन बोने के पांच दिन बाद शीर्ष ड्रेसिंग के रूप में फिर से लगाया जाता है।

सिंचाई

पहली सिंचाई बुआई के बाद दी जाती है और फिर मिट्टी की नमी की उपलब्धता के आधार पर हर 10 से 15 दिनों में खेत की सिंचाई की जाती है। बढ़ते मौसम में नमी की कमी नहीं होनी चाहिएए अन्यथाए बल्बों का विकास प्रभावित होगा।

बल्बों को नुकसान पहुंचाए बिना इसे आसान बनाने के लिए कटाई से पहले अंतिम सिंचाई 2 से 3 दी जानी चाहिए। दक्षिण भारत की पहाड़ियों मेंए वे ज्यादातर वर्षा आधारित फसल के रूप में उगाए जाते हैं।

लहसुन मे सस्‍य क्रि‍याऐं 

बुवाई के एक महीने बाद खुरपे से मि‍टटी दी जाती है। दूसरी निराई , बुआई से लगभग ढाई महीने बाद और मिट्टी देने के एक महीने बाद की जाती है। इससे  बड़े और अच्छी तरह से भरे हुए बल्बों को स्थापित करने में मदद होती है।

फसल को बाद की अवस्था में निराई या गुड़ाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे तना खराब हो सकता है और रखने की गुणवत्ता खराब हो सकती है।

फसल कटाई

लहसुन 4.5 से 5 महीने की अवधि की फसल है। जब पत्तियां पीली या भूरी होने लगती हैं और सूखने के लक्षण दिखाती हैं तो फसल पककर तैयार हो जाती है।

इस अवस्‍था मे पौधों को एक देशी हल के साथ बाहर निकाला जाता है या उखाड़ा जाता है। पौधों को इक्‍कटठा करके छोटे बंडलों में बांध दिया जाता है। जिन्हें फिर खेत में या छाया में या 2-3 दिनों में सुखाने के लिए रखा जाता है ताकि बल्ब सख्त हो जाएं और उनकी गुणवत्ता बेहतर बनी रहे ।

बल्बों को बांस की डंडियों पर लटकाकर या  सूखी रेत पर रखकर स्टोर या भंडारण कि‍या जाता है। सूखे डंठल हटा दिए जाते हैं और बल्बों को साफ किया जाता है।

एक अच्छी तरह हवादार कमरे में 1 से 2 महीने के लिए अच्छी तरह से ठीक किए गए लहसुन के बल्ब रखे जा सकते हैं। लहसुन के बल्‍बों को यदि‍ धूल का धुआं दिया जाए तो बल्ब 8 से 10 महीने तक स्टोर किए जा सकते हैं। उन्हें 320 F पर 60% R. H. के साथ संग्रहित किया जा सकता है।

लहसुन की औसत उपज का स्तर 6 से 8 टन/ हेक्टेयर है।

कीट एवं रोग रोकथाम

थ्रिप्स: इस कीट का आक्रमण मार्च महिने में दिखाई देता है और तापमान की वृद्धि के साथण्साथ इसका प्रकोप अधिक होता हैद्य यह पत्तियों से रस चूसता हैए जिससे पत्तियां कमजोर हो जाती है तथा प्रभावी स्थान पर सफेद चकते पड़ जाते हैद्य जिसके फलस्वरूप पत्तियां मुड़ जाती है।

रोकथाम. इस कीट के नियंत्रण के लिए मेटासिस्टोक्स या मोनोक्रोटोफॉस 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव लाभकारी होता है।

चैपा (एफिड): यह पौधे से रस चूसता हैद्य जिसके कारण पौधा कमजोर हो जाता है।

रोकथाम. इसकी रोकथाम के लिए एण्डोसल्फान 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

माईट: इस कीट के प्रकोप से पत्ती का प्रभावित भाग पीला पड़ जाता है और नई पत्तियां मुडी हुई निकलती है।

रोकथाम. इसकी रोकथाम लिए घुलनशील गंधक 2 किलोग्राम प्रति हेक्टर या पैराथियोन 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टर का छिड़काव लाभदायक होता है।

भंडारण कीट: भंडारण में रखे लहसुन को कीट ;इफेस्टिया इलूटेलाद्ध की सूडी खाकर नुकसान पहुचाती है।

रोकथाम. इसके लिए 1 से 4 गोली फास्फीन प्रति घनमीटर के हिसाब से धुम्रक करने से इस कीट पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

कद सड़न: यह बीमारी मेक्रोफेमिना जनित हैए जिसका प्रकोप भंडारण में होता है।

रोकथाम. इसकी रोकथाम के लिए कंद को 2 प्रतिशत बोरिक अम्ल से उपचार करके भंडारण के लिए रखना चाहिएद्य बीज के लिए यदि कंद को रखना हो तो 0-1 प्रतिशत मरक्यूरिक क्लोराइड से उपचारित करके भण्डारण करना चाहिए।

सफेद सड़न: इस बीमारी से कलिया सड़ने लगती है। जो कि स्कलेरोशियम सेपीवोरम फफूंद जनित है।

रोकथाम. इसकी रोकथाम के लिए 2 ग्राम बावेस्टिन प्रति किलोग्राम कलिकाओं के हिसाब से बीजोपचार करना चाहिए।

तुलासिता : रोगी पौधों की पत्तियों पर सफेद फफूंद लग जाती है और सफेद धब्बे पड़ जाते हैद्य धब्बे बाद में बैंगनी रंग में बदल जाते है।

रोकथाम. इसकी रोकथाम के लिए डाईथेन एम. 45.2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करने से की जा सकती है।

फुटान: नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का अधिक प्रयोग करने से यह बीमारी फैलती है। इसके अलावा अधिक पानी और अधिक दूरी पर रोपाई के कारण फुटान अधिक होता है। इस बीमारी से लहसुन अपरिपक्व अवस्था में कई छोटे.छोटे फुटान देता हैंए जिससे कलियों का भोज्य पदार्थ वानस्पतिक वृद्धि में प्रयोग होता है।

रोकथाम. इसकी रोकथाम हेतु लहसुन की रोपाई कम दूरी पर और नाइट्रोजन व सिंचाई का प्रयोग नियंत्रित दर से करना चाहिए।


लेखक:

श्रेया राय

अनुसंधान अध्येता बागवानी (वनस्पति विज्ञान)

राजमाता विजियाराजसिन्धिया कृषी विस्वविद्यालय एम.पी.

ईमेल: shriya.tanurai@gmail.com

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