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सुगंधित एवं औषधीय पौधों की खेती और किसानों को इसके लाभ Growing medicinal and aromatic plants is a good diversification option for the farmers. These plants and their products not only serve as a valuable source of income for the farmers and entrepreneurs but also earn valuable foreign exchange through exports. Therefore, it is necessary to collect, conserve and evaluate aromatic plants to develop potential agricultural technologies for medicinal plants cultivation. सुगंधित एवं औषधीय पौधों की खेती और किसानों को इसके लाभ सुगंधित एवं औषधीय पौधे, पौधों का एक समूह है जो सुगंधित पदार्थों का उत्पादन और उत्सर्जन करता है तथा इसका उपयोग औषधीय रूप में किया जाता है ।  पौधों में सुगंध विभिन्न प्रकार के जटिल रासायनिक यौगिकों के कारण होता है अर्थात जिन पौधो का उपयोग फार्मेसी और परफ्यूमरी में किया जाता है, उन्हें आमतौर पर सुगंधित पौधों के रूप में परिभाषित किया जाता है। सुगंधित पोधै आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होते है जो दवाओं, इत्र, स्वाद और सौंदर्य प्रसाधनों के लिए बुनियादी कच्चा माल प्रदान करते हैं। सुगंधित पौधों में सुगंधित यौगिक,  मूल रूप से ऐसे आवश्यक तेल जो कमरे के तापमान पर अस्थिर हो,  होते हैं। ये आवश्यक तेल गंधयुक्त, वाष्पशील, हाइड्रोफोबिक और अत्यधिक केंद्रित यौगिक हैं। उन्हें फूल, कलियों, बीजों, पत्तियों, टहनियों, छाल, लकड़ी, फलों और जड़ों से प्राप्त किया जा सकता...

बीजीय मेथी फसल की वैज्ञानिक विधि से खेती मेथी (ट्राइगोनेला फोइनम-ग्रेइकम एल.), फेबेसी कुल के अन्तर्गत आने वाली एक वर्षीय बहुपयोगी बीजीय मसालो की एक प्रमुख फसल है। भारत में मुख्य रुप से मेथी की खेती राजस्थान , मध्यप्रदेश तथा गुजरात में की जाती है। देश की मेथी का 80 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रफल व उत्पादन अकेले राजस्थान राज्य में है, अतः इसे मेथी का कटोरा कहा जाता है| राजस्थान में मेथी उत्पादन मुख्यत: नागौर, उदयपुर, कोटा, बून्दी, झालावाड. आदि जिलो में होता है। मेथी का उपयोग सब्जियों व खाद्य पदार्थो में किया जाता है तथा इसका औषधीय महत्व भी है। इसकी हरी पत्तियों में प्रोटीन, विटामिन सी तथा खनिज लवण आदि पाये जाते हैं। इसका उपयोग भोज्य पदार्थ को सरस एवं सुगंधित बनाने में किया जाता हैं। मसालों के अतिरिक्त इसका उपयोग दवाओं में भी होता हैं। इसके बीजों में मूत्रवर्धक, शक्तिवर्धक, वायुनाशक, पोषक व कामोद्दीपक शक्ति पायी जाती है। एक फलीदार फसल होने के कारण मृदा में पाये जाने वाले राइजोबियम जीवाणु इसके पौधों की जड़ ग्रन्थियों में वातावरण की नत्रजन को स्थिर कर भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाते है। इसके दानों में ‘डायोस्जेनिन‘ नामक स्टेरोइड़ पाया जाता है, जो सेक्स हार्मोन व गर्भ निरोधक दवाओं में प्रयुक्त होता है। अतः इस पदार्थ के कारण मेथी का महत्व कई गुना बढ़ रहा है। मेथी...

लहसुन की वैज्ञानिक तरीके से खेती लहसुन दक्षिणी यूरोप का मूल निवासी है और पूरे भारत में मसाले या मसालों के रूप में उगाया जाता है। उड़ीसा के बाद गुजरात सबसे बड़े उत्पादक राज्य हैं। इसका उपयोग पेट की बीमारी, गले में खराश और कान में दर्द के इलाज के रूप में किया जाता है। यह आमतौर पर विभिन्न व्यंजनों की तैयारी में उपयोग किया जाता है।  लहसुन की खेती के लि‍ए जलवायु और मिट्टी यह जलवायु परिस्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला के तहत उगाया जाता है। हालाँकि  बहुत गर्म या बहुत ठंडा मौसम इसके लिए अनुकूल नही होता है। यह गर्मियों के साथ.साथ सर्दियों में भी मध्यम तापमान पसंद करता है। बल्ब के निर्माण के लिए लघु दिन बहुत अनुकूल हैं। इसे 1000 से 1300 मीटर की ऊंचाई पर अच्छी तरह से उगाया जा सकता है। लहसुन को पोटाश की अच्छी मात्रा के साथ अच्छी तरह से सूखी दोमट मिट्ट की आवश्यकता होती है। रेतीली या ढीली मिट्टी पर उगाई गई फसल से उत्पादित बल्ब विकृत होते हैं और कटाई के दौरान कई बल्ब टूट जाते हैं और उखड़ जाते हैं और इसलिए वे भंडारण में अच्छी तरह से नहीं रहते हैं। भूमि की तैयारी लहसुन की खेती के लिए दो गहरी जुताई और इसके बाद हैरो से भूमि की जुताई करना उपयुक्त रहता है। जिससे...

Scientific cultivation of Turmeric हल्दी की खेती सामान्यत: सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। उचित जलनिकास वाली बलुई दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की अच्छी मात्रा हो, हल्दी के लिये उपयुक्त होती है। इसकी अच्छी पैदावार के लिये भूमि का पी एच मान 5.0-7.5 के बीच होना चाहिए। चिकनी मिट्टी, क्षारीय भूमियों तथा पानी ठहरने वाले स्थान पर विकास रुक जाता है। इसकी खेती बगीचों में अंतरवर्तीय फसल के रूप में भी की जा सकती है। हल्दी की खेती के लि‍ए भूमि हल्दी की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता होती है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक हैं। मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करके 3-4 बार कल्टीवेटर या हैरो से जुताई करना चाहिए। हल्दी की उन्नतशील प्रजातियाँ सुगंधा, रोमा, सुरोमा, सी.ओ.-1, कृष्णा, राजेन्द्र सोनिया, सुगुना, सुदर्शन,सुवर्णा, प्रभा, प्रतिभा. हल्‍दी में बीज की मात्रा बीज की मात्रा प्रकन्दों के आकार व बोने की विधि पर निर्भर करता है। शुद्ध फसल बोये जाने के लिये 20-25 क्विंटल जबकि मिश्रित फसल हेतु 12-15 क्विंटल प्रकन्द की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। प्रकन्द 7-8 सेमी लम्बे तथा कम से कम दो आंखों वाले होने चाहिये। यदि कन्द बड़े हो तो उन्हे काटकर बुवाई की जा...

Chironji – A tree of immense potential चिरौंजी आमतौर पर शुष्क पर्णपाती जंगलों में पाए जाने वाला वृक्ष है। इसकी औसतम ऊँचाई १०-१५ मीटर तक पाई जाती है|  भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पन्न चिरौंजी के वृक्ष उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भारत के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती जंगलों में आमतौर पर मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में पाया जाता है| यह पेड भारत के माध्यम से, अन्य देशो जैसे बर्मा और नेपाल तक पहुच चूका है (हेमवती और प्रभांकर, १९८८)| चिरौंजी को इसके उच्च मूल्य वाले कर्नेल (चिरौंजी के दाने) के लिए जाना जाता है| सूखे मेवों या सूखे फलों में बादाम की तरह ही चिरौंजी का स्थान है। चिरौंजी के गुण व उपयोग: यह बहुउद्देशीय वृक्ष स्थानीय समुदाय को भोजन, ईंधन, चारा, लकड़ी और दवा प्रदान करता है। इसके कर्नेल से निकले तेल गर्दन के ग्रंथियों में हुए सूजन को ठीक करने में उपयोगी है। चिरौजी कर्नेल पेस्ट त्वचा के लिए बहुत ही अच्छा कंडीशनर है| फल के अलावा, इसकी छाल का उपयोग प्राकृतिक वार्निश के लिए भी किया जाता है। पेड़ के तने से प्राप्त गोंद वस्त्र उद्योग में उपयोग किया जाता है तथा यह दस्त, अंदरूनी और संधिशोथ दर्द के उपचार में भी उपयोगी है| इसकी पत्तियों का उपयोग त्वचा रोगों के उपचार में किया जाता है। फल का...