24 Sep ग्रीष्मकाल में ऊँटों का बेहतर प्रबंधन
ऊँट को भले ही “रेगिस्तान का जहाज” कहा जाता है, क्योंकि वह अत्यधिक गर्मी, सूखे वातावरण और पानी की कमी जैसी कठिन परिस्थितियों में भी लंबे समय तक जीवित रहने की अद्भुत क्षमता रखता है। राजस्थान जैसे शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में ऊँट ग्रामीण परिवारों के लिए परिवहन, कृषि कार्य और आजीविका का महत्वपूर्ण साधन रहा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ऊँट गर्मी से पूरी तरह अप्रभावित रहता है। ग्रीष्म ऋतु में लगातार खेतों में जुताई, गाड़ी या छकड़ा खींचने तथा बोझा ढोने जैसे भारी कार्य लेने से ऊँट में निर्जलीकरण, थकावट, शरीर का तापमान बढ़ना, भूख में कमी और कार्यक्षमता में गिरावट हो सकती है। इसलिए गर्मियों में ऊँट के लिए संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, छाया, उचित विश्राम और वैज्ञानिक श्रम प्रबंधन बेहद जरूरी है।
1. पानी की पर्याप्त व्यवस्था सबसे जरूरी
ऊँट कई दिनों तक बिना पानी के रह सकता है, लेकिन गर्मी में नियमित रूप से पानी उपलब्ध कराना उसके स्वास्थ्य और कार्यक्षमता के लिए अत्यंत आवश्यक है। विशेष रूप से जब ऊँट से लगातार काम लिया जा रहा हो, तब पानी की आवश्यकता बढ़ जाती है।
- ऊँट को साफ एवं स्वच्छ पानी उपलब्ध कराएं।
- पानी की उपलब्धता मौसम, काम की तीव्रता, चारे और ऊँट की शारीरिक स्थिति के अनुसार रखें।
- अत्यधिक गर्मी में काम करने वाले ऊँट को काम के बाद पर्याप्त मात्रा में पानी दें।
- पानी की टंकी या नांद को साफ रखें और उसमें गंदगी या गोबर न जाने दें।
- बहुत गर्म पानी के बजाय सामान्य तापमान का स्वच्छ पानी देना बेहतर है।
- ऊँट को लंबे समय तक पानी से वंचित रखकर भारी काम नहीं लेना चाहिए।
ध्यान रखें:
पानी में नियमित रूप से अधिक मात्रा में नमक मिलाकर पिलाना आवश्यक नहीं है। नमक एवं इलेक्ट्रोलाइट की जरूरत पशु की स्थिति और आहार पर निर्भर करती है। अत्यधिक नमक नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए विशेष रूप से निर्जलीकरण या बीमारी की स्थिति में पशुचिकित्सक की सलाह लेना उचित है।
2. छाया और गर्मी से बचाव
दोपहर के समय जब सूर्य की गर्मी अत्यधिक हो, ऊँट को खुले में बांधकर नहीं रखना चाहिए।
- ऊँट के लिए घनी छाया और हवादार स्थान की व्यवस्था करें।
- खेजड़ी, नीम या अन्य बड़े पेड़ों की छाया उपयोगी हो सकती है।
- जहां प्राकृतिक छाया उपलब्ध नहीं हो, वहां हवादार छप्पर या शेड बनाया जा सकता है।
- शेड की छत ऐसी हो कि अंदर हवा का आवागमन बना रहे।
- गर्मी के चरम समय में ऊँट को अनावश्यक रूप से धूप में खड़ा न रखें।
अत्यधिक गर्मी के दौरान ऊँट में तेज हांफना, अत्यधिक कमजोरी, लड़खड़ाना, असामान्य व्यवहार या काम करने से मना करना दिखाई दे तो उसे तुरंत काम से हटाकर छायादार एवं हवादार स्थान पर ले जाएं और पशुचिकित्सक से संपर्क करें।
3. काम लेने का सही समय—श्रम प्रबंधन
गर्मी में ऊँट से काम लेने का समय उसकी सेहत पर सीधा प्रभाव डालता है। तेज धूप में लगातार काम लेने से ऊँट में गर्मी का तनाव बढ़ सकता है। जहां संभव हो, भारी काम सुबह जल्दी और शाम के समय करवाना बेहतर है। उदाहरण के लिए, सुबह लगभग 5 बजे से 10–11 बजे तक काम लेने के बाद पर्याप्त विश्राम दिया जा सकता है। दोपहर के अत्यधिक गर्म समय में, विशेषकर लगभग 12 बजे से 4 बजे तक, भारी काम से बचना चाहिए। काम की अवधि ऊँट की उम्र, स्वास्थ्य, तापमान, कार्य की प्रकृति और भार के अनुसार तय करें। एक ही ऊँट से लगातार कई घंटे भारी काम लेना उचित नहीं है। बीच-बीच में विश्राम और पानी की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।
4. संतुलित आहार दें
गर्मियों में केवल सूखे चारे पर निर्भर रहने से कार्यरत ऊँट की ऊर्जा और पोषक तत्वों की आवश्यकता पूरी नहीं हो सकती। इसलिए आहार में उपलब्धता के अनुसार हरा चारा, सूखा चारा और आवश्यकतानुसार दाना मिश्रण शामिल करें।
ऊँट को स्थानीय रूप से उपलब्ध चारे जैसे—
- चने का भूसा/खाखला
- ग्वार का फालचा
- मूंग एवं मोठ का चारा
- अन्य उपयुक्त सूखे चारे
- खेजड़ी की पत्तियां एवं फलियां
- उपलब्ध हरा चारा दिया जा सकता है।
हरा चारा पानी, विटामिन और कुछ आवश्यक पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत होता है। हालांकि, चारे में अचानक बहुत अधिक परिवर्तन करने के बजाय धीरे-धीरे बदलाव करना बेहतर होता है।
5. काम करने वाले ऊँटों के लिए दाना मिश्रण
जो ऊँट खेतों में जुताई करते हैं, छकड़ा या गाड़ी खींचते हैं अथवा लगातार भारी काम करते हैं, उनकी ऊर्जा की आवश्यकता सामान्य ऊँट की तुलना में अधिक हो सकती है। स्थानीय उपलब्धता के अनुसार जौ, चना, बाजरा और ग्वार जैसे खाद्य पदार्थों से दाना मिश्रण तैयार किया जा सकता है। इसकी वास्तविक मात्रा ऊँट के शरीर के वजन, काम की तीव्रता, चारे की गुणवत्ता और शारीरिक स्थिति के अनुसार निर्धारित करनी चाहिए। दाना साफ, सूखा और फफूंद रहित होना चाहिए। अत्यधिक मात्रा में दाना एक साथ देने के बजाय उचित मात्रा को विभाजित करके देना पाचन के लिए बेहतर हो सकता है।
महत्वपूर्ण:
दाने की मात्रा सभी ऊँटों के लिए समान नहीं होती। इसलिए 2–3 किलोग्राम को हर ऊँट के लिए निश्चित मात्रा मानने के बजाय पशु की आवश्यकता के अनुसार राशन तय करना अधिक वैज्ञानिक है।
6. खनिज मिश्रण और नमक
गर्मियों में पसीना, कार्यभार और चारे की गुणवत्ता के कारण कुछ खनिजों की आवश्यकता बढ़ सकती है। पशुचिकित्सक या पशु पोषण विशेषज्ञ की सलाह से ऊँट के आहार में उपयुक्त मिनरल मिक्सचर शामिल किया जा सकता है। नमक की आवश्यकता भी ऊँट के आहार और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। आवश्यकता से अधिक नमक खिलाने या पानी में अधिक मात्रा में नमक मिलाने से बचें।
7. पारंपरिक आहार एवं देशी उपाय
राजस्थान के पशुपालकों में गर्मियों में ऊँटों को प्याज, जौ का सत्तू तथा विभिन्न स्थानीय पेड़ों की पत्तियां खिलाने जैसी पारंपरिक प्रथाएं प्रचलित हैं। इनका उपयोग स्थानीय ज्ञान के रूप में किया जाता रहा है।
प्याज: कुछ पशुपालक गर्मी में ऊँट को प्याज खिलाते हैं। हालांकि इसे लू से बचाव का निश्चित वैज्ञानिक उपचार नहीं माना जाना चाहिए। मुख्य बचाव पर्याप्त पानी, छाया और उचित कार्य प्रबंधन ही है।
जौ का सत्तू: जौ से तैयार सत्तू को पानी के साथ दिया जाना स्थानीय स्तर पर ऊर्जा एवं आहार पूरक के रूप में उपयोग किया जाता है। इसे स्वच्छता और उचित मात्रा का ध्यान रखते हुए दिया जाना चाहिए।
8. पेड़ों की पत्तियां—प्राकृतिक चारा स्रोत
ऊँट विभिन्न प्रकार की झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियां खाने के लिए अनुकूलित है। राजस्थान में खेजड़ी (लूम), बबूल/कीकर, बेर तथा अन्य स्थानीय पेड़-पौधों की पत्तियां एवं फलियां ऊँट के आहार का हिस्सा हो सकती हैं। हालांकि, किसी भी पौधे को औषधि के रूप में अत्यधिक मात्रा में देने से पहले उसकी पहचान और सुरक्षित मात्रा सुनिश्चित करना जरूरी है। नीम की पत्तियों को पारंपरिक रूप से विभिन्न पशु स्वास्थ्य समस्याओं में उपयोग किया जाता है, लेकिन इसे हर त्वचा रोग या बीमारी की निश्चित चिकित्सा नहीं माना जाना चाहिए।
9. सर्रा रोग से बचाव
सर्रा (Trypanosomiasis) ऊँटों में एक महत्वपूर्ण संक्रामक बीमारी है। यह रक्त चूसने वाले कीटों, विशेषकर टैबेनिड मक्खियों आदि के माध्यम से फैल सकती है।
इसके प्रमुख लक्षणों में—
- बार-बार या रुक-रुक कर बुखार
- कमजोरी एवं वजन कम होना
- शरीर की स्थिति खराब होना
- भूख में कमी
- कार्यक्षमता में गिरावट
- गंभीर स्थिति में तंत्रिका संबंधी लक्षण देखे जा सकते हैं।
सर्रा की आशंका होने पर घरेलू उपचार पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत पशुचिकित्सक से जांच एवं उपचार करवाना चाहिए।
बचाव के लिए—
- बाड़े एवं आसपास की स्वच्छता रखें।
- मक्खियों की संख्या कम करने के उपाय करें।
- पानी जमा न होने दें।
- पशुओं को अनावश्यक रूप से कीटों से प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय तक न रखें।
- पशुचिकित्सक की सलाह से उपयुक्त कीट नियंत्रण उपाय अपनाएं।
10. खुजली एवं त्वचा रोगों से बचाव
गर्मी में पसीना, धूल, गंदगी और बाहरी परजीवियों के कारण ऊँटों में त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। खुजली, बाल झड़ना, त्वचा पर घाव या लालिमा दिखाई देने पर कारण की पहचान जरूरी है। ऊँट को साफ रखें और समय-समय पर त्वचा की जांच करें। अत्यधिक उमस या गंदगी की स्थिति में साफ पानी से नहलाना उपयोगी हो सकता है। आइवरमेक्टिन जैसे परजीवीरोधी उपचार का प्रयोग पशुचिकित्सक की सलाह से ही करें, क्योंकि इसकी खुराक ऊँट के वजन, समस्या और उपचार की आवश्यकता के अनुसार तय की जानी चाहिए।
11. फिटकरी को लेकर सावधानी
कुछ क्षेत्रों में ऊँट को फिटकरी खिलाने की पारंपरिक प्रथा देखने को मिलती है और इसे पेट के कीड़ों या पाचन सुधारने के लिए उपयोग किया जाता है। लेकिन फिटकरी को नियमित रूप से कृमिनाशक के रूप में देना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं माना जाना चाहिए। पेट के कीड़ों की समस्या की पुष्टि होने पर उचित कृमिनाशक दवा और उसकी खुराक पशुचिकित्सक की सलाह से तय करनी चाहिए।
12. गर्भित ऊँटनी की विशेष देखभाल
गर्भित ऊँटनी को गर्मियों में विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है।
- अत्यधिक गर्मी में भारी काम न करवाएं।
- पर्याप्त पानी और पौष्टिक आहार दें।
- दोपहर की तेज धूप से बचाएं।
- शरीर की स्थिति और भूख पर नियमित नजर रखें।
- प्रसव के नजदीक आने पर उसे शांत और स्वच्छ स्थान उपलब्ध कराएं।
13. छोटे बच्चों—टोरडी/बोटा की देखभाल
छोटे ऊँट के बच्चे गर्मी और निर्जलीकरण के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। उन्हें तेज धूप में लंबे समय तक बांधकर न रखें।
बच्चों के लिए—
- पर्याप्त दूध सेवन सुनिश्चित करें।
- साफ एवं हवादार छायादार स्थान उपलब्ध कराएं।
- अत्यधिक गर्मी में अनावश्यक दौड़ या श्रम न करवाएं।
- कमजोरी, दस्त, भूख में कमी या असामान्य व्यवहार दिखाई देने पर तुरंत पशुचिकित्सकीय सलाह लें।
14. लू से बचाव के मुख्य उपाय
ऊँट गर्मी सहने में सक्षम है, लेकिन अत्यधिक तापमान और लगातार श्रम की स्थिति में हीट स्ट्रेस हो सकता है। इससे बचाव के लिए—
- सुबह जल्दी और शाम को काम करवाएं।
- दोपहर में भारी काम से बचें।
- पर्याप्त पानी उपलब्ध रखें।
- घनी छाया और हवादार शेड उपलब्ध कराएं।
- लंबे समय तक खुले सूरज में खड़ा न रखें।
- काम के दौरान नियमित विश्राम दें।
- गर्भित ऊँटनी और छोटे बच्चों पर विशेष ध्यान दें।
- कमजोरी या असामान्य व्यवहार दिखाई देने पर तुरंत काम बंद करें।
निष्कर्ष
ऊँट कठोर जलवायु में रहने वाला अत्यंत सहनशील पशु है, लेकिन “रेगिस्तान का जहाज” होने का अर्थ यह नहीं कि उसे गर्मी में बिना पानी, बिना छाया और लगातार भारी काम कराया जाए। गर्मियों में ऊँट की बेहतर देखभाल के लिए पर्याप्त स्वच्छ पानी, पौष्टिक एवं संतुलित आहार, हवादार छाया, उचित श्रम एवं विश्राम, स्वच्छता तथा रोगों की समय पर पहचान आवश्यक है। पारंपरिक ज्ञान जैसे प्याज, जौ का सत्तू तथा स्थानीय पेड़ों की पत्तियों का उपयोग कई पशुपालक लंबे समय से करते आए हैं, लेकिन इन्हें वैज्ञानिक पशुचिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। विशेष रूप से सर्रा, गंभीर त्वचा रोग, कृमि संक्रमण, तेज बुखार, अत्यधिक कमजोरी या लू के लक्षणों में घरेलू उपचार करने के बजाय योग्य पशुचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। स्वस्थ ऊँट ही अधिक समय तक स्वस्थ, सक्रिय और कार्यक्षम रह सकता है।
लेखक
डॉ. विनय कमार
पीएचडी स्कॉलर, वेटरनरी कॉलेज, बीकानेर
डॉ. संदीप कमार
पीएचडी स्कॉलर, वेटरनरी कॉलेज, बीकानेर