Resource Management

उर्वरक दक्षता और कृषि लाभप्रदता बढ़ाने के लिए साइट विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन (SSNM) Agriculture is the major land use across the globe. The sustainability of our world depends fundamentally on nutrients. Most of the agricultural production system worldwide facing the insufficient access to nutrients still limits food production and contributes to land degradation.  Adoption of precision technologies for more efficient use of resources and nutrients becomes more relevant in the current production scenario. Site-specific nutrient management (SSNM) involving use of inorganic or organic sources along with spatial and temporal soil variability, crop requirements of nutrients and cropping systems, soil capacity to supply nutrients, utilization efficiency of the nutrient and productive capacity...

अपशिष्ट जल से भारी धातुओं को हटाने के लिए नैनोकणों का उपयोग Heavy metals are some of the most serious environmental pollutants, particularly in water and soil. Heavy metal pollution poses a risk to the environment, and it can be detrimental to human health via the food chain. Thus, it is very important to determine effective methods for remediating heavy metal contamination. Heavy metals in wastewater can have detrimental effects on all forms of life when discharged directly into the environment. The introduction of heavy metals into water is a growing and serious environmental and public health concern because of the toxicity of heavy metals and their non-biodegradable nature. Many technologies have been...

Summer Deep Plowing: Agricultural Activity with Many Benfits जैविक कारक जैसे कि पादप रोग, निमेटोड, कीट-पतंगे एवं खरपतवार कृषि उत्पादन में बाधक है, जिनके कारण सभी प्रकार की फसलों को व्यापक हानी होती है । अत: लाभदायक फसल उत्पादन के लिए इनका नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है । मृदा जनित पादप रोगों के रोगजनक जैसे कि फ्यूजेरियम, मैक्रोफोमिना फेजोलिना इत्यादि मोनो-क्रॉपिंग (लगातार खेत में एक ही फसल लेना जैसे कि खरीफ सीजन में बाजरा तथा रबी सीजन में गेहूँ की फसल उगाना) सिस्टम में आसानी से अपनी संख्या बढाते रहते हैं । एक बार जब ये रोगज़नक़ मिट्टी के पारिस्थितिकी तंत्र में स्थापित हो जाते हैं तो इनको नियंत्रण करना बेहद मुश्किल...

Composite Hydrologic Index: Groundwater recharge estimation tool भूजल , पुनर्भरण वर्षा, भू-आकृति, मिट्टी के प्रकार और भूमि उपयोग, जलवायु और क्षेत्र के भूगर्भीय कारक पर निर्भर करता है। पिछले कुछ वर्षों में, भूजल पुनर्भरण में कमी आई है तथा भूजल का उपयोग बढ़ गया है। इसके परिणाम स्वरूप भारत के कई हिस्सों में पानी की गंभीर समस्या हो गई है। सिंचाई और घरेलू उपयोग के लिए पानी प्रदान करना एक प्रमुख चुनौती बन गया है। इसे सतह और भूजल संसाधनों के प्रबंधन के एकीकृत दृष्टिकोण से हल किया जा सकता है। जैसा की हम जानते हैं, भूजल पुर्नभरण और भूजल की मात्रा में बढ़ोतरी वर्षा के जल पर  निर्भर करता है।...

Fertigation system in micro irrigation जब ड्रिप सिंचाई प्रणाली में जल के साथ - साथ उर्वरक , कीटनाशी एवं अन्य घुलनशील रासायनिक को सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है, इस प्रणाली को फर्टिगेशन कहा जाता है । परंपरागत विधि की तुलना में इसमें जल के साथ रासायनिक उर्वरकों की भी अधिक मात्रा में बचत होती है एवं रसायन और उर्वरकों का दक्ष उपयोग होता है । फर्टिगेशन के लाभ पौधों को सही मात्रा में पानी और उर्वरक मिलता है । रासायनिक उर्वरक पानी के साथ मिलकर सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचते है जिससे पौधे उनको आसानी से अवशोषण करते है । जमीन के अन्य भाग में रसायन तत्व नहीं डाले जाते...

Importance of Bounding in Soil and Water Conservation मेढ़ बंधीकरण (बंडिंग) सीमांत, ढलान एवं पहाड़ी भूमि के लिए एक पारंपरिक, कम लागत वाला ,सरल भूमि प्रबंधन अभ्यास है । यह तकनीक  मृदा - अपरदन को नियंत्रित करने, जल प्रतिधारण को बढ़ाने एवं फसल उत्पादन में वृद्धि हेतु सफलतापूर्वक उपयोग की जाती है। मेढ़ (बंड) एक मिट्टी की तटबंध है जिसे ढलान को नियंत्रित करने के लिए बनाया जाता है, एवं ढलान की लंबाई को कम करके मृदा-अपरदन को कम किया जाता है। यह मृदा-अपरदन को नियंत्रित करने के लिए एक यांत्रिक / अभियांत्रिकीय विधि है। इस अभियांत्रिकीय उपाय में मुख्य रूप से ढलान वाली भूमि सतह का संशोधन करके बहते हुए जल को...

Bio-drainage is an eco-friendly solution for waterlogged areas भारत में कुल जलाक्रांत भूमि लगभग 7 मिलियन हेक्टेयर है।  परंपरागत जल निकासी प्रणाली या ड्रेनेज को सतहजल तथा धरातल जल निकासी पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। इसका तात्पर्य है की आवश्यकता से ज्यादा या अतिरिक्त पानी को मिट्टी की सतह और मिट्टी की प्रोफाइल से हटाना है। जल निकास प्रणाली को शुरुआत में बनाने के लिए अधिक पूंजी निवेश, संचालन और रखरखाव की आवश्यकता होती है। इस समस्या को सुलझाने के लिए जैविक जल निकासी या जैव जल निकासी तकनीक को एक संभावित विकल्प केरूप मे प्रयोग कि‍या जा सकता है। दुनिया का लगभग एक तिहाई सिंचित क्षेत्र में जलाक्रांत या...

Combined use of surface and groundwater for good farming भूजल का तातपर्य यह है की जो जल जमीन के निचली सतह में पाया जाता है। जैसा की हम जानते है, भारत दुनिया का सबसे ज्यादा भूजल उपयोग करने वाला देश है और यह ग्रामीण इलाकों में पेयजल का पच्चासी प्रतिशत आपूर्ति करता है। भारत देश में भूजल का सबसे ज्यादा उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है, जो की कृषि के लिए किए गये कुल सिंचाई पानी उपयोग का पच्चासी प्रतिशत है। हमारे इस भारत देश में प्रकृति द्वारा प्राप्त सतह और भूजल प्रयाप्त मात्रा में उपस्थिस्थ है, जो की असमान रूप से पूरे देश में वितरित है। दिन व दिन, हमारे...