Agriculture Knowledge for Everyone

Resource Management

Importance of Bounding in Soil and Water Conservation मेढ़ बंधीकरण (बंडिंग) सीमांत, ढलान एवं पहाड़ी भूमि के लिए एक पारंपरिक, कम लागत वाला ,सरल भूमि प्रबंधन अभ्यास है । यह तकनीक  मृदा - अपरदन को नियंत्रित करने, जल प्रतिधारण को बढ़ाने एवं फसल उत्पादन में वृद्धि हेतु सफलतापूर्वक उपयोग की जाती है। मेढ़ (बंड) एक मिट्टी की तटबंध है जिसे ढलान को नियंत्रित करने के लिए बनाया जाता है, एवं ढलान की लंबाई को कम करके मृदा-अपरदन को कम किया जाता है। यह मृदा-अपरदन को नियंत्रित करने के लिए एक यांत्रिक / अभियांत्रिकीय विधि है। इस अभियांत्रिकीय उपाय में मुख्य रूप से ढलान वाली भूमि सतह का संशोधन करके बहते हुए जल को संरक्षित किया जाता है एवं इस जल के बहाव से उत्पन्न होने वाले मृदा क्षरण/ कटाव में कमी आती है। मेढ़ बंधीकरण के मुख्य उद्देश्य: (i) यह भूमि सतह पर जल के ठहराव के समय को बढ़ाता है एवं  भूमि के जल स्तर को बढ़ाने में सहायता करता है, (ii) कई बिंदुओं पर बाधा उत्पन्न करके जलप्रवाह गति  को कम करता है, एवं (iii) मिट्टी को जल के प्रवाह से होने वाले क्षरण से बचाता है। मेड़ (बंड्स ) के प्रकार एवं उनको बनाने के तरीके मेड़ एक तटबंध है जिसका निर्माण  भूमि ढलान कि लंबवत दिशा में किया जाता है । खेतों में मृदा क्षरण...

Bio-drainage is an eco-friendly solution for waterlogged areas भारत में कुल जलाक्रांत भूमि लगभग 7 मिलियन हेक्टेयर है।  परंपरागत जल निकासी प्रणाली या ड्रेनेज को सतहजल तथा धरातल जल निकासी पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। इसका तात्पर्य है की आवश्यकता से ज्यादा या अतिरिक्त पानी को मिट्टी की सतह और मिट्टी की प्रोफाइल से हटाना है। जल निकास प्रणाली को शुरुआत में बनाने के लिए अधिक पूंजी निवेश, संचालन और रखरखाव की आवश्यकता होती है। इस समस्या को सुलझाने के लिए जैविक जल निकासी या जैव जल निकासी तकनीक को एक संभावित विकल्प केरूप मे प्रयोग कि‍या जा सकता है। दुनिया का लगभग एक तिहाई सिंचित क्षेत्र में जलाक्रांत या जलभराव की समस्या है। जलाक्रांत क्षेत्र में बढ़ौतरी के मुख्य कारण नहरों से रिसाव, खारे भूजल के निकास में कमी, नहर के पानी से सतही सिंचाई और प्राकृतिक जल निकासी की अनुपस्थिति हैं। जलभराव, पर्यावरण प्रदुषण जैसे पानी और मृदा में नमक बढ़ाने जैसी समस्या भी उत्पन करती है। जैव जल निकासी तकनीक के अन्तर्गत पौधों के माध्यम से मिट्टी के पानी की ऊर्ध्वाधर जल निकासी करते है। इस तकनीक के तहत जलाक्रांत क्षेत्र से पानी को पौधों के वाष्पन-उत्सर्जन प्रतिक्रिया के द्वारा जल निकासी करते है। यह तकनीक अन्य जल निकास तकनीक की तुलना में कम पूंजी निवेशी है साथ...

Combined use of surface and groundwater for good farming भूजल का तातपर्य यह है की जो जल जमीन के निचली सतह में पाया जाता है। जैसा की हम जानते है, भारत दुनिया का सबसे ज्यादा भूजल उपयोग करने वाला देश है और यह ग्रामीण इलाकों में पेयजल का पच्चासी प्रतिशत आपूर्ति करता है। भारत देश में भूजल का सबसे ज्यादा उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है, जो की कृषि के लिए किए गये कुल सिंचाई पानी उपयोग का पच्चासी प्रतिशत है। हमारे इस भारत देश में प्रकृति द्वारा प्राप्त सतह और भूजल प्रयाप्त मात्रा में उपस्थिस्थ है, जो की असमान रूप से पूरे देश में वितरित है। दिन व दिन, हमारे देश में सतह जल का आभाव होता जा रहा है और भूजल का कृषि के लिए उपयोग बढ़ता जा रहा है जो की हम्रारे देश की खेती के लिए बहुत बड़ा संकट बन सकता है। सतह जल का आभाव का तातपर्य यह है की हमारे देश में वर्षा जल की कमी होती जा रही है, जो की हमारे देश की कृषि के लिए सही संकेत नहीं है। जैसा की हमलोग जानते है की हमारे देश की लगभग साठ प्रतिशत कृषियोग भूमि बर्षा पर आधारित है। बर्षा का जल सतह जल और भूजल की उपस्तिथि का सबसे बड़ा वाहक है। आज हमारे देश...

Management of degradation in groundwater level मिट्टी में जरूरत के मुताबिक नमी का होना बहुत जरूरी है । खेत की तैयारी से लेकर फसल की कटाई तक मिट्टी में एक निश्चित नमी रहनी चाहिए । कितनी नमी हो यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा कार्य करना है और मिट्टी की बनावट कैसी है । जैसे बलुवाही मिट्टी में कम नमी रहने से भी जुताई की जा सकती है, लेकिन चिकनी मिट्टी में एक निश्चित नमी होने से ही जुताई हो सकती है । इसी तरह अलग-अलग  फसलों के लिए अलग-अलग  नमी रहनी चाहिए । जैसे -धान के लिए अधिक नमी की जरूरत है लेकिन बाजरा, कौनी वगैरह कम नमी में भी उपजाई जा सकती है| पौधों के लिए आवश्यक नमी का होना बहुत ही जरूरी है । क्योंकि नमी के चलते ही पौधों की जड़ें फैलती हैं और पौधे नमी के साथ ही मिट्टी से अपना भोजन लेते हैं । साथ ही मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणु भी मिट्टी में हवा और पानी के एक निश्चित अनुपात में ही अपना काम कर पाते हैं और पौधों के लिए भोजन तैयार करते हैं । पठारी क्षेत्रों में सिचाई की क्षमता काफी कम है । यहाँ खरीफ में केवल सात प्रतिशत जमीन में ही सिंचाई हो सकती है, जबकि रबी के मौसम में...

Importance of water use efficiency in wheat crop कृषि, उधोग तथा घरेलू उपयोगों में पानी की लगातार बढ़ती हुई मांग के मध्यनजर भविष्य में पर्याप्त जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक वैश्विक चुनौती है। वैश्विक स्तर पर कृषि सम्बंधित कार्यों के लिए लगभग 70 प्रतिशत जल का उपयोग हो रहा है जो सर्वाधिक है। हालांकि अच्छी गुणवत्ता वाले जल का सिंचाई में प्रयोग काफी सीमित है, किन्तु लगातार बढ़ते हुए शुष्क क्षेत्रों एवं पर्यावरण के बदलते रूप के कारण पानी की बढ़ती कमी एक चिंतनीय विषय है। बदलते जलवायु परिवेश के संदर्भ में न केवल उपलब्ध जल का विवेकपूर्ण उपयोग जरूरी है अपितु कम जल उपयोग द्वारा अच्छा उत्पादन देने वाली तकनीकों की भी पूरे विश्व को आवश्यकता है। अतः कृषि के क्षेत्र में जल उपयोग को सीमित करने के लिए ऐसी फसल प्रजातियां विकसित करनी होंगी जो कम सिंचाई में नहीं बल्कि, भूमि में उपस्थित संरक्षित जल का उपयोग करके भी फसल उत्पादन में सुधार करने में सक्षम हों। जल उपयोग दक्षता उत्पादन वृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। अधिक जल उपयोग दक्षता के लिए वांछनिय विशेषता युक्त प्रजातियां तथा सिंचाई के उपयुक्त तरीकों का उपयोग अत्यंत आवश्यक है। वर्षा की कमी, बढती जल मांग तथा बढ़ते तापमान के कारण भूमि का जल स्तर लगातार घटता जा रहा है। जिसके कारण शुष्क भूमि...

Why should farmers adopt drip irrigation? ड्रिप सिंचाई व्यवस्था सिंचाई की एक उन्नत तकनीक है जो पानी की बचत करता है । इस विधि में पानी बूंद-बूंद करके पौधे या पेड़ की जड़ में सीधा पहुँचाया जाता है जिससे पौधे की जड़े पानी को धीरे-धीरे सोखते रहते है। इस विधि में पानी के साथ उर्वरको को भी सीधा पौध जड़ क्षेत्र में पहुँचाया जाता है जिसे फ्रटीगेसन कहते है । फ्रटीगेसन विधि से उर्वरक लगाने में कोई अतिरिक्त मानव श्रम का उपयोग नही होता है। अत% यह एक तकनीक है जिसकी मदद से कृषक पानी व श्रम की बचत तथा उर्वरक उपयोग दक्षता में सुधार कर सकता है।   ड्रिप सिंचाई कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों के लिए एक सफल तकनीक है। जिसमे स्थाई या अस्थाई ड्रिपर लाइन जो पौधे की जड़ के पास या निचे स्तिथ होते है । आज के परिद्रश्य में पानी की कमी से हर देश, हर राज्य, हर क्षेत्र जूझ रहा है तथा समय के साथ यह समस्या विकराल होती जा रही है। इसलिए जहाँ भी पानी का उपयोग होता है। वहाँ हमे जितना भी संभव हो इसकी बचत करनी चाहिए । पानी का अत्यधिक उपयोग कृषि में ही होता है। इसलिए इसकी सबसे अधिक बचत भी यहीं ही संभव है। और हमें इसे बचाना चाहिए । इस मुहीम...

Why farmers should adopt drip irrigation  ड्रिप सिंचाई क्या है ? यह सिंचाई का एक तरीका है जो पानी की बचत करता है और यह पौधे या पेड़ की जड़ में पानी के धीरे-धीरे सोखने में (चाहे वो पौधे के ऊपर वाली मिट्टी हो या फिर जड़ हो) मदद कर खाद और उर्वरक के अधिकतम उपयोगी इस्तेमाल में मदद करता है। ड्रिप सिंचाई वॉल्व्स, पाइप, ट्यूब्स और एमीटर्स से जुड़े एक नेटवर्क की मदद से कार्य करता है। यह काम संकरे ट्यूब से जोड़कर किया जाता है जो पौधे या पेड़ की जड़ तक पानी को सीधे पहुंचाता है। ड्रिप सिंचाई व्यवस्था में माइक्रो-स्प्रे हेड्स तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह मशीन एमीटर्स के मुकाबले पानी को छोटे से क्षेत्र में फैलाता है। आमतौर पर इस तरह के स्प्रे हेड का इस्तेमाल लंबे-चौड़े जड़ वाली शराब का उत्पादन की जाने वाली फसलों और पेड़ों के लिए किया जाता है जिसके जड़ें व्यापक रूप से फैली होती हैं। कम पानी की उपल्बधता या रीसाइकिल्ड या पुनरावर्तित पानी इस्तेमाल में सब सरफेस (उप सतह) ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जाता है। इसमे स्थाई या अस्थाई गड़े हुए ड्रिपर लाइन या ड्रिप टेप जो पौधे की जड़ के पास या नीचे स्थित होते हैं उसका इस्तेमाल किया जाता है। अनुकूल ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का पता...

Management of Crop residues in rice-wheat crop system by adopting conservation agriculture फसल अवशेष बहुत ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं। ये न केवल मृदा कार्बनिक पदार्थ का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, अपितु मृदा के जैविक, भौतिक एवं रासायनिक गुणों में वृद्धि भी करते हैं।  पादप द्वारा मृदा से अवशोषित 25 प्रतिशत नत्रजन व फास्फोरस, 50 प्रतिशत गन्धक एवं 75 प्रतिशत पोटाश जड़, तना व पत्ती में संग्रहित रहते है। अतः फसल अवशेष पादप पोषक तत्वों का भण्डार है। यदि इन फसल अवशेषो को पुनः उसी खेत में डाल दिया जाये तो मृदा की उर्वरकता में वृद्धि होगी और फसल उत्पादन लागत में भी कमी आयेगी।  भारत में प्रतिवर्ष 600 से 700 मिलियन टन फसल अवशेष उत्पादित होता है जिसका एक-चौथाई भाग इन्हीं दोनों फसलों से प्राप्त होता है, परन्तु किसानों को इन फसल अवशेषों का महत्व ज्ञात न होने के कारण वे इनका उचित तरीके से उपयोग नहीं करते।  सारणी 1. धान एवमं गेहूं के फसल अवशेषो की भारत में उपलब्धता एवमं उनमें पोषक तत्वों का स्तर (मिलियन टन)  राज्य   फसल अवशेष उपलब्धता पुनर्चक्रण के लिए फसल अवशेष उपलब्धता पोषक तत्व (नाइट्रोजन+फॉस्फोरस +पोटाश) सामर्थ्य धान     गेहूं   कुल कुल सापेक्ष  पुनर्चक्रण के लिए उपलब्ध रसायनिक उर्वरक  प्रतिस्थापन मान  पंजाब 10.0 18.2 28.2 9.40 0.462 0.154 0.077 हरियाणा 2.5 9.7 12.2 4.07 0.194 0.065 0.032 उत्तरप्रदेश     14.0 27.5 41.5 13.83 0.677 0.226 0.113 बिहार  9.6 5.3 14.9 4.97 0.257 0.086 0.043 पश्चिम बंगाल       16.7 0.1 16.8 5.60 0.308 0.103 0.051 कुल 52.8 60.8 113.6 37.87 1.898 0.634 0.316 (सारकर,1999) फसल अवशेष प्रबंधन विधियाँ  कम्पोस्ट मृदा से निष्कासन अवशेष दहन मृदा में समावेश अवशेष मल्च 1. जैव वर्धक 2. फॉस्फोरस  घुलनकारी सूक्ष्म जीव 3. नाइट्रोजन स्तरीकरण जीवाणु 4 .वर्मी कम्पोस्टिंग  1. अत्यधिक महंगा  2. अत्यधिक श्रमिक आवश्यकता 3....