28 Sep गेहूँ का सेहूँ (सीड गॉल/ईयर कॉकल -Seed Gall/Ear Cockle) रोग : लक्षण, बचाव और नियंत्रण
गेहूँ का सेहूँ रोग, जिसे सीड गॉल, ईयर कॉकल या कॉकल रोग भी कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण सूत्रकृमि-जनित रोग है। इसका प्रमुख कारक Anguina tritici नामक गेहूँ का सीड-गॉल सूत्रकृमि है। रोग में सामान्य दानों के स्थान पर काले या भूरे रंग की सूखी हुई गॉल (मिनियाँ/सेहूँ) बन जाती हैं। संक्रमित खेत में पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और दाने की गुणवत्ता तथा उपज दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारत में यह रोग विशेष रूप से पुराने अथवा स्वयं-सहेजे गए बीज के लगातार उपयोग वाले क्षेत्रों में समस्या बन सकता है। [1–4]
रोग के नाम और टुंडू रोग संबंध
स्थानीय स्तर पर इस रोग के लिए सेहूँ, धानक, कॉकल तथा ईयर कॉकल जैसे नाम प्रयुक्त होते हैं। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टि से ‘टुंडू/येलो स्लाइम’ रोग को केवल Anguina tritici का पर्याय मानना उचित नहीं है। Anguina tritici के साथ Rathayibacter tritici जैसे जीवाणु की सहभागिता होने पर टुंडू या येलो-स्लाइम लक्षण विकसित हो सकते हैं। इसलिए खेत में रोग की पहचान करते समय सूत्रकृमि और जीवाणु-सम्बन्धी लक्षणों में अंतर करना उपयोगी है। [1]
रोग का कारक

Anguina Tritici microscopic view
इस रोग का प्रमुख कारक Anguina tritici है। इसके द्वितीय अवस्था के किशोर (J2) संक्रमण की दृष्टि से महत्वपूर्ण अवस्था हैं। संक्रमित गॉल सूखने की अवस्था में लंबे समय तक सूत्रकृमि को सुरक्षित रख सकती हैं।
2026 के भारतीय अध्ययन में रोग-चक्र, पौधे के कॉलर से पुष्पीय भाग तक सूत्रकृमि की गति तथा तापमान के साथ उसके विकास के संबंध का अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार जीवन-चक्र की अवधि बुवाई की तिथि और तापमान के अनुसार लगभग 90–140 दिन हो सकती है। [3]
रोग का फैलाव एवं वितरण
यह रोग मुख्यतः गेहूँ की खेती वाले रबी क्षेत्रों में पाया जाता है। उपलब्ध भारतीय साहित्य में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा तथा पंजाब सहित कई राज्यों से इसकी उपस्थिति दर्ज की गई है। ICAR के नेमाटोड वितरण एटलस में भी विभिन्न राज्यों में आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पादप-परजीवी सूत्रकृमियों के वितरण का संकलन किया गया है। [4,5]
रोग का प्रसार मुख्यतः संक्रमित बीज के माध्यम से होता है। कटाई और मड़ाई के दौरान गॉल स्वस्थ दानों के साथ मिल सकती हैं। यदि ऐसी गॉल युक्त बीज-सामग्री अगले वर्ष बोई जाती है, तो मिट्टी की नमी मिलने पर उनमें मौजूद जीव सक्रिय होकर अंकुरित गेहूँ के पौधों तक पहुँच सकते हैं। इसलिए प्रमाणित या गॉल-मुक्त बीज का उपयोग रोग-प्रबंधन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। [2,3]
पोषक फसलें
गेहूँ Anguina tritici का प्रमुख पोषक है। उपलब्ध साहित्य में जौ तथा कुछ संबंधित अनाजों में भी संक्रमण की सूचना मिलती है; इसलिए संक्रमित क्षेत्र में केवल गेहूँ का बीज बदलना ही नहीं, बल्कि खेत की फसल-व्यवस्था और स्वयं-सहेजे बीज के स्रोत पर भी ध्यान देना चाहिए। [3]
रोग के लक्षण
- प्रारंभिक अवस्था में संक्रमित पौधों की वृद्धि असामान्य और कमजोर हो सकती है तथा पत्तियाँ सिकुड़कर मुड़ सकती हैं।
- रोगग्रस्त पौधे सामान्य पौधों की तुलना में छोटे दिखाई दे सकते हैं और खेत में छोटे-छोटे प्रभावित समूह बन सकते हैं।
- संक्रमित पौधों में कमजोर या निष्फल कल्ले तथा छोटी, चौड़ी या असामान्य बालियाँ दिखाई दे सकती हैं।
- रोगी पौधे सामान्य पौधों की अपेक्षा अधिक समय तक हरे रह सकते हैं।
- सबसे विशिष्ट लक्षण बालियों में दानों के स्थान पर काली या भूरी, अपेक्षाकृत बड़ी गॉल/मिनियाँ बनना है।
- गॉल को दबाने या काटने पर अंदर सूत्रकृमि की अवस्थाएँ और सूखा हुआ पदार्थ पाया जा सकता है; प्रयोगशाला में सूक्ष्मदर्शी परीक्षण से पुष्टि की जा सकती है

Microplot grown Plant affected with ear
रोग की पहचान में सामान्य भ्रम
शुरुआती लक्षणों को किसान कभी-कभी पोषक तत्वों की कमी, सूखे या पाले की क्षति से जोड़ देते हैं। ऐसी स्थिति में केवल पत्ती या पौधे की वृद्धि देखकर निर्णय न लें। यदि बालियों में दानों के स्थान पर काली/भूरी गॉल दिखाई दें तो संक्रमित बालियों और बीज-नमूने को अलग करके कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की प्रयोगशाला से निदान कराना अधिक विश्वसनीय होगा। ICAR के नेमाटोड जागरूकता कार्यक्रमों में भी लक्षण, निदान और नमूना लेने की सही प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया गया है। [6]
रोग-चक्र
कटाई के समय संक्रमित गॉल बीज के साथ मिल जाती हैं। अगले मौसम में गॉल मिट्टी की नमी सोखती हैं और उसमें संरक्षित किशोर सक्रिय होकर निकलते हैं। वे गेहूँ के छोटे पौधों के ऊतकों पर पहुँचते हैं और पौधे की बढ़वार के साथ ऊपर की ओर बढ़ते हुए पुष्पीय भाग तक पहुँचते हैं। बाद में विकसित हो रहे दाने के स्थान पर गॉल बनती है, जिसमें सूत्रकृमि की संख्या बढ़ती है। परिपक्व गॉल फिर कटाई के दौरान बीज के साथ मिलकर अगले मौसम के लिए संक्रमण का स्रोत बन जाती है। [2,3]
अनुकूल परिस्थितियाँ
- संक्रमित बीज का उपयोग और गॉल का स्वस्थ बीज के साथ मिश्रित होना रोग के लिए सबसे महत्वपूर्ण जोखिम है।
- एक ही खेत में लंबे समय तक गेहूँ की खेती तथा स्वयं-सहेजे बीज का लगातार उपयोग रोग की समस्या को बनाए रख सकता है।
- मिट्टी की पर्याप्त नमी और गेहूँ की प्रारंभिक वृद्धि के समय उपयुक्त तापमान सूत्रकृमि की सक्रियता को प्रभावित करते हैं।
- मिट्टी और मौसम के प्रभाव के साथ रोग-चक्र गेहूँ की वृद्धि अवस्था से जुड़ा रहता है; इसलिए केवल एक ही तापमान या नमी मान को सभी क्षेत्रों के लिए निश्चित सीमा मानना उचित नहीं है। [3]
रोग से होने वाली हानि
रोग की तीव्रता क्षेत्र, बीज में गॉल की मात्रा, किस्म और कृषि-पद्धति के अनुसार बहुत बदल सकती है। MANAGE के प्रशिक्षण साहित्य में सामान्य क्षति लगभग 1% बताई गई है, जबकि कुछ परिस्थितियों में यह बहुत अधिक, यहां तक कि 80% तक भी पहुँच सकती है। इसलिए किसी एक औसत प्रतिशत को सभी खेतों पर लागू करने के बजाय स्थानीय सर्वेक्षण और बीज-नमूने के आधार पर जोखिम का आकलन करना चाहिए। [1]
रोग से बचाव एवं नियंत्रण
- प्रमाणित, स्वस्थ तथा गॉल-मुक्त बीज का उपयोग करें। यह सबसे प्रभावी और व्यावहारिक उपायों में से एक है। [1,2]
- यदि खेत या बीज-भंडार में रोग का इतिहास है, तो अगली बुवाई से पहले बीज की सफाई और गॉल की अलगाई अवश्य करें।
- मड़ाई/सफाई के समय छलनी, ग्रेडिंग या उपयुक्त फ्लोटेशन विधि से गॉल अलग करें। [2]
- संक्रमित बीज को बिना सफाई के अगले वर्ष न बोएँ।
- खेत में रोगग्रस्त पौधों और बालियों को पहचानकर अलग करना उपयोगी है, लेकिन मुख्य प्रबंधन का केंद्र संक्रमित बीज को खेत में पहुँचने से रोकना होना चाहिए।
- रोग दिखाई देने के बाद सामान्य फफूंदनाशी छिड़काव को इस रोग का मुख्य उपचार न मानें; यह सूत्रकृमि-जनित रोग है और प्रबंधन का जोर बीज स्वच्छता तथा गॉल हटाने पर होना चाहिए। [2]
- खेत की सफाई, उचित फसल-चक्र और स्वस्थ बीज-श्रृंखला अपनाकर रोग के पुनः प्रवेश की संभावना कम करें।
बीज से गॉल अलग करने की विधि
भारतीय कृषि तकनीकी साहित्य में जल-तैराव तथा नमक-घोल आधारित अलगाव की विधियाँ बताई गई हैं। सामान्यतः हल्की गॉल ऊपर तैर सकती हैं और उन्हें छलनी से अलग किया जा सकता है। TNAU की गेहूँ प्रबंधन सामग्री में 2% नमक घोल की विधि तथा अधिक संक्रमण में 5% तक ब्राइन का उल्लेख है। उपचार के बाद बीज को साफ पानी से अच्छी तरह धोकर छाया में सुखाना आवश्यक है। [2]
- बीज को साफ पानी/नमक-घोल की उपयुक्त मात्रा वाले पात्र में डालें और अच्छी तरह मिलाएँ।
- ऊपर तैरती गॉल को छलनी से निकालकर खेत से दूर नष्ट करें।
- भारी गॉल को नीचे बैठने से बचाने के लिए प्रक्रिया को सावधानी से और निर्धारित समय में करें।
- उपचाररत बीज को साफ पानी से कई बार धोएँ ताकि नमक अवशेष न रहें।
- बीज को छाया में अच्छी तरह सुखाने के बाद ही बुवाई करें।
- व्यावसायिक या बड़े बीज-लॉट में स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय/बीज परीक्षण प्रयोगशाला की सलाह के अनुसार विधि और सांद्रता तय करना बेहतर है।
यांत्रिक एवं सांस्कृतिक नियंत्रण
- गॉल-मुक्त प्रमाणित बीज का नियमित उपयोग करें।
- बीज की सफाई के दौरान अलग हुई गॉल को खेत, नहर या पशु-चारे में वापस न मिलाएँ।
- मड़ाई और भंडारण स्थल को साफ रखें ताकि संक्रमित गॉल स्वस्थ बीज में दोबारा न मिलें।
- जहाँ रोग बार-बार आता है वहाँ फसल-चक्र और स्वस्थ बीज-श्रृंखला को अपनाना उपयोगी है।
- खेत में रोग की उपस्थिति का रिकॉर्ड रखें और अगले मौसम के बीज का स्रोत उसी आधार पर तय करें।
किसान के लिए त्वरित पहचान
- यदि पौधे छोटे/कमजोर हैं और पत्तियाँ मुड़ी हुई हैं → बालियों को ध्यान से देखें।
- यदि दानों की जगह काली/भूरी गॉल दिखाई दें → सेहूँ/सीड-गॉल रोग की आशंका करें।
- यदि गॉल बीज में मिली हुई हैं → बुवाई से पहले बीज साफ करें या गॉल-मुक्त प्रमाणित बीज लें।
- यदि पहचान में संदेह हो → नमूना सुरक्षित रखकर कृषि विज्ञान केंद्र/कृषि विश्वविद्यालय से पुष्टि कराएँ।
निष्कर्ष
गेहूँ का सेहूँ रोग मुख्यतः बीज-जनित सूत्रकृमि समस्या है और इसका प्रभावी प्रबंधन खेत में बाद में दवा छिड़कने की अपेक्षा संक्रमण के स्रोत को रोकने पर आधारित है। गॉल-मुक्त प्रमाणित बीज, बीज की उचित सफाई, मड़ाई के बाद गॉल की अलगाई, स्वच्छ भंडारण तथा नियमित निगरानी को एक साथ अपनाने से रोग का प्रसार काफी हद तक रोका जा सकता है। नवीन भारतीय शोध से यह भी स्पष्ट हो रहा है कि सूत्रकृमि का विकास गेहूँ की वृद्धि और तापमान से निकटता से जुड़ा है; भविष्य में इसी आधार पर अधिक सटीक रोग-पूर्वानुमान और समयबद्ध प्रबंधन विकसित किया जा सकता है। [3]
संदर्भ
[1] MANAGE, (2023–24). Natural Farming – Study Material for Master Trainers. अध्याय: Plant Parasitic Nematodes; Anguina tritici तथा ear-cockle/tundu रोग संबंधी सामग्री.
[2] Tamil Nadu Agricultural University (TNAU), Crop Protection – Wheat. “Seed Gall Nematode (Ear Cockle & Tundu)” के प्रबंधन में प्रमाणित/गॉल-मुक्त बीज, यांत्रिक छनाई तथा 2% नमक घोल और अधिक संक्रमण में 5% ब्राइन का उल्लेख.
[3] Kumar, M., Khan, M.R., Sindhu, A.S., Kumari, A., Sasisankar, S.K.K., Singh, A.K., Gawade, B., Somvanshi, V.S. & Sirohi, A. (2026). Bionomics of wheat seed gall nematode Anguina tritici. Plant Protection Science. DOI: 10.17221/28/2025-PPS.
[4] Bala, R., Kaur, D.J., Sharma, I. & Sharma, R.C. (2013). Incidence of Karnal bunt and Ear cockle in Punjab during 2005–2012. Indian Phytopathology, 66(3), 313–315.
[5] M.R. Khan, R.K. Jain, T.M. Ghule, S. Pal (2014). Root Knot Nematodes in India – A Comprehensive Monograph. Economically Important Plant Parasitic Nematodes Distribution Atlas. All India Coordinated Research Project on Plant Parasitic Nematodes.
[6] Rutter W. B., Franco J., and Gleason C. (2022). Rooting Out the Mechanisms of Root-Knot Nematode–Plant Interactions. Annual Review of Phytopathology. 60:43–76.
[7] SWARUP G., Carlos SOSA C. M. (1990). Nernatode Parasites of Cereals. Plant Parasitic Nematodes in Subtropical and Tropical Agriculture. C. A. B INTERNATIONAL
Auther
अभिनव तिवारी, रमेश चंद, कमलेश पांडे, विवेक सिंह
आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, अयोध्या
Email: abhinavtiwari919@gmail.com