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आलू बीज Tag

आलू उत्पादन प्रणाली में बीज आकार के कंदों के उत्पादन के लिए प्रबंधन अभ्यास Good quality seed is almost universally considered a requirement for high productivity in all potato production systems. Much of the yield gap currently constraining productivity is attributed to the poor quality of seed. Potato seed sector development is thus a major concern of governments, researchers, development agencies, and civil society organizations. Seed is the most important part of the production cycle of many crops, including potatoes. Seed determines important factors such as yield, quality and overall crop health and has a direct bearing on the potato productivity. Selecting and planting clean, disease-free potato good quality seed is the first step to a successful crop year for potato growers. Seed multiplication rate in potato is only 1:6 and production cost is very high due to stringent quality control. Seed production is very technical aspect and needs careful attention during all stages like date of planting, spacing, fertilization, top-dressing, irrigation, roguing, weeding, earthing up, spraying of pesticides, date of dehaulming, harvesting, etc. Quality of seed potato is important for good yield therefore seed production; harvesting (haulming and harvesting) and storage should be carefully carried out. The average yield increase from the use of good quality seed is 30 to 50 percent compared...

Potential for potato seed production in Gwalior-Chambal area of Madhya Pradesh सफलतापूर्ण आलू उत्पादन हेतु गुणवत्ता युक्त बीज एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अवयव है। गुणवत्तायुक्त बीज के अभाव की पहचान सम्पूर्ण विश्व में आलू उत्पादन में बाधक एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कारक के रूप में हुई है। विशेषकर विकासशील देशों में गर्म जलवायु के कारण, आलू बीज एक अत्यन्त खर्चीली उत्पादक सामग्री है जो कि कुल उत्पादन लागत का 40 से 50 प्रतिशत तक होता है। भारत में लघु एवं सीमान्त कृषकों को गुणवत्तायुक्त बीज की अनुउपलब्धता के कारण विकसित देशों की तुलना में उत्पादकता निम्न है। कि‍सानों से प्राप्त बीज की तुलना में उत्तम गुणवत्तायुक्त बीज उपयोग करने से औसत उपज में 30 से 50 प्रतिशत तक की वृध्दि होती है। अधिकांशत: विकसित देशों में बडी संख्या में लघु जोत वाले कृषक आम बीज उत्पादकों से प्राप्त प्रक्षेत्र को बचाकर रक्खे हुये आलू का उपयोग बीज रूप मेे करते हैं क्योंकि वे जहां पर रहते हैं वहां पर या तो वाणिज्यिक बीज उत्पादन तंत्र का अभाव होता है अथवा प्रमाणीकृत बीज का मूल्य अधिक होता है। कृषक आधारित अनोपचारिक बीज तंत्र सामान्यत: बीज गुणवत्ता बनाये रखने और रोग जैसे जीवाणु मिलानी या विषाणु आदि के उन्मूलन में असमर्थ होता है। गुणवत्ता युक्त बीज की मांग:- भारत में दो मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र की बुवाई हेतु कम से कम...

Discussion on Conventional and Improved Techniques of Potato Seed Production आलू बीज उत्पादन हेतु वर्तमान में विश्व भर में  अनेक प्रवर्धन तकनीक उपयोग में लायी जा रही हैं। जिनमें मुख्यत: परम्परागत आलू बीज उत्पादन, ऊतक प्रर्वधन द्वारा आलू बीज उत्पादन (सूक्ष्म प्रवर्धन), हाइड्ररोफोनि‍क, ऐरोपोनिक ,  बायोरिएक्टर एवम्  एन.एफ.टी. आलू बीज उत्पादन तकनीक हैं। बीज उत्पादन की परम्परागत तकनीक (सूक्ष्म प्रवर्धन) , ऊतक प्रर्वधन तकनीक एवम् ऐरोपोनिक तकनीक केन्द्रीय आलू अनुसन्धान संस्थान, शिमला द्वारा विकसित की गयी हैं ।  विकासशील दशों के अधिकाशत: कृषक जो कि आलू बीज उत्पादन से जुडे हैं वे बीज उत्पादन की परम्परागत प्रणाली से प्राप्त आधार बीज को गुणन हेतु उपयोग में लाते हैं। उन्‍नत तकनीक विधि से आलू बीज बनाने में आरम्भ में उच्च निवेश एवम् प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता मुख्य सीमायें हैं जबकि परम्परागत तकनीक में आलू कन्द की विभिन्न प्रावस्थाओं में उच्च गुणवत्ता बनाये रखना चुनौतीपूर्ण है। परम्परागत आलू बीज उत्पादन प्रणाली:- आलू बीज उत्पादन आम तौर पर वानस्पतिक प्र्रवधन (vegetative propagation) के द्वारा किया जाता है। परम्परागत तकनीक के अन्तर्गत कन्द इन्डैक्सिंग एवम् कायिक गुणन कराये जाने के पश्चात् प्राप्त बीज आलू को खोदकर पुन: खेत में बुवाई हेतु उपयोगित किया जाता है। यह बीज उत्पादन प्रणाली श्रमिक बहुल्य, कीट एवम् रोग संक्रमण के लिये सुग्राही एवं अधिक समय लेने वाली है। परम्परागत आलू बीज उत्पादन की समस्याऐ:- 1. रोग एवम् कीट...

Potato seed certification method राष्ट्रीय बीज गुणन पोलिसी के अनुसार बीज गुणन प्रावस्थाओं को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। i) प्रजनित या मूल बीज ii) आधार बीज-I व II iii) प्रमाणित बीज । प्रमाणित बीज के बारे में यह माना जाता है कि यह बीज मिलावट रहित शुद्ध एवं रोग मुक्त होता है जिनमें रोग और कीटों के प्रति सहनशीलता होती है। जबकि आधार बीज-1 और आधार बीज-2 तथा प्रमाणित बीज की विषाणु रोगों, विजातीय किस्मों, कन्द जनित रोगों और ग्रेड सम्बन्धित सीमाओं का निर्धारण भारत सरकार द्वारा तय होता है। प्रजनित बीज की माँनीटरिंग का कार्य तो प्रमाणीकरण एजेन्सियां करती हैं किन्तु यह एजेन्सियां बीज का प्रमाणीकरण नहीं करतीं। भारत वर्ष के 21 राज्यों में राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्थाएं हैं जो विभिन्न फसलों के बीजों का प्रमाणीकरण करती हैं। किन्तु आलू बीज प्रमाणीकरण की एजेन्सियां हिमाचल प्रदेश, जम्मू और काश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उतर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, आसाम, मध्य प्रदेश, गंजरात, उड़ीसा, कर्नाटक और तमिलनाडू में ही स्थित हैं। सामान्य बीज प्रमाणीकरण मानक का उपयोग और विस्तारण: उत्पादन क्षेत्र के अनुसार बीज आलू का वर्गीकरण तथा बीज आलू का उत्पादन पहाड़ी एवं मैदानी क्षेत्रों के हिसाब से किया जाता है। पहाड़ी और मैदानी इलाकों में उगाया गया बीज क्रमशः पहाड़ी व मैदानी बीज कहलाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में बीज आलू आमतौर पर समुद्र...