22 Oct पराली जलाना छोड़ें, कम खर्च में लाभ जोड़ें
धान की कटाई के बाद खेत में बचे डंठल और भूसे (पराली) को जलाना किसान को सबसे आसान और सस्ता रास्ता लगता है, क्योंकि गेहूं की बुवाई के लिए समय कम होता है। परन्तु यह “सस्ता” रास्ता असल में बहुत महंगा पड़ता है। पराली के साथ खेत की खाद, मिट्टी के मित्र सूक्ष्मजीव और केंचुए भी जल जाते हैं, गाँव-शहर की हवा ज़हरीली होती है और अब भारी जुर्माना भी लगता है। अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में पंजाब और हरियाणा के लाखों किसानों ने मशीनों, जैव-अपघटकों और पराली बेचकर यह सिद्ध कर दिया है कि पराली जलाए बिना भी समय पर गेहूं बोया जा सकता है और खर्च भी घटाया जा सकता है।
पराली जलाने से कितना नुकसान होता है?
एक टन धान की पराली में लगभग 5.5 किग्रा नाइट्रोजन, 2.3 किग्रा फॉस्फोरस (P₂O₅), 25 किग्रा पोटाश (K₂O), 1.2 किग्रा सल्फर और लगभग 400 किग्रा कार्बन होता है। जलाने पर लगभग पूरा कार्बन और 80% तक नाइट्रोजन, लगभग 25% फॉस्फोरस, 20% पोटाश तथा आधे तक सल्फर नष्ट हो जाता है। साथ ही एक टन पराली जलने पर लगभग 1460 किग्रा कार्बन डाइऑक्साइड, 60 किग्रा कार्बन मोनोऑक्साइड, 3 किग्रा महीन धूल-कण (PM) और 2 किग्रा सल्फर डाइऑक्साइड हवा में मिलते हैं। आग की गर्मी से ऊपरी मिट्टी के लाभदायक जीवाणु, फफूंद और केंचुए भी मर जाते हैं।
किसान भाई ऐसे समझें – एक एकड़ का हिसाब
- एक एकड़ धान से लगभग 2.5–3 टन पराली निकलती है।
- इसमें लगभग 15–16 किग्रा नाइट्रोजन (करीब 35 किग्रा यूरिया के बराबर) और 70–75 किग्रा पोटाश होता है।
- पराली जलाने का मतलब है यह खाद हर साल आग में झोंक देना और फिर बाज़ार से खरीदना।
पराली खेत में मिलाने से कुछ वर्षों में मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ता है, नमी अधिक समय तक रुकती है और खाद का असर बढ़ता है।
ताज़ा स्थिति: आँकड़े क्या कहते हैं?
सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और किसानों के मिले-जुले प्रयास से पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी गिरावट आई है:
| राज्य | पराली जलाने की घटनाएँ | ||||
| 2021 | 2022 | 2023 | 2024 | 2025 | |
| पंजाब | 71,304 | 49,922 | 36,663 | 10,909 | 5,114 |
| हरियाणा | 6,987 | 3,661 | 2,303 | 1,406 | 662 |
स्रोत: पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड / पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर तथा हरियाणा कृषि विभाग एवं CAQM के आँकड़े।
2025 में पंजाब में 2021 की तुलना में लगभग 93% और हरियाणा में लगभग 91% कमी दर्ज हुई। परन्तु तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) की उपग्रह निगरानी (CREAMS) के अनुसार 2025 के धान सीज़न में (25 नवम्बर तक) मध्य प्रदेश में 14,165 और उत्तर प्रदेश में 5,803 पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज हुईं, जो पंजाब (5,092) से भी अधिक हैं। अर्थात् अब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के किसानों को विशेष रूप से जागरूक होने की आवश्यकता है। 2026 के सीज़न में भी पंजाब में 13 अक्टूबर तक 174 घटनाएँ दर्ज हुईं, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि (126) से अधिक हैं, इसलिए ढील की कोई गुंजाइश नहीं है। केंद्र सरकार के अनुमान के अनुसार 2026 के सीज़न में लगभग 2.76 करोड़ टन धान की पराली का प्रबंधन करना है।
वैज्ञानिक व कम खर्च वाले प्रबंधन विकल्प
पराली प्रबंधन के उपायों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है – खेत में ही प्रबंधन (इन-सीटू), जिसमें पराली को खेत में मिलाया या बिछाया जाता है, और खेत से बाहर उपयोग (एक्स-सीटू), जिसमें पराली इकट्ठा कर ईंधन, खाद, चारा या उद्योगों के कच्चे माल के रूप में बेची या प्रयोग की जाती है। किसान अपनी जोत, मशीन की उपलब्धता, गेहूं बुवाई के समय और नज़दीकी बाज़ार के अनुसार इनमें से उपाय चुन सकते हैं।
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खेत में ही समाधान (इन-सीटू प्रबंधन)
क. यांत्रिक प्रबंधन: पराली छोटे टुकड़ों में काटना एवं सुगम बुवाई
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- सुपर सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम लगा कम्बाइन: कम्बाइन हार्वेस्टर पर सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (Super SMS) लगवाने से कटाई के साथ ही पराली छोटे टुकड़ों में कटकर पूरे खेत में बराबर फैल जाती है। इससे आगे की बुवाई मशीनें बिना अटके चलती हैं। कम्बाइन मालिक से कटाई से पहले ही Super SMS की बात तय कर लें।
- श्रेडर/मल्चर/चॉपर: कटाई के बाद खड़े डंठलों और पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में फैलाने से मिट्टी में इनका अपघटन जल्दी होता है। छोटे किसान ये मशीनें कस्टम हायरिंग केंद्र (CHC) से किराये पर ले सकते हैं।
- मिट्टी में मिलाना (सॉइल इन्कॉर्पोरेशन): कटी पराली को रोटावेटर, डिस्क हैरो या उलटने वाले मोल्डबोर्ड हल से 10–15 सेमी गहराई तक मिट्टी में मिलाएँ। मिट्टी में नमी कम हो तो हल्की सिंचाई करें। यह मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने वाला सस्ता विकल्प है, विशेषकर जहाँ धान कटाई और गेहूं बुवाई के बीच 2–3 सप्ताह का समय हो।
- हैप्पी सीडर / सुपर सीडर / स्मार्ट सीडर से सीधी बुवाई: ये मशीनें खेत में पराली होते हुए भी बिना जुताई के गेहूं बो देती हैं। पराली मिट्टी पर पलवार (मल्च) का काम करती है, जिससे नमी बचती है, खरपतवार कम उगते हैं और पहली सिंचाई देर से लगती है। विश्वप्रसिद्ध शोध पत्रिका “साइंस” में प्रकाशित ICAR, CIMMYT व अन्य संस्थानों के अध्ययन के अनुसार हैप्पी सीडर से गेहूं बुवाई, पराली जलाकर बुवाई की तुलना में औसतन 10–20% अधिक लाभदायक है और खेती से होने वाले हरित गृह गैस उत्सर्जन में 78% तक कमी ला सकती है।
- सरफेस सीडर (पंजाब कृषि विश्वविद्यालय तकनीक) – सबसे सस्ता विकल्प: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा विकसित इस तकनीक में धान कटाई के साथ ही गेहूं का बीज (लगभग 45 किग्रा/एकड़) और DAP (लगभग 65 किग्रा/एकड़) खेत में डाल दिया जाता है, फिर कटर-कम-स्प्रेडर से पराली को पलवार की तरह बिछाकर हल्की सिंचाई की जाती है। इसकी लागत लगभग ₹650–700 प्रति एकड़ आती है, जबकि पारम्परिक तरीके से तैयारी व बुवाई पर ₹2000–2500 प्रति एकड़ लगते हैं। मशीन न हो तो बीज और खाद हाथ से भी छिड़के जा सकते हैं। अपने क्षेत्र में अपनाने से पहले नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र से बीज दर और सिंचाई की सलाह अवश्य लें।
ख. जैविक प्रबंधन: जैव-अपघटक से पराली को जल्दी सड़ाना
- पूसा डिकम्पोज़र (ICAR-IARI, नई दिल्ली): यह सात प्रकार के लाभदायक फफूंदों का मिश्रण है जो पराली को तेज़ी से सड़ाता है।
- कैप्सूल विधि: 5 लीटर पानी में 150 ग्राम गुड़ उबालकर ठंडा करें, उसमें 50 ग्राम बेसन और 4 कैप्सूल मिलाकर ढक दें। 4–5 दिन में घोल तैयार होता है और इसे बढ़ाकर 25 लीटर बनाया जाता है, जो एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त है। इसका खर्च लगभग ₹85 प्रति हेक्टेयर आता है।
- तैयार तरल विधि: 10 लीटर तरल पूसा डिकम्पोज़र को 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ में छिड़कें और पराली को मिट्टी में मिला दें। लगभग 25 दिन में पराली सड़ जाती है और अगली फसल बोई जा सकती है। गड्ढे या ढेर में खाद बनाने के लिए 5 लीटर प्रति टन पराली पर्याप्त है।
- कुश बायोफास्ट जैसे अन्य सूक्ष्मजीव मिश्रण: संस्थानों द्वारा विकसित ऐसे सूक्ष्मजीव कन्सोर्शिया की सहायता से पराली को लगभग 60–70 दिनों में पोषक तत्वों से भरपूर कम्पोस्ट में बदला जा सकता है। डिकम्पोज़र से बनी खाद में लगभग 1–1.5% नाइट्रोजन होती है, जबकि साधारण विधि से बनी खाद में लगभग 0.5%।
- ध्यान दें: जैव-अपघटक तभी अच्छा काम करते हैं जब खेत में पर्याप्त नमी हो और पराली मिट्टी के संपर्क में रहे। जहाँ गेहूं बुवाई का समय बहुत कम हो, वहाँ डिकम्पोज़र को हैप्पी सीडर/सुपर सीडर जैसी मशीनों के साथ मिलाकर अपनाना अधिक व्यावहारिक है।
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मूल्य संवर्धन (एक्स-सीटू उपयोग)
- बेलिंग: बेलर मशीन पराली को सघन गट्ठरों (बेल) में बाँध देती है, जिन्हें ढोना और बेचना आसान है। पंजाब में बायोमास बिजली संयंत्र 2024 में पराली लगभग ₹169 प्रति क्विंटल की दर से खरीद रहे थे। पराली बेचने से किसान को खेत साफ़ करने का खर्च भी नहीं उठाना पड़ता।
- थर्मल बिजलीघरों में को-फायरिंग: विद्युत मंत्रालय ने कोयला आधारित बिजलीघरों में कम से कम 5% बायोमास (पराली पेलेट आदि) मिलाकर जलाना अनिवार्य किया है, जिसे 2025-26 से 7% तक बढ़ाया गया है (SAMARTH मिशन)। CAQM के अनुसार 71 बिजलीघर बायोमास का उपयोग कर रहे हैं। इससे पराली पेलेट और ब्रिकेट की माँग लगातार बढ़ रही है।
- बायो-ब्रिकेट व पेलेट: पराली को दबाकर ईंट जैसे टुकड़े (ब्रिकेट) या छोटे सख्त दाने (पेलेट) बनाए जाते हैं, जो बॉयलरों, ईंट-भट्टों और बिजलीघरों में कोयले के स्थान पर ईंधन का काम करते हैं। गाँव स्तर पर किसान उत्पादक संगठन (FPO) या सहकारी समिति बनाकर ऐसी इकाई लगाई जा सकती है।
- कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) व 2G एथेनॉल: SATAT योजना के अंतर्गत लग रहे CBG संयंत्र पराली से गैस बनाते हैं और साथ में किण्वित जैविक खाद (FOM) भी देते हैं, जो मिट्टी के लिए उत्तम है। इंडियन ऑयल का पानीपत (हरियाणा) स्थित 2G एथेनॉल संयंत्र हर वर्ष लगभग 2 लाख टन पराली से लगभग 3 करोड़ लीटर एथेनॉल बनाने के लिए बनाया गया है। नज़दीकी संयंत्रों से समूह में अनुबंध करके किसान पराली की नियमित बिक्री सुनिश्चित कर सकते हैं।
- सामुदायिक संग्रहण केंद्र व सप्लाई चेन: छोटे किसानों की पराली एक स्थान पर इकट्ठा करके बेलिंग और भंडारण करने से ढुलाई का खर्च घटता है। केंद्र सरकार की नई व्यवस्था में पराली सप्लाई चेन परियोजनाओं की मशीनों पर 65% सरकारी सहायता मिलती है, शेष 25% उद्योग और 10% किसान/FPO लगाते हैं। 2026-27 में ऐसी 141 परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं।
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पराली के अन्य उपयोगी प्रयोग
- कम्पोस्ट/खाद बनाना: पराली को गोबर के साथ परतों में लगाकर वॉक-इन पिट, विंडरो या ढेर विधि से अच्छी जैविक खाद बनाई जा सकती है। इसमें श्रम कुछ अधिक लगता है, परन्तु खर्च बहुत कम है और खेत को पोषक खाद मिलती है।
- मशरूम (खुम्ब) उत्पादन: ढींगरी (ऑयस्टर) और पुआल मशरूम (वोल्वेरिएल्ला) की खेती में धान की पराली मुख्य आधार है। ढींगरी मशरूम में एक क्विंटल सूखी पराली से लगभग 60–80 किग्रा ताज़ा मशरूम मिल सकता है। कम जगह, थोड़ा प्रशिक्षण और कम निवेश से यह अतिरिक्त आमदनी का अच्छा साधन है। प्रशिक्षण के लिए नज़दीकी KVK से संपर्क करें।
- गौशाला को पराली – बदले में खाद: उत्तर प्रदेश सरकार की “पराली दो, खाद लो” पहल के अंतर्गत किसान अपनी पराली गौ-आश्रय स्थलों को दे सकते हैं, जहाँ इसका चारे व बिछावन के रूप में उपयोग होता है और किसान को बदले में गोबर की खाद मिलती है। इसकी जानकारी ज़िले के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी कार्यालय से लें।
- बायोचार: कम ऑक्सीजन में पराली को गर्म करके बनाया गया बायोचार मिट्टी सुधारक है और लंबे समय तक मिट्टी में कार्बन को सुरक्षित रखता है। प्रशिक्षित प्रगतिशील किसान या समूह मध्यम लागत से इसकी इकाई लगा सकते हैं।
सरकारी सहायता, प्रोत्साहन और नियम
- फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) योजना: 2018-19 से अब तक केंद्र सरकार इस योजना में ₹4,266 करोड़ से अधिक दे चुकी है; 3.54 लाख से अधिक मशीनें किसानों को दी गई हैं और 43,500 से अधिक कस्टम हायरिंग केंद्र बने हैं। 2026-27 के लिए ₹544.15 करोड़ स्वीकृत हुए हैं।
- मशीनों पर अनुदान: व्यक्तिगत किसान को CRM मशीनों (हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, मल्चर, बेलर आदि) पर 50% तथा सहकारी समितियों, FPO, पंचायतों और कस्टम हायरिंग केंद्रों को 80% तक अनुदान मिलता है। आवेदन अपने राज्य के कृषि विभाग के पोर्टल पर समय से करें – उत्तर प्रदेश में agridarshan.up.gov.in, पंजाब में agrimachinerypb.com और हरियाणा में agriharyana.gov.in।
- किराये पर मशीन: भारत सरकार के “CHC फार्म मशीनरी” मोबाइल ऐप से अपने आस-पास के कस्टम हायरिंग केंद्र खोजकर मशीन किराये पर बुक की जा सकती है।
- नकद प्रोत्साहन: कुछ राज्य पराली न जलाने वाले किसानों को सीधा प्रोत्साहन देते हैं, जैसे हरियाणा में 2025 में पराली का इन-सीटू या एक्स-सीटू प्रबंधन करने पर ₹1,200 प्रति एकड़ और शून्य दहन वाली पंचायतों को ₹50,000 से ₹1 लाख तक पुरस्कार। अपने राज्य की योजना की जानकारी कृषि विभाग से लें।
- जुर्माना (पर्यावरण क्षतिपूर्ति): नवम्बर 2024 से पराली जलाने पर जुर्माना दोगुना कर दिया गया है – 2 एकड़ से कम जोत पर ₹5,000, 2–5 एकड़ पर ₹10,000 और 5 एकड़ से अधिक पर ₹30,000 प्रति घटना। कई राज्यों में दहन वाले खेतों की भू-अभिलेख (खसरा) में “रेड एंट्री” भी की जा रही है, जिससे सरकारी योजनाओं, ऋण और मंडी में बिक्री पर असर पड़ सकता है। उपग्रह से हर आग की निगरानी होती है, इसलिए छोटा ढेर जलाना भी पकड़ा जाता है।
लागत और लाभ के आधार पर उपायों का चुनाव
| खर्च का स्तर | उपाय | मुख्य लाभ | किसके लिए उपयुक्त |
| कम खर्च | सरफेस सीडर (₹650–700/एकड़), पूसा डिकम्पोज़र (लगभग ₹35/एकड़), पराली मिलाना, कम्पोस्ट, गौशाला को देना | खाद की बचत, मिट्टी की सेहत में सुधार | छोटे व सीमांत किसान |
| मध्यम खर्च | CHC से हैप्पी/सुपर सीडर, मल्चर, बेलर किराये पर लेना; छोटे स्तर पर ब्रिकेट व मशरूम | समय पर बुवाई, पराली बेचकर आय, मशीन खरीदने का बोझ नहीं | सभी किसान, किसान समूह |
| अधिक शुरुआती निवेश | अपनी मशीनें, पेलेट/ब्रिकेट इकाई, बायोचार इकाई, CBG/बायोमास संयंत्र से अनुबंध | लंबे समय तक स्थायी आय, गाँव में रोज़गार | बड़े किसान, FPO, सहकारी समितियाँ, उद्यमी |
बड़ी इकाइयों की सफलता स्थानीय स्तर पर पराली की उपलब्धता, संचालन खर्च, बाज़ार और तकनीकी प्रबंधन पर निर्भर करती है। निवेश से पहले कृषि विभाग/KVK से परियोजना की जाँच करवा लें।
किसान भाइयों के लिए व्यावहारिक सुझाव
- कटाई से पहले योजना बनाएँ: सितम्बर में ही तय कर लें कि पराली खेत में मिलानी है, बिछाकर बुवाई करनी है या बेचनी है; उसी अनुसार मशीन और बेलर की बुकिंग कर लें।
- कम्बाइन से कटाई कराते समय सुपर SMS लगवाने पर ज़ोर दें, ताकि पराली पूरे खेत में बराबर फैले।
- कटाई के तुरंत बाद श्रेडर/मल्चर से पराली छोटे टुकड़ों में करें और जहाँ संभव हो 10–15 सेमी गहराई तक मिट्टी में मिलाएँ।
- समय कम हो तो हैप्पी सीडर, सुपर सीडर या सरफेस सीडर से सीधी बुवाई करें – जुताई का खर्च और समय दोनों बचेंगे।
- पूसा डिकम्पोज़र या कुश बायोफास्ट जैसे जैव-उत्पादों के लिए स्थानीय कृषि विभाग, KVK या कृषि विश्वविद्यालय से मार्गदर्शन लें।
- मशीन अनुदान के लिए राज्य पोर्टल पर समय से आवेदन करें और किसान समूह बनाकर 80% अनुदान वाला कस्टम हायरिंग केंद्र खोलने पर विचार करें।
- नज़दीकी बायोमास, CBG या एथेनॉल संयंत्र से समूह में अनुबंध करके पराली की नियमित बिक्री तय करें।
- कम्पोस्ट, मशरूम उत्पादन या गौशाला को पराली देकर खाद लेने जैसे स्थानीय उपयोग अपनाएँ।
- किसी भी जानकारी के लिए किसान कॉल सेंटर (टोल-फ्री) 1800-180-1551 पर संपर्क करें।
निष्कर्ष
पराली जलाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि खेत की खाद, किसान के पैसे और सबकी सेहत का नुकसान है। पंजाब और हरियाणा में चार–पाँच वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में 90% से अधिक कमी यह दिखाती है कि सही मशीन, सही जानकारी और सरकारी सहायता मिलने पर किसान बदलाव लाते हैं। अब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के किसानों के लिए भी यही रास्ता अपनाने का समय है। खेत में पराली मिलाने या बिछाने से मिट्टी की ताकत बढ़ती है, पराली बेचने से नकद आमदनी होती है और जुर्माने का डर भी नहीं रहता। सरकार, कृषि वैज्ञानिक संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और किसान समूहों के मिले-जुले प्रयास से “पराली” को बोझ नहीं, बल्कि “खेत का सोना” बनाया जा सकता है।
Author
अंकित*1, अरुणिमा त्रिपाठी2, अजय कुमार3 एवं अन्नामलै आनंदन4
1वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान; 2वरिष्ठ वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान, सहायक प्राध्यापक*, उद्यान विज्ञान एवं 4निदेशक
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, कुशमौर, मऊ
उत्तर प्रदेश – 275 103
*राजमोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, अंबिकापुर 497 001
संदर्भ
- Dobermann, A. and Fairhurst, T.H. (2002). Rice straw management. Better Crops International, 16 (Special Supplement): 7–11.
- Shyamsundar, P., Springer, N.P., Tallis, H., Polasky, S., Jat, M.L. et al. (2019). Fields on fire: Alternatives to crop residue burning in India. Science, 365(6453): 536–538.
- कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार (2026). फसल अवशेष प्रबंधन योजना 2026-27 हेतु ₹544.15 करोड़ का आवंटन एवं प्रथम किस्त जारी – सरकारी वक्तव्य, 17 जून 2026।
- ICAR-IARI, नई दिल्ली. पूसा डिकम्पोज़र – उपयोग विधि; तथा भाकृअनुप-भारतीय बीज विज्ञान संस्थान, मऊ, ई-पत्रिका, खंड 7(1) में प्रकाशित पूसा डिकम्पोज़र संबंधी लेख।
- National Academy of Agricultural Sciences (2017). Innovative Viable Solution to Rice Residue Burning in Rice-Wheat Cropping System through Concurrent Use of Super Straw Management System-fitted Combines and Turbo Happy Seeder. Policy Brief No. 2, NAAS, New Delhi.
- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (2024). वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (पराली दहन हेतु पर्यावरण क्षतिपूर्ति का अधिरोपण, संग्रहण एवं उपयोग) संशोधन नियम, 2024, सा.का.नि. 690(अ), नवम्बर 2024।
- ICAR-IARI, CREAMS प्रयोगशाला – धान अवशेष दहन की उपग्रह निगरानी बुलेटिन, 2020–2025 (डाउन टू अर्थ, 22 अक्टूबर एवं 25 नवम्बर 2025 में प्रकाशित)।
- पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर – पराली दहन आँकड़े 2022–2025 (द ट्रिब्यून, दिसम्बर 2025)।
- कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, हरियाणा (2025). फसल अवशेष प्रबंधन प्रोत्साहन योजना 2025 एवं पराली दहन आँकड़े 2021–2024 (द ट्रिब्यून, 12 अगस्त 2025)।
- वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) एवं पंजाब सरकार – पराली दहन आँकड़े 2025 (PTI, 12 दिसम्बर 2025); पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड – 2026 सीज़न आँकड़े (13 अक्टूबर 2026 तक)।
- विद्युत मंत्रालय, भारत सरकार – ताप विद्युत संयंत्रों में बायोमास को-फायरिंग नीति (2021, संशोधित 2025) एवं SAMARTH मिशन (samarth.powermin.gov.in); CAQM प्रगति विवरण, अगस्त 2025।
- द ट्रिब्यून (19 सितम्बर 2024). पंजाब में बायोमास संयंत्रों द्वारा पराली खरीद दर ₹169 प्रति क्विंटल।
- पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना – रबी फसलों की सिफारिशें (Package of Practices for Rabi Crops): सरफेस सीडिंग-कम-मल्चिंग तकनीक।
- पत्र सूचना कार्यालय (PIB), भारत सरकार (10 अगस्त 2022). इंडियन ऑयल का पानीपत 2G एथेनॉल संयंत्र राष्ट्र को समर्पित।
- कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार – फसल अवशेष प्रबंधन योजना के संशोधित परिचालन दिशानिर्देश 2023-24/2024 (agrimachinery.nic.in)।
- ICAR-खुम्ब अनुसंधान निदेशालय, सोलन – ढींगरी (ऑयस्टर) एवं पुआल मशरूम उत्पादन तकनीक।
- पशुपालन विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार (2025). “पराली दो, खाद लो” – गौ-आश्रय स्थलों के माध्यम से पराली के बदले गोबर खाद (आज तक, 28 अक्टूबर 2025)।