28 May वर्तमान परिवेश में भू-क्षरण एवं इसका प्रबन्धन
Soil erosion and its management in the current environment मानव सम्यता का अस्तित्व प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है। उनमें मिट्टी, प्रकृति की एक अनुपम भेंट है। प्रकृति इसका संरक्षण वनस्पतियों के माध्यम से करती हैं। प्रकृति ने मिट्टी के संरक्षण के लिए जो कवच प्रदान किया है, उसे मानव हस्तक्षेप से क्षति पहुंच रही है। फलस्वरूप, मृदा क्षरण तेजी से होने लगाहै। भूमि कटाव की समस्या न केवल भारत में, बल्कि विश्वव्यापी है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर में, 17 करोड़ 50 लाख हेक्टेयर अर्थात 50 प्रतिशत से अधिक, भूमि, जल, वायु और स्थानविशिष्ट कारणों से प्रभावित हो रहा है। देश में 58 प्रतिशत भूमि की खेती वर्षा आधारित है और कुल क्षेत्र का लगभग 42 प्रतिशत भाग ही खेती के लिए उपलब्ध है, जो कि लगभग 135 करोड़ जनसंख्या की जीविका का सहारा है। भौतिक रूप से मिट्टी के कणों का अपने स्थान से हटने व अन्य स्थान पर पहुँच जाने की क्रिया को भू-क्षरण कहा जाता है। प्रकृति के अनुसार, भू-क्षरण दो प्रकार के होते है- 1. प्राकृतिक कटाव: पादप आच्छादित भूमि में प्राकृतिक रूप से जल एवं वायु द्वारा भू-क्षरण को प्राकृतिक कटाव कहते हैं। इस प्रकार का कटाव मृदा निर्माण और मृदा नाश की क्रियाओं का समेकित परिणाम है। इस कटाव से कोई खास क्षति...