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Symptoms and prevention of nutrient deficiency in rabi crops  प्रत्येक पोषक तत्व पौधों के अंदर कुछ विशेष कार्य करने होते हैं। एक पोषक तत्व दूसरे पोषक तत्व का कार्य नहीं कर सकता है। किसी एक पोषक तत्व की सांद्रता जब निश्चित क्रांतिक स्तर से नीचे आ जाती है तो पौधे में उस पोषक तत्व की कमी हो जाती है। इससे पौधे के जीवन की क्रिया में बाधा पड़ती है तथा उसके विभिन्न अंगों खासकर पत्तियों पर तत्व विशेष की कमी के लक्षण दिखाई देते हैं। रबी फसलों मे प्रमुख पोषक तत्‍वों के कार्य, उनकी कमी के लक्षण तथा नि‍वारण के तरीके इस प्रकार है। नाइट्रोजन  मुख्य कार्य नाइट्रोजन कार्बन एवं जल के बाद पौधों में पर्याप्त मात्रा में पाया जाने वाला तत्व है। यह पौधों का आधारभूत पोषक तत्व है। तथा नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि एवं विकास में सहायक हैं। सभी प्रोटीन का आवश्यक अवयवए फसलों की उपज में वृद्धि एवं पौधों में गहरा रंग तरलता में वृद्धि करता है। इससे शाक भाजी का अधिक उत्पादन संभव है। यह पौधों द्वारा कार्बोहाइड्रेट के उपयोग में योगदान देता है। यह पौधों में क्लोरोफिल, अमीनो अम्ल, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, विटामिन, हार्मोन एवं जीव द्रव्य की संरचना में सक्रिय भाग लेता है। नाइट्रोजन की कमी के लक्षण गेहूं, जौ आदि पत्तियां भूरी पड़कर सूख जाती हैं और सूख कर गिर जाती हैं। पौधों...

जूट या पटसन उत्पादन के लिए सल्फर महत्वपूर्ण है  Jute is an important commercial crop of Eastern India. It spreads over an area of around 8 million ha in the states like West Bengal, Bihar, Odisha, Assam, Meghalaya, Tripura and some part of Uttar Pradesh. The crop is very much responsive to external application of major and micro nutrients. Latest soil fertility report of country by the Indian Council of Agricultural Research has highlighted the role of Sulphur in agricultural crops. Around 42% jute growing districts of West Bengal and 43% jute growing districts of Bihar is facing the problem of Sulphur deficiency (www.targetmap.com). Moreover farmers also do not emphasize on application of Sulphur. Thus, Sulphur, is also becoming a limiting factor to realize yield potential of jute in such areas. At national level, imbalanced application of chemical fertilizer and decreased application of farm yard manure (FYM) or organic manure has further aggravated the situation by reducing the profitability and livelihood of farming communities. Now a days, the practice of burning of crop residues in the agricultural field, weaning away the practice of application of Ammonium Sulphate, Single Super Phosphate, increased population coupled with high cropping intensity (three or more) is exhausting the soil of Sulphur content whereas no additional sulphur is being added....

Importance of sulfur in oilseed crops तिलहनी फसलें भारतीय आहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं है।  इसका उत्पादन लगभग 24 मिलियन टन हो रहा है। तिलहन फसल के लिए संतुलित उर्वरक का प्रयोग आवश्यक है, जिसमें नत्राजन, फास्फोरस, पोटाश, गंधक, जिंक व बोरान तत्व अति आवश्यक है।  गत वर्षों में सन्तुलित उर्वरकों के अन्तर्गत केवल नत्राजन, फास्फोरस एवं पोटाश के उपयाेग पर बल दिया गया।  सल्फर के उपयोग पर विशेष ध्यान न दिये जाने के कारण मृदा के नमूनों में 40 प्रतिशत गंधक (सल्फर) की कमी पाई गई।  आज उपयोग में आ रहे गंधक रहित उर्वरकों जैैसे यूरिया, डी0ए0पी0, एन0पी0 के0 तथा म्यूरेट आफ पोटाश के उपयोग से गंधक की कमी निरन्तर बढ रही है।  गंधक की कमी मुख्यतः निम्न कारणों से भूमि के अन्दर हो जाती है, जिसकी तरफ कृषकों का ध्यान नहीं जाता।  भूमि में सन्तुलित उर्वरकों का प्रयोग न करना । लगातार विभिन्न फसलों द्वारा गंधक जमीन में लेते रहने व सल्फर रहित उर्वरकों के प्रयोग में इन तत्वों की कमी हो जाती है। ऐसे उर्वरकों का उपयोग जिसमें बहुत कम या न के बराबर सल्फर का होना। जहाँ अकार्बनिक खादें प्रयोग में नहीं आती है, वहाँ पर भी सल्फर की कमी का होना। हाल ही में तोड़ कर विकसित की गई भूमि या हल्क गठन वाली बलुई मिटटी में, जहाँ निक्षालन द्वारा पोषक तत्वों...