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How to properly nurture newborn calf? पशुपालन व्यवसाय की सफलता के लिये उचित संख्या में उत्तम गुणों वाले बच्चों का विकास आवश्यक है। यही बछड़े बड़े होकर पुराने, बूढ़े तथा अनुत्पादक पशुओं का स्थान लेते है। इस तरह यह सतत प्रक्रिया चलती रहती है एवं उत्पादकता और लाभ दोनों ही बढ़ते हैं। यदि बछड़े पर्याप्त संख्या में ना हों तो अगली पीढ़ी के लिये उच्च उत्पादकता के पशु चयन करने में सफलता नहीं मिल पाएगी । यदि पालन पोषण पर ध्यान नहीं दिया जाए तो बछड़ों की मृत्युदर अधिक हो जाती है साथ ही जो बच्चे बच जाते हैं उनकी वृधिदर कम हो जाती है तथा उत्पादकता घट जाती है। बछड़ों की मृत्युदर सबसे अधिक जन्म से एक माह तक की आयु में होती है। पशुओं की विभिन्न प्रजातियों में इनके कारण भिन्न होते हैं । परन्तु कुछ कारण सभी में एक जैसे होते हैं एवं इनसे बचाव के उपाय भी समान होते हैं। कुछ सावधानियों को ध्यान में रखकर इनका उचित प्रबंधन करने से मृत्युदर में कमी की जा सकती है। बछड़े के पैदा होने का स्थान कैसा हो?   बछड़ों का स्वास्थ इस बात पर निर्भर होता है की उसका जनन स्थल कैसा है। यह बात सभी प्रजातियों  जैसे गाय, भैस, भेड़, बकरी, शुकर आदि पर सामान रूप से लागु होती है। बच्चा देने वाले...

Nurturing and management of livestock पशुपालन ग्रामीण जीवन का महत्‍वपूर्ण अंग है। समृद्ध डेयरी व्‍यवसाय के कारण देश,  दुग्‍ध उत्‍पादन मे अग्रणी बना हुआ है। पशुओं के पालन पोषण एवं प्रबंधन  के लिए तीन बातों पर ध्यान देना अत्‍यंत आवश्‍यक है। सही जनन, सही खानपान और रोगों से बचाव 1. सही जनन: सही जनन के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। अच्‍छी नस्ल का चुनाव : पशुपालन के लिए नस्लों का चुनाव करते समय वहाँ की जलवायु और सामाजिक एवं आर्थिक परिवेश पर ध्यान देना आवश्यक है। बिहार की जलवायु के अनुसार यहा जो पशुपालक संकर नस्ल की पशु पालना चाहते है वह जरसी क्रॉस पाल सकते है। वैसे इलाके जहां हरा चारा प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध है वहाँ फ्रीसियन क्रॉस भी पाली जा सकती है। जो पशुपालक देशी नस्ल की गाय पालना चाहते है वो साहिवाल, रेड सिंधी अथवा थरपारकर नस्ल की गाय पाल सकते है। भैंसों मे मुर्रा नस्ल की भैंस को पालना यहा की आवो हवा के अनुसार सबसे उपयुक्त है। कृत्रिम गर्भाधान: मादा के जननांग मे शुक्राणु को कृत्रिम रूप से रखने की प्रक्रिया को कृत्रिम गर्भाधान कहते हैं। इसके कई लाभ हैं सांढ को पालने की आवश्यकता नहीं रहती है संक्रामक बीमारियो के फैलने की संभावना कम हो जाती है। उत्तम गुण वाले सांढ का उपयोग अधिक से अधिक किया जा सकता है। नर के मरने...

Goat rearing: a profitable business बकरी पालन प्राचीन समय से ही किसानों के लिए एक प्रचलित ब्यबसाय है। बकरी को मांस के साथ साथ दूध उत्पादन के लिए भी पाला जाता है। बकरियों के बहुआयामी उपयोग के कारण ही इसका महत्व गरीबी एवं बेरोजगारी उन्मूलन के लिए बढ़ जाता है। बकरी को गरीब आदमी की गाय की संज्ञा भी दी जाती है।  बकरीपालन के लाभकारी ब्यबसाय होने के निम्नलिखित कारण है बकरी को किसी भी जलवायु मे पाला जा सकता है। बकरी पालने मे कम खर्च की आवश्यकता होती है। बकरी पालने मे कम श्रम की आवश्यकता होती है। बूढ़े एवं बच्चे जो और कोई श्रम नहीं कर सकते उनका भी उपयोग बकरी पालन मे किया जा सकता है। बकरी मे कसैलापन बर्दाश्त करने की क्षमता अन्य पशुओ से अधिक होती है इस कारण यह सभी प्रकार के घास को खा सकती है। इसका बाजार सभी जगह आसानी से उपलब्ध है। बकरी के मांस को खाने मे अन्य मांस की तरह कोई धार्मिक बंधन नहीं है। सभी धर्म के लोग इसे खा सकते है। बकरी के मांस मे अन्य लाल मांस की अपेक्षा कम कोलोस्टेरोल तथा वसा होता है। बकरी पालन शुरू करने से पहले हम बकरी किस उद्देश्य से पालना चाहते है इसका निर्णय कर लेना चाहिए। पूर्वी भारत मे बकरी मुख्यतः मांस उत्पादन के लिए पाली जाती...

दूधारू पशुओं में बाँझपन की समस्या के कारण एवं उनका निवारण  पिछले कई दशकों से यह पाया गया है कि जैसे-जैसे दूधारू पशुओं के दुग्ध उद्पादन में वृद्धि हुई है वैसे-वैसे प्रजनन क्षमता में गिरावट हुई है । दूधारू पशुओं की दूध उत्पादन की क्षमता प्रत्यक्ष रूप से उनकी प्रजनन क्षमता पर निर्भर करती है । दूधारू पशुओं में बाँझपन की स्थिति पशुपालकों के लिए बहुत बड़े आर्थिक नुकसान का कारण  है । पशुओं में अस्थायी रूप से प्रजनन क्षमता के घटने की स्थिति को बाँझपन कहते है । बाँझपन की स्थिति में दुधारू गाय अपने सामान्य ब्यांत अंतराल  (12 माह) को क़ायम नहीं रख पाती । सामान्य ब्यांत अंतराल को क़ायम रखने के लिए पशु ब्याने के बाद 45-60 दिनों के मध्यांतर मद में आ जाना चाहिए और 100 दिनों के भीतर गाभिन हो जाना चाहिए । यदि पशु ब्याने के 60 दिनों के बाद भी मद (गर्मी) में नहीं आता है तो पशु की पशुचिकित्सक से जांच करानी चाहिए और वह सब उपाए करने चाहिए जिससे की पशु जल्द से जल्द मद में आ जाये । दूधारू पशुओं में बाँझपन की स्थिति के लिए 4 प्रमुख कारण जिम्मेदार है: जन्मजात/ संरचनात्मक/ अनुवांशिक, कार्यात्मक, संक्रामक एवं प्रबंधन से संबंधित । 1. जन्मजात/ संरचनात्मक/ अनुवांशिक बाँझपन: इसके अंतर्गत अंडाशय (ओवरी) का अविकसित होना, अंडाशय में पुटक...

पशुओं में प्रजनन सम्बन्धी रोग एवं प्रवंधन  पशुपालन को लाभकारी बनाने के लिए पशुओं में होने वाली प्रजनन सम्बन्धी समस्याओं का प्रवंधन अति आवश्यक है। प्रजनन सम्बन्धी प्रमुख समस्याओं में पशु का समय पर  हीट में  न आना (एनेस्ट्रस), बार बार कित्रिम गर्भाधान के बाद भी गर्भ धारण नहीं होना (रिपीट ब्रीडिंग), बच्चेदानी में सूजन होना, उसमे मवाद का भर जाना, प्रसव के दौरान बच्चा फँस जाना, जेर का समय से न गिरना, गर्भावस्था के शुरुवात में ही भ्रूण की मृत्यु हो जाना, गर्भपात हो जाना इत्यादि शामिल है। विदेशी नस्ल की गायों (जैसे जर्सी, होल्सटीन फ़्रिसियन आदि) में प्रजनन सम्बन्धी समस्याएँ देसी नस्ल की गायों (जैसे साहीवाल, गिर, थारपारकर आदि) की तुलना में अधिक पायी जाती है। काफी उम्र हो जाने  के बाद भी जब पशु हीट (मद) में नहीं आते तो इस अवस्था को एनेस्ट्रस बोलते है। एनेस्ट्रस का मतलब पशु का हीट में नहीं आना होता है। आम तौर पर जब कोई गाय अपने परिपक्व वजन का ६०-६५ % प्राप्त कर लेती है तो उसे हीट में आ जाना चाहिए। प्रथम सफल गर्भधारण की उम्र सामान्यतया देशी गायों में 2७-३० महीने, विदेशी गायों में १५-२० महीने तथा भैसों में ३०-३६ महीने होती है जो उसकी नस्ल, खान- पान, मौसम आदि कई चीजों पर निर्भर करती है। प्रसव के बाद गाय...

एकीकृत कृषि पद्धति में सुअर और मछली पालन Piggery is a highly profitable enterprise because of among the domestic animals, pigs are the most prolific. Feed conversion ratio is 3.0 to 3.5 kg feed per kg live weight gain. In India, pig farming and pork production are in the hands of traditional pig farmers belonging to lower income group people. The food habits of Indians are changing and there is a great demand for pig meat. Integrated pig farming with fish is a demanding venture of enhanced income in the family of lower strata people. Why to raise pig with fish ? Pig can fit into diverse systems of management. It can be reared on kitchen wastes, industrial or agricultural by-products and slaughter house offal. Pigs are voracious eater and can convert agro-waste in to edible and highly nutritious meat.  One of the best feed converter and prolific amongst the all domesticated livestock. With short generation interval a sow can produce 16 piglets in a year. Dressing percentage is very high (65 to 70%) in comparison to sheep- goat (45 to 55%). Piggery can generate employment opportunity for rural population. Pig Breeds suitable for integrated pig cum fish farming Large and Middle white Yorkshire Barkshire Duroc Hereford Landrace Chesterwhite Tamworth Crosses between exotic and indigenous pigs and pure local breeds are also available. In Indian condition Large and Middle...

बकरी पालन - ग्रामीण किसानों के लिए आय का सबसे अच्छा स्रोत Goat production for milk and meat is an age old practice and goat is one of the first animals to be domesticated by men. Throughout the world goat is considered as ‘poor man’s cow’. Central Institute for Research on Goats (CIRG) projected as ‘Future Animal’ for rural and urban prosperity. The total goat population in India is 125.7 million, which is 14.6% of total world’s population. India produces 4.0 million MT goat milk by 30.2 million dairy goats.  India is the largest goat milk producer in the world, followed by Bangladesh (2.2 million MT) and Sudan (1.5 million MT). China produces about 1.8 million MT meat  (highest in world), followed by India (0.5 million MT) and third is Nigeria (0.3 million MT).  In India, goat sector contribute about 14,453 crores, out of which 6851 crore from meat, 4588 crores from milk and 648 crores from skin, which is 8% of total GDP from livestock sector and generate 4% employment directly or indirectly in the country. Approximately 20 million small and marginal farmers depend on goat rearing.  Why to go for goat farming? There is no religious taboo attached with goat farming or with goat meat (chevon) and all sections of the society readily consume...