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बागवानी में जैव प्रौद्योगिकी  की भूमिका  इन विट्रो कल्चर तकनीकों में लगभग 60 साल पहले फल की फसलों के लिए कई अनुप्रयोग हुए हैं। जिनमें गुठलीदार  फलों के लिए भ्रूण बचाव तकनीक शामिल हैं। जो बाद में इस विधि को व्यावसायिक रूप से स्वीकार्य, जल्दी पकने वाले आड़ू की खेती के उत्पादन के लिए सफलतापूर्वक लागू किया गया है। इन विधियों को अन्य फसलों के लिए भी अनुकूलित किया गया है उदाहरण प्रजनन कार्यक्रमों में प्रारंभिक पकने और बीज रहित अंगूर दोनों का उत्पादन करने के लिए। ऐतिहासिक रूप से फलों की फसलों के लिए इन विट्रो विधि के तरीकों का दूसरा अनुप्रयोग स्ट्रॉबेरी से वायरस पैदा करने वाली बीमारी को खत्म करना था। मेरिस्टेम टिप विधि तब से कई फलों की फसलों के लिए वायरस.अनुक्रमण कार्यक्रमों का एक अभिन्न हिस्सा बन गई है। आमतौर पर थर्मोथेरेपी के साथ। कुछ मामलों में इन विट्रो मे मेरिस्टमेटिक टिप को सूक्ष्म रूप से विकसित करना आवश्यक है। जैसा कि साइट्रस द्वारा किया जाता है । पिछले 25 वर्षों के भीतर फलों की फसलों का सूक्ष्म प्रसार इन विट्रो प्रौद्योगिकी  का एक महत्वपूर्ण अनुप्रयोग बन गया है। स्ट्राबेरी पहली फलों की फसल थी जिसके लिए विधि विकसित की गई थी। अब कई फलों की फसलों को व्यावसायिक रूप से सूक्ष्म रूप से प्रचारित किया जा रहा है।...

Plastic Mulch (Palwar), an Advanced Gardening process  भारत में कई वषों से नई विकसित तकनीकों, संसाधनों, उन्नत तरीकों से बागवानी की जा रही है। भारत में विभिन्न प्रकार की जलवायु एवं मृदा पायी जाती है। विषम जलवायु, प्राकृतिक आपदाओं जैसे- सूखा, ओला एवं पाला आदि से फसलों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। बागवानी में मृदा नमी संरक्षण, खरपतवार नि‍यंत्रण तथा मृदा तापमान को संतुलि‍त बनाऐ रखना एक बडी चुनौती है। किसान विभिन्न उपायों जैसे- सूखी पत्तिायाँ, नारियल का बुरादा, सूखी राख, फसल अवशेष, सूखी घास, गन्ने की सूखी पत्तिायाँ, कागज आदि को अपनाकर मृदा में नमी संरक्षण करता है। पलवार का उपयोग खरपतवार वृध्दि को रोकने एवं मृदा तापमान को संतुलित बनाये रखने में सहायता करता है। प्लास्टिक फिल्म का उपयोग जब पलवार के रूप में किया जाता है, तो उसे प्लास्टिक पलवार कहते है।   प्लास्टिक पलवार के लाभ:-  मृदा में नमी संरक्षण- पलवार मृदा की सतह से नमी का वाष्पोत्सर्जन द्वारा होने वाली हानि को कम करता है। खरपतवार नियंत्रण- प्लास्टिक पलवार खरपतवार की वृध्दि को नियंत्रित करता है। मृदा संरचना में सुधार- प्लास्टिक पलवार वर्षा से होने वाले क्षरण, कटाव आदि को कम करता है। उत्पादक की गुणवत्ताा में सुधार- पलवार मृदा व फलों एवं सब्जियों के बीच पतली परत का निर्माण करती है, जिससे फल एवं सब्जियाँ खराब होने से बच जाती है। पलवार मृदा के तापमान...

बागवानी में पॉलीएब्रीयोनी या बहुभ्रूणता और इसकाा महत्व में  Polyembryony is the occurrence of more than one embryo in a seed which consequently results in the emergence of multiple seedlings. The additional embryos result from the differentiation and development of various maternal and zygotic tissues associated with the ovule of seed. Earlier, polyembryony is said to have an abnormal feature but now it is considered as a desirable character in citrus, mango, jamun, rose apple, almond, etc. to obtain true to type planting material. In the usual process of plant reproduction, egg cell (female) of ovule fertilizes with the male gamete which in turn culminates in embryo (zygotic). On the other hand, in some of the crops, somatic cells of ovule (usually nucellus) start producing embryo without fertilization results in the occurrence of more than one embryo in the seed (polyembryony). The formation of embryo without sexual process is called apomixis (Apo=away from+ mixis = act of mixing) and seed is called apomictic seed, whereas the condition is called polyembryony. In most of the cases, sexual embryo and nucellar embryo developes simultaneously which is known as facultative polyembryony. Polyembryony was first reported by Leeuwenhoek in citrus as early as 1719 and the different cases of polyembryony in plants were studied by Braun in 1859. In 1878 Strasburger demonstrated...