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Use of Hydroponic in Fodder Production हाइड्रोपोनिक्स या जल कृषि शब्द ग्रीक शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है पानी में कार्य करना अत: इस तकनीक में पौधों को बिना मिट्टी के सिर्फ खनिज घोल वाले जल में उगाया जाता है। इसमें की जाने वाली कृषि नियंत्रित वातावरण में की जाती है, जिन्हें ग्रीन हाउस कहते हैं। भारत में पशुधन की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है। यहां 299.9 मिलियन बोवाइन, 65.06 मिलियन भेड़ें, 135.17 मिलियन बकरियां, 0.62, मिलियन घोड़े, 0.40 मिलियन ऊंट एवं 729.2 मिलियन पोल्ट्री पाई जाती है, जो कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था एवं लोगों के जीवन यापन का एक मुख्य भाग बनाते हैं। आज के समय में हमारा देश 61.1 प्रतिशत हरा चारा, 21.9 प्रतिशत सूखी फसल के अवशेष एवं 64 प्रतिशत फीड की कमी से जूझ रहा है। कृषि से मिलने वाले फसल अवशेष जैसे की भूसा, कड़बी आदि कम घनत्व वाले रेशे होते हैं, इनमें प्रोटीन, घुलनशील कार्बोहाइड्रेट, खनिज एवं विटामिन कम मात्रा में पाए जाते हैं गुणवत्ता एवं मात्रा दोनों मापदंडों के हिसाब से देश में फीड की कमी है जो कि पशुधन विकास में एक मुख्य बाधा है हाइड्रोपोनिक (जल कृषि) के फायदे इसे ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है जहां जल की कमी होती है क्योंकि इसमें सामान्य कृषि से कम जल व्यय होता है एवं...

Hydroponic fodder production: a cost effective technique  हमारे देश में सर्वाधिक पशुसंख्या  होने के बावजूद प्रति पशु उत्पादकता को बढ़ाना एक बहुत बड़ी चुनौती है। भारतवर्ष में दुधारू पशुओं का औसत दूध उत्पादन 1172 किग्रा प्रति वर्ष प्रति पशु है  जो की विश्व के औसतन उत्पादन से काफी काम है  इसका मुख्य कारण पर्याप्त मात्रा में हरे और सूखे चारे की कमी है। दुधारू पशुओं को यदि आवश्यकतानुसार  संतुलित आहार देना है तो वर्षभर उत्तम गुणवत्ता वाले हरे चारे का उत्पादन करना होगा। पशु उत्पाद जैसे दूध और मांस  की उत्पादन लगत में डेन और चारे का योगदान 60 से 70 प्रतिशत तक है जिसमे 30-35 प्रतिशत योगदान हरे चारे का होता है। देश में हरे चारे की मांग (2010) 816.8 मिलियन टन है जबकि इसकी आपूर्ति मात्र 525.5 मिलियन टन है इस प्रकार हरे चारे की कुल कमी लगभग 291.3 मिलियन टन है। यह कमी आवश्यक हरे चारे की  मात्रा की लगभग 35 प्रतिशत है। भारत में तेजी से शहरीकरण और खनन  क्षेत्रों  के कारण चराई क्षेत्र एवं हरा चारा उत्पादन वाले क्षेत्रों में कमी हुई है।  इस समस्या के कारण पशुपालकों  को हरा चारा उत्पादन की वैकल्पिक और टिकाऊ  विधि की आवश्यकता  हुई  है। यह बहुत ही स्पष्ट है  कि लगत में वृद्धि एवं प्राकृतिक संसाधनों में ह्रास  को काम करने...