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ब्रैसिका और फफूंद के अन्योन्यक्रिया का अध्ययन और उनके महत्व Less attention has been paid by researchers to phytotoxins and their role in the resistance of different Brassica species, especially in mustard (B. juncea). Pathogens are often resistant to plant defense compounds. This can happen for a variety of reasons including the plant's ability to degrade and convert defense compounds into less toxic compounds or the complete breakdown of defense compounds. This property enables the fungus to enter plant tissue and infect the plant. ब्रैसिका और फफूंद के अन्योन्यक्रिया का अध्ययन और उनके महत्व दुनिया भर में सरसो (ब्रैसिका) का महत्व इसके बीजों से निकलने वाले तेल के अतिरिक्त दैनिक भोजन के रूप में उपयोग होने से भी है। ब्रैसिका प्रजातियां अब दुनिया की 13 प्रतिशत आपूर्ति प्रदान करने वाली दूसरी सबसे बड़ी तिलहन फसल हैं। रोगजनक कवक ब्रैसिका फसलों पर हानिकारक और विनाशकारी प्रभाव डालते हैं। अधिक प्रतिरोधी किस्मों को पैदा करने या जेनेटिक इंजीनियरिंग का समुचित उपयोग करने हेतु प्रतिरोध की बेहतर समझ का होना आवश्यक है। माइक्रोबियल रोगजनकों और परजीवियों के संक्रमण का विरोध करने के लिए पौधों ने परिष्कृत रक्षा तंत्रों की एक विशाल विविधता विकसित की है जिसमें प्रेरक चयापचय पथ शामिल हैं। अरेबिडोप्सिस और कवक के बीच परस्पर क्रिया के दौरन पाए जाने वाले फाइटोटॉक्सिन पर बहुत ध्यान दिया...

सब्‍जी माइक्रोग्रीनस - पोषण का एक संभावित स्रोत Microgreens are young and tender edible seedlings produced using the seeds of different species of vegetables, herbaceous plants, aromatic herbs and wild edible plants (Di Gioia and Santamaria 2015a, b). The edible portion constitutes single stem, the cotyledon leaves and, often, the emerging first true leave (Di Gioia et al. 2017). A few days of photosynthesis of microgreen is known to provide nearly 4-9 times more nutrients including antioxidants, vitamins and minerals than their mature counterparts. Microgreens first appeared in the menus of the chefs of San Francisco, in California, at the beginning of the 1980s. By geography, North America contribute ~50% of market share in 2019. . During 2020-2025, NutriGreens market at the global level is anticipated to grow at a CAGR (Compound annual growth rate) of 7.5-8.0%. Traits of Microgreens The gaining popularity of these cotyledonary leafy greens is due to their pleasing palette of colors, textures and flavors. Microgreens represent a new class of vegetables that can be considered as “functional foods”  or “super foods” (Treadwell et al. 2010), because they serve as rich source of bioactive compounds such as vitamins, minerals, and antioxidants, along with the necessary nutrients required for human body (Janovská et al., 2010; Xiao et al., 2012). Microgreens are frequently called...

सरसो में खरपतवार प्रबंधन  तिलहनी फसलों में राई-सरसों का मूंगफली के बाद दूसरा स्थान है। देश में राई-सरसों की खेती मुख्यत: उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, असम, गुजरात, जम्मू कश्मीर आदि राज्यों में की जाती है I इस समय कुल खाद्य तेल उत्पादन का लगभग एक तिहाई तेल राई-सरसों द्वारा प्राप्त होता है इसकी खेती हमारे देश में लगभग 62.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है जिससे लगभग 59 लाख टन उत्पादन होता है।  खरपतवार फसल के साथ पोषक तत्व, नमी, स्थान एवं प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करके राई-सरसों की पैदावार एवं तेल प्रतिशत में कमी कर देते है। राई-सरसों की पैदावार में खरपतवारों की संख्या एवं प्रजाति के अनुसार 20-70 प्रतिशत तक कमी होती है I खरपतवार नियंत्रण का उपयुक्त समय खरपतवार नियंत्रण कार्यक्रम में समय का सर्वाधिक महत्व है। यदि खरपतवारों की रोकथाम खरपतवार प्रतिस्पर्धा की क्रांतिक अवस्था में न की गई तो उससे भरपूर लाभ नहीं मिल पाता है। राई-सरसों में यह अवस्था बुवाई के बाद 10 दिन से 40 दिन तक रहती है। इसलिए यह आवश्यक है कि यदि हम शाकनाशी रसायनों का उपयोग कर रहे है तो उनका असर भूमि में कम से कम बुवाई के बाद 40 दिन तक रहना चाहिए। खरपतवारों के रोकथाम की विधियाँ सरसों में खरपतवार एक समस्या है यह पौधें मूल...

सरसों की उन्‍नत किस्में और उसकी वैज्ञानिक खेती  सरसों रबी में उगाई जाने वाली प्रमुख तिलहन फसल है। इसकी खेती सिचिंत एवं संरक्षित नमी द्वारा बारानी क्षेत्रों में की जाती हैl राजस्थान का देश के सरसों के उत्पादन में प्रमुख स्थान है। सरसों की खेती मुख्‍यत: तेल के लि‍ए की जाती हैै जि‍से लहटा सरसों कहते है । सरसों का उत्‍पादन साग सब्‍जी व सलाद के लि‍ए भी कि‍या जाता है पत्‍ति‍यों के लि‍ए उगाई जाने वाली सरसों को गोभी सरसों या मीठी सरसों या जापानीज सरसों भी कहते है।  इसकी पत्तियां बड़ी-बड़ी मुलायम तथा स्वदिष्ट होती हैं जो कि बोने के 20 दिन के बाद मिलने लगती हैं । सरसों की उन्‍नत किस्मेें किस्म पकने की अवधि (दि‍न) औसत उपज  (कुुं/है) विशेषतायें पूसा जय किसान 125-130 18-20 सफेद रोली उखटा व तुलासिता  रोग रोधी सिचिंत व असिंचिंत  बरनी क्षेत्रों के लिए उपयुक्तl आशीर्वाद 125-130 16-18 देरी में बुवाई की जा सकती हैl सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्तl आर एच - 30 130-135 18-20 दाने मोटे होते हैंl मोयला का प्रकोप कमl सिंचित व असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त l पूसा बोल्ड 125-130 18-20 मोटे रोग कम लगते हैंl लक्ष्मी (आरएच 8812 ) 135-140 20-22 फलियां पकने पर चटकती नहीं दाना मोटा और कालाl क्रांति (पी आर 15) 125-130 16-18 तुलसिता व सफेद रोलीरोधक,दाना मोटा व कत्थई रंग का असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त l आर एच 725  136-143  25-26 इस किस्म की फलियां लम्बी और इसमें दानों की संख्या अधिक होती है जिसके कारण अन्य उन्नत किस्मों की अपेक्षा...

Scientific cultivation technique of Rye, Toria and Mustard crop बिहार में रबी मौसम में उगायी जाने वाली तेलहनी फसलों में राई, तोरीया एवं सरसों का प्रमूख स्थान है। इनका उपयोग खाद्य तेल एवं जानवरोंहेतु खल्ली के रूप में किया जाता है। अधिक एवं गुणवत्तायुक्त उपज प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि इसकी खेती वैज्ञानिक ढ़ंग से की जाए जिससे अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त किया जा सकें। राई-तोरी, सरसों के उन्नत प्रभेद एवं खेती की विधि: राई में प्रभेद (समय से बुआई हेतु उपयुक्त) - वरूणा:  औसत उपज 20 क्वि/हे0 होता है। इस फसल की अवधि 135 से 140 दिन में तैयार हो जाता है। पूसा बोल्ड: इसकी औसत उपज 19 क्वि0/हे0 है। इस फसल की अवधि 120 से 145 दिन होता है। क्रान्ति: इसकी औसत उपज 21 क्वि0/हे0 है। इस फसल की अवधि 125 से 130 दिन में तैयार हो जाता है। राजेन्द्र राई पछेती: औसत उपज 14 क्विटल प्रति हे0 है इस फसल का अवधि 105 से 115 दिन है। राजेन्द्र सुफलाभ : इसकी औसत उपज 16 क्विंटल प्रति हे0 है इस फसल की अवधि 107 से 116 दिन है। तोरी के प्रभेद: आर0 ए0 यु0टी0एस0 17:  इसकी औसत उपज 12 क्विंटल प्रति हे0 है । फसल अवधि 80-90 दिन दिन है। पंचाली: औसत उपज 11 क्ंिवटल प्रति हे0, फसल अवधि 90 से 105 दिन है। पी0टी0-303: औसत उपज...

Natural properties of mustard and value added products  सरसों का तेल अपनी कम संतृप्त फैटी एसिड सामग्री और ट्रांस वसा की अनुपस्थिति के कारण स्वास्थ्यप्रद तेलों में से एक है। यह आवश्यक फैटी एसिड ओमेगा 3 और ओमेगा 6 प्रदान करता है जो हृदय रोगों के जोखिम को कम करता है। सरसों के तेल में गुणकारी तत्त्व फाइटोन्यूट्रियंट्स जैसे फिनोलस, कैरोटीनोइड, फिटोस्टरोल, सेलेनियम, ग्लूकोसिनॉल्स, विटामिन सी और टोकोफेरॉल की की उपस्थिति के कारण इसकी गुणवता में अधिक वृद्धि होती है। भारतीय सरसों को मिट्टी से भारी धातुओं और अन्य खनिजों (जैसे कैडमियम, आर्सेनिक और सीसा) को शामिल करने की प्रवृत्ति के लिए जाना जाता है। इस संपत्ति का उपयोग उच्च-सेलेनियम सरसों को विकसित करने के लिए किया गया है जो कैंसर के उपचार के लिए उपयोगी माना गया है। तेल के अलावा, हरी पत्ते वाले हिस्से भी आवश्यक खनिजों का उत्कृष्ट स्रोत है, जिसका उपयोग भोजन पकाने के प्रयोजनों के लिए किया जाता है। यह अचार और सलादों में भी प्रयोग किया जाता है। पंजाब, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, पत्तियों को साग के रूप में उपयोग किया जाता है। गठिया, ऑस्टियोपोरोसिस, लोहे की कमी और कैंसर को रोकने के लिए आहार में सरसों के पत्तों को शामिल करना जाना अनिवार्य है। सरसों के बीज भारत भर में मसाला के रूप में उपयोग...

6 major diseases of mustard and their management 1. सरसों का सफेद रोली (White rust) रोग यह सरसों का अति भयंकर रोग है। यह बीज व भूमि जनित रोग है। इस रोग के कारण बुवाई के 30-40 दिनो के बाद पतियों की निचली सतह पर सफेद रंग के ऊभरे हुए फफोले दिखाई देते है। फफोलो की ऊपरी सतह पर पतियों पर पीले रंग के धबे दिखाई देते है। उग्र अवस्था मे सफेद रंग के ऊभरे हुए फफोले पतियों की दोनो सतह पर फैल जाते है। फफोलो के फट जाने पर सफेद चूर्ण पतियों पर फैल जाता है। पीले रंग के धबे आपसमे मिलकर पतियों को पूरी तरह से ढक लेते है। पुष्पीय भाग व फलियाँ पूरी तरह से विकृत हो जाती है। जिनमे बीज नही बनते है। नियंत्रण सरसों की बुवाई अक्टुबर के पहले पखवाड़े मे करे। बीजों को जैव-नियंत्रक ट्राइकोड्रर्मा पाउडर की 8-10 ग्राम प्रति किलोग्राम या फफूंद नाशी मेटालेक्सिल (एप्रोन 36 एस.डी) की 6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोंपचार करकेे बुआई करे। फसल बुवाई के 55-60 दिनो बाद या रोग के लक्षण दिखाई देने पर रिडोमील एम.जेड 2% का छिड़काव करे, आवश्यकता पड़ने पर 10 दिनो के अन्तराल पर छिड़काव को दोहराए। 2. सरसों का पौध आर्द्र-गलन रोग इस रोग का प्रकोप पौधे के भूमि के सतह या भूमि के अन्दर वाले भाग...