13 Oct वैज्ञानिक तकनीक से सरसों की खेती
Mustard cultivation with scientific technique सरसों राजस्थान की प्रमुख तिलहनी फसल हैं। सरसों की फसल सिंचित क्षेत्रों एवं संरक्षित नमी के बारानी क्षेत्रों में ली जा सकती हैं। यह फसल कम सिंचाई सुविधा और कम लागत में भी अन्य फसलों की तुलना में अधिक लाभ प्रदान करती है। इसकी पत्तियॉ हरी सब्जि के रूप में प्रयोग की जाती है तथा सूखे तनो को ईधन के रूप में प्रयोग किया जाता हैं। सरसों के तेल में तीव्र गंध सिनिग्रिन नामक एल्केलॉइड के कारण होती हैं। मृदा :- सरसों की खेती रेतिली से लेकर भारी मटियार मृदाओ में की जा सकती हैं। बुलई दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती हैं। खेत की तैयारी :- खरीफ फसल की कटाई्र के बाद एक गहरी जुताई करनी चाहिए तथा इसके बाद 3-4 बार देशी हल से जुताई करना लाभप्रद होता हैं। जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को तैयार करना चाहिए असिंचित खेत्रो में वर्षा के पहले जुताई करके खरीफ मौसम में खेत पडती छोडना चाहिए जिससे वर्षा के पानी का संरक्षण हो सके। उन्नत किस्में :- पूसा बोल्ड :- मध्यम कद कद वाली इस किस्म के 1000 दानो का वजन 6 ग्राम के लगभग होता हैं। यह किस्म 103-135 दिन मे पककर तैयार हो जाती है व औसत वजन 12-15 क्ंविटल प्रति हैक्टयर तक देती हैं इस किस्म में तेल की की...