27 Dec गेहूं का पीला रतुआ रोग एवं उपचार
Yellow stripe Rust disease of Wheat and its treatment मुख्यतः पीला रतुआ रोग पहाड़ों के तराई क्षेत्रो में पाया जाता है परन्तु पिछले कुछ वर्षों से उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रो में इस रोग का प्रकोप पाया गया है | मैदानी क्षेत्रो में सामान्यतः गेहूं की अगेती एवं पछेती किस्मों में यह रोग छोटे छोटे खंडो में क्षेत्रीय केन्द्रीय एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केंद्र ,लखनऊ द्वारा रिपोर्ट किया गया है | जनवरी और फरवरी में गेहूं की फसल में लगने वाले पीला रतुआ (यैलोरस्ट) रोग आने की संभावना रहती है। निम्न तापमान एवं उच्च आर्दता येलो रस्ट के स्पोर अंकुरण के लिए अनुकूल होता है एवं गेहूं को पीला रतुआ रोग लग जाता है। हाथ से छूने पर धारियों से फंफूद के बीजाणु पीले रंग की तरह हाथ में लगते हैं। फसल के इस रोग की चपेट में आने से कोई पैदावार नहीं होती है और किसानों को फसल से हाथ धोना पड़जाता है। उत्तरी भारत के पंजाब, हरियाणा, हिमांचल प्रदेश एवं उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों में पिली गेरुई के प्रकोप से करीबन तीन लाख हेक्टेयर गेहूं के फसल का नुकसान सन 2011 में हुआ था | चित्र-क: गेहूं पर पक्सीनिया एस्ट्रीफोर्मिस का युरेडीनियोस्पोर चित्र-ग: गेहूं पर पक्सीनिया एस्ट्रीफोर्मिस का लक्षण चित्र - ख: गेहूं पर पक्सीनिया एस्ट्रीफोर्मिस का पुस्चुल्स युरेडीनियोस्पोर पीला रतुआ रोग के लक्षण व पहचान इस बीमारी...