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तिलहनी फसल Tag

Improved cultivation of groundnut Groundnut is a crop which, despite being a leguminous crop, has its own special identity as an oilseed. Whose botanical name is Arechis hyphaegia, which is an important source of oil in our food, about 80 percent of its production is used in the form of oil. Improved cultivation of groundnut  भारत में दलहन, तिलहन, खाद्य व नकदी सभी प्रकार की फसलें उगायी जाती है। तिलहनी फसलों की खेती में सरसों, तिल, सोयाबीन व मूँगफली आदि प्रमुख हैं। मूँगफली गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू तथा कर्नाटक राज्यों में सबसे अधिक उगाई जाती है। अन्य राज्य जैसे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान तथा पंजाब में भी यह काफी महत्त्वपूर्ण फसल मानी जाने लगी है। राजस्थान में इसकी खेती लगभग 3.47 लाख हैक्टर क्षेत्र में की जाती है जिससे लगभग 6.81 लाख टन उत्पादन होता है। राजस्थान के बीकानेर जिले में लूणकरनसर में अच्छी किस्म की मूँगफली का अच्छा उत्पादन होने के कारण इसे राजस्थान का राजकोट कहा जाता हैं। मूंगफली एक ऐसी फसल है जिसका कुल लेग्युमिनेसी होते हुये भी यह तिलहनी के रूप मे अपनी विशेष पहचान रखती है। जिसका वानस्पतिक नाम अरेकीस हाइपेजिया है, जो की हमारे खाने में तेल के रूप में एक अहम् स्त्रोत है, जो की इसके उत्पादन का करीब 80 फीसदी हिस्सा तेल के रूप में इस्तेमाल होता...

Advanced techniques of groundnut standing crop management Groundnut is an important crop among oilseed crops. Semi-tropical climate is considered more suitable for its cultivation. To get good yield of this crop, 25-30 centigrade temperature and 500 to 1000 mm rain is required. Rain is good. Groundnut crop is such a crop that despite being a total leguminity, it holds its own special identity as an oilseed crop, because 45-50 percent oil and 22-28 percent protein are found in its grains. Advanced techniques of groundnut standing crop management तिलहनी फसलों में मूंगफली भी एक प्रमुख फसल है। इसकी खेती हेतु अर्ध-उष्ण जलवायु अधिक उपयुक्त मानी गई है। इस फसल की अच्छी उपज प्राप्त करने लिए 25-30 सेंन्टीग्रेट तापमान और 500 से 1000 मि.मी. वर्षा उत्तम होती है। मूंगफली फसल एक ऐसी फसल है जिसका कुल लेग्युमिनेसी होते हुये भी यह तिलहनी फसल के रूप में अपनी विशेष पहचान रखती है, क्योकि इसके दानों में 45-50 प्रतिशत तेल और 22-28 प्रतिशत  प्रोटीन पाया जाता है। मूंगफली वायुमण्डलीय नत्रजन का मृदा में स्थरीकरण कर भूमी की उर्वरा शक्ति बढाती है। किसान भाईयों द्वारा मूंगफली की खङी फसल प्रबधंन की उन्नत तकनीके अपनाकर अच्छा लाभ प्राप्त किया जा सकता है।  पोषक तत्व प्रबंधन मूंगफली की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए उचित मात्रा में पोषक तत्वों को समय पर देना...

कुसुम की खेती किसानों के लिए लाभदायक उपक्रम  कुसुम एक औषधीय गुणों वाली तिलहनी फसल है। कुसुम को करडी, कुसुबे, कुसुम्बा आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके दानों में 29 से 33 प्रतिशत तेल, 15 प्रतिशत प्रोटीन, 15 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेड, 33 प्रतिशत रेशा पाया जाता है। इसके तेल में पाये जाने वाले असंतृप्त वसीय अम्ल में 77 प्रतिशत लिनोलिक अम्ल तथा 14 प्रतिशत ओलिक अम्ल पाया जाता है। यह तेल उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगियों के लिए लाभदायक है। अन्य खाद्य तेलों की अपेक्षा कुसुम तेल में असंतृप्त वसीय अम्ल की मात्रा अधिक होती है। यह खून में कोलेस्ट्राल की मात्रा को कम करता है। इससे तैयार खल को पशुओं के चारे के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग साबुन, पेंट, वार्निश, लिनोलियम और इनसे संबधित पदार्थो को तैयार करने में भी लिया जाता हैं। कुसुम के औषधीय गुण कुसुम का बीज, छिलका, पत्ती, पंखुड़ियाँ, तेल, शरबत सभी का उपयोग औषधि के रूप में किया जा सकता है। कुसुम का तेल भोजन में उपयोग करने पर कोलेस्ट्राॅल की मात्रा कम रहती है एवं तेल से सिर दर्द में भी आराम मिलता है। इसके शरबत के उपयोग से बदन दर्द में आराम मिलता है। मांसपेशियों की चोट, कलाई, हड्डियों तथा घुटने के दर्द में भी इससे इलाज किया जाता है। कुसुम की पंखुड़ियों से...

सोयाबीन (ग्लाइसीन मैक्स) की प्रमुख किस्में और उनकी विशेषतायें सोयाबीन एक दलहन कुल की मुख्य तिलहनी फसल है| इसमें 30-40 प्रतिशत प्रोटीन तथा 20-22 प्रतिशत तेल की मात्रा पाई जाती है| यह भोजन और पशु आहार के लिए प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है| इसका वनस्पति तेल खाद्य व औधोगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है| सोयाबीन एक प्रमुख खरीफ फसल है, इसकी बुआई जून-जुलाई में और कटाई सितम्बर-अक्टूबर में की जाती है| राजस्थान में इसकी खेती झालावाड़, कोटा, बारां, चित्तौडगढ़ आदि जिलों में की जाती है| सोयाबीन की प्रमुख किस्में और उनकी विशेषतायें: राजस्थान में उगाई जाने वाली सोयाबीन की विभिन्न किस्में जो सोयाबीन के उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है, निम्न प्रकार है - 1. पी. के. 472: यह मध्यम आकार के पीले दानों वाली, मध्यम ऊँचाई (40 से. मी.) की किस्म हैं| सिंचित अवस्था में इस किस्म में 60-65 दिन में फूल आ जाते हैं और 100-115 दिन में फसल पककर तैयार हो जाती हैं| इसकी औसत उपज असिंचित क्षेत्रों में 9-10 तथा सिंचित क्षेत्रों में 20-25 क्विंटल प्रति हैक्टर होती हैं 2. एन. आर. सी. 37: इस किस्म के दानें पीले व उत्तम अंकुरण क्षमता वाले होते है तथा इसकी फलियों और पत्तियों पर सलेटी रंग के रोयें पाए जाते हैं| यह मध्यम ऊँचाई की 90-95 दिन में पकने वाली किस्म...

ति‍लहनी फसलों में गंधक की कमी  Sulphur is an essential nutrient element for plant as well as animal kingdom. It often accumulates in areas with volcanic activity, and mostly found in organic form in soils. Though S is a secondary nutrient element, its uptake is 9-15% of N uptake and similar to that of P uptake. Crucifers are found to have much more requirement of S than other crops primarily because of oil production and other essential S containing volatile compounds. Sulphur deficiency is wide spread across the world soils (Scherer, 2009). Intensification of agriculture with high yielding varieties and multiple cropping coupled with use of high analysis sulphur free fertilizers along with restricted or no use of organic manures have accrued in depletion of soil sulphur reserve. Apart from that the reduction of sulphur dioxide emission from power plants and various industrial sources, the decreasing use of sulphur containing fungicides and pesticides and also injudicious use of irrigation water are the most important reasons for sulphur deficiency. Importance of Sulphur in Oilseed production: The importance of sulphur in oilseed production is obvious because of the following reasons- Required for the synthesis of sulphur containing amino acids methionine (21%), cysteine (26%) and cystine (27%), which are essential components of protein. Approximately 90% of plant sulphur is present...

Importance of sulfur in oilseed crops तिलहनी फसलें भारतीय आहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं है।  इसका उत्पादन लगभग 24 मिलियन टन हो रहा है। तिलहन फसल के लिए संतुलित उर्वरक का प्रयोग आवश्यक है, जिसमें नत्राजन, फास्फोरस, पोटाश, गंधक, जिंक व बोरान तत्व अति आवश्यक है।  गत वर्षों में सन्तुलित उर्वरकों के अन्तर्गत केवल नत्राजन, फास्फोरस एवं पोटाश के उपयाेग पर बल दिया गया।  सल्फर के उपयोग पर विशेष ध्यान न दिये जाने के कारण मृदा के नमूनों में 40 प्रतिशत गंधक (सल्फर) की कमी पाई गई।  आज उपयोग में आ रहे गंधक रहित उर्वरकों जैैसे यूरिया, डी0ए0पी0, एन0पी0 के0 तथा म्यूरेट आफ पोटाश के उपयोग से गंधक की कमी निरन्तर बढ रही है।  गंधक की कमी मुख्यतः निम्न कारणों से भूमि के अन्दर हो जाती है, जिसकी तरफ कृषकों का ध्यान नहीं जाता।  भूमि में सन्तुलित उर्वरकों का प्रयोग न करना । लगातार विभिन्न फसलों द्वारा गंधक जमीन में लेते रहने व सल्फर रहित उर्वरकों के प्रयोग में इन तत्वों की कमी हो जाती है। ऐसे उर्वरकों का उपयोग जिसमें बहुत कम या न के बराबर सल्फर का होना। जहाँ अकार्बनिक खादें प्रयोग में नहीं आती है, वहाँ पर भी सल्फर की कमी का होना। हाल ही में तोड़ कर विकसित की गई भूमि या हल्क गठन वाली बलुई मिटटी में, जहाँ निक्षालन द्वारा पोषक तत्वों...