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पशुओं के रोग Tag

मैस्टाइटिस पशुओं के उपचार के लिए मेसेनकाइमल कोशिकाओं की भूमिका  Stem cells are the undifferentiated and uncommitted cells that give rise to deferent cell types or lineage on dividing. These stem cells are used as regenerative medicine for the treatment of various diseases in human and animals. In the present study mesenchymals Stem cells (MSC) used for the treatment of mastitis animal and it found that diseased animal treated with MSC has been cured which suggest that stem cell therapy use as regenerative medicine providing a promising area for the treatment of various diseases in animals. Stem cells “the hope cells”: A stem cell is a specialized cell which has the unique characteristic to develop into specialized cell types in the body and these stem cells may be used to replace cells and tissues that have been damaged due to disease. Due to their ability to repair, regenerate, and develop into specialized cell types, Stem cells hold considerable promise as a source of cells for therapeutic applications in various conditions including metabolic, degenerative and inflammatory diseases for the repair and regeneration of damaged or lost tissues. Stem cell therapy for animals has seen breakthroughs over past few years. The past decade has witnessed an exponential growth in treatment of diseases. In a few instances, stem-cell-based therapies produced remarkable...

अफारा रोग: पशुओं में आकस्मिक मौत का प्रमुख कारण  जुगाली करने वाले पशुओं में अफरा एक आम समस्या है । इनके रुमेन (पेट) में पाचन के दौरान गैस का बनना एक सामान्य प्रक्रिया है तथा यह गैस थोड़े थोड़े अंतराल पर  मुँह के रास्ते से हमेशा निकलती रहती है । परन्तु जब किसी कारण बस गैस बाहर नहीं निकल पाती है, तब गैस भरने की वजह से पेट फूल जाता है। इस अवस्‍था अफारा कहते है। अफारे के कारण पशु की कृति या छायाचित्र बदल जाती है और पशु को साँस लेने में परेशानी होती है। कुछ पशुओं में तीव्र अफरा की वजह से आकस्मिक मृत्यु भी हो जाती है । अफरा दो तरह का होता है, झागयुक्त अफरा तथा गैसीय अफरा ।  झागयुक्त अफरा  झागयुक्त अफरा, गैसीय अफरा की तुलना में अधिक पाई जाती है तथा इसमें रुमेन में उपस्थित तरल पदार्थ (रुमेन द्रव्य या रूमेण फ्लूइड) के ऊपर स्थायी झाग बन जाती है जिससे गैस के बाहर निकलने की मुलभुत प्रक्रिया में ही बाधा उत्पन हो जाती है । झागयुक्त अफरा का प्रमुख कारण अत्यधिक मात्रा में ताजे, तरुण रसीले घासों, लूसर्न या अन्य लेगुमिनोस (फलीदार) आहार या अल्फ़ा अल्फ़ा घास खाना है । इसके अलावा बहुत महीन पिसा हुआ अनाज का दाना खासकर गेहूं या जौ का दाना देने से भी अफरा की समस्या...

Garget (Thanala) Disease: The Biggest Problems of dairy cattle थनैला रोग (Garget), दुधारू पशुओं में होने वाली एक बीमारी है। यह बीमारी मुख्यतः गाय, भैंस,भेड़ ,बकरी सुअर आदि में होती है। जिसमे प्रभावित पशुओं के थन गर्म हो जाते है एवं सूजन बढ़ जाती है । शारीरिक तापमान बढ़ जाता है । दूध देने की क्षमता कम हो जाती है । जानवर खाना पीना बंद कर देता है । यह बीमारी प्रत्यक्ष रूप में जितना नुकसान करती है उससे कही ज्यादा अप्रत्यक्ष रूप से पशुपालको को आर्थिक नुकसान पहुंचती है! रोग कारक – यह बीमारी अनेक कारको के वजह से होती है । जैसे की जीवाणु , विषाणु , मोल्ड , फफूंद , यीस्ट, आदि इसके अलावा वातावरण प्रतिकूलता के कारण यह रोग होता है! थनैला रोग संक्रमण - रोग का प्रमुख कारण साफ सफाई अच्छी तरह से नहीं होना होता है । रोग का संचरण दूषित त्वचा पर जीवाणु का थन की नलिका में प्रवेश करने से होता है । पशु का दूध निकालने वाले ग्वालो द्वारा संक्रमित पशु से स्वस्थ पशु में होता है । थन पर गोबर व कीचड़ संक्रमण का कारण होते है । फर्श की अच्छी तरह से सफाई न होना आदि ! थनैला रोग लक्षण - अदृश्य लक्षण - प्रारम्भ में इस रोग में थन व दूध सामान्य प्रतीत होते...

Symptoms, preservation and treatment of Hemorrhagic Septicemia गलघोटू (Hemorrhagic Septicemia ) एक घातक संक्रामक बीमारी है ! जो मुख्यत: गाय भैंस में मानसून के मौसम के दौरान होती है साधारण भाषा में गलघोटू रोग "घुरखा" , " घोटुआ " , " डहका " आदि के नाम से जाना जाता है ! यह रोग भेड़,बकरियों एवं सूअरों को प्रभावित करता है ! पशुओ के इस रोग में पशुपालको को अत्याधिक नुक्सान का सामना करना पड़ता है ! गलघोटू रोग के कारण पशुओ की मृत्यु दर अधिक होती है यह रोग छह से दो वर्ष की आयु के जानवरो में होती है ! गलघोटू रोग कारक : - यह रोग 'पस्तुरिल्ला मल्टोसीदा" नामक जीवाणु से होता है ! गलघोटू रोग का जीवाणु अधिक आद्रता वाले मौसम में सक्रिय होता है ! और यह 2 से ३ सप्ताह तक मिट्टी एवं घास में सक्रिय रह सकता है ! गलघोटू रोग संक्रमण :- यह रोग अस्वस्थ पशु से स्वस्थ पशु में उनके सांस एवं स्त्राव से फैलता है ! ख़राब पानी एवं संक्रमित भोजन कराने से पशुओ को यह बीमारी लग जाती है ! गलघोटू रोग लक्षण :- गलघोटू रोग में अचानक से तेज़ बुखार {१०३ -१०५ } हो जाता है! ठण्ड लगने लगती है! ! अत्यधिक लार का बहना , आँखों में सूजन आना , गले में सूजन होने से सास लेते...