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फफूदंनाशी Tag

Importance of Trichoderma in agriculture हमारे मिट्टी में कवक (फफूदीं) की अनेक प्रजातियाँ पायी जाती है इनमें से एक ओर जहाँ कुछ प्रजातियाँ फसलों को हानि (शत्रु फफूदीं)  पहॅचाते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ प्रजातियाँ लाभदायक  (मित्र फफूदीं) भी हैं जैसे कि द्राइकोडरमा । ट्राइकोडर्मा पौधों के जड़ विन्यास क्षेत्र (राइजोस्फियर)  में खामोशी से अनवरत कार्य करने वाला सूक्ष्म कार्यकर्ता है। यह एक अरोगकारक मृदोपजीवी कवक है जो प्रायः कार्बनिक अवशेषों पर पाया जाता है। इसलिए मिट्टी में फफूदों के द्वारा उत्पन्न होने वाले कई प्रकार की फसल बिमारीयों के प्रबंधन के लिए यह एक महत्वपूर्ण फफूदीं है। यह मृदा में पनपता है एवं वृध्दि करता है तथा जड़ क्षेत्र के पास पौधों की तथा फसल की नर्सरी अवस्था से ही रक्षा करता है। ट्राईकोडर्मा की लगभग 6 स्पीसीज ज्ञात हैं लेकिन केवल दो ही ट्राईकोडर्मा विरिडी व ट्राईकोडर्मा हर्जीयानम मिट्टी में बहुतायत मिलता है। यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं कृषि की दृष्टि से उपयोगी है। यह एक जैव कवकनाशी है और विभिन्न प्रकार की कवक जनित बीमारियों को रोकने में मदद करता है। इससे रासायनिक कवकनाशी के ऊपर निर्भरता कम हो जाती है। इसका प्रयोग प्रमुख रूप से रोगकारक जीवों की रोकथाम के लिये किया जाता है। इसका प्रयोग प्राकृतिक रूप से सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसके उपयोग का प्रकृति...

Correct and effective use of biofungicide Trichoderma हमारे मिट्टी में कवक (फफूदीं) की अनेक प्रजातियाँ पायी जाती है जो फसलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनमें से एक ओर जहाँ कुछ प्रजातियाँ फसलों को हानि (शत्रु फफूदीं) पहॅचाुते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ प्रजातियाँ लाभदायक (मित्र फफूंदी) भी हैं। जैसे कि द्राइकोडरमा । प्रकृति ने स्वयं जीवों के मध्य सामंजस्य स्थापित किया है जिससे कि किसी भी जीव की संख्या में अकारण वृध्दि न होने पाये और वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी समस्या का कारण न बनें।  ट्राईकोडर्मा एक मित्र फफूदीं है जो विभिन्न प्रकार की दालें, तिलहनी फसलों , कपास , सब्जियों  तरबूज , फूल के कार्म आदि की फसलों में पाये जाने वाले भूमि उत्पादित रोग - उकठा ,जड़गलन कालर राट, आद्रपतन, कार्म सड़न को नियंत्रण करने में एक महत्वपूर्ण योगदान करती है। ये रोग मिट्टी में पाये जाने वाले फफूंद जैसे- फ्यूजेरियम पिथियम, राजोक्टीनिया स्केलेरोटिया, फाइटोफ्थोरा, मैक्रोफोमिना, अर्मीलौरिया आदि की कुछ प्रजातियों से होते हैं, जो बीजों के अंकुरण को प्रभावित करती है एवं अंकुरण के बाद आद्रपतन या पौधों के अन्य विकास स्तर पर भी रोग उत्पन्न करती है। इन रोगों को नियंत्रण करने के लिये रसायन आर्थिक दृष्टि से प्रभावी नहीं है। सामान्यत: फफूदं रसायनिक दवाओं का असर 10 से 20 दिनों तक रहता है। यदि फिर इनका...

Importance and use of trichoderma fungus in biological control of soil borne diseases ट्राइकोडर्मा पादप रोग प्रबंधन विशेष तौर पर मृदा जनित बिमारियों के नियंत्रण के लिए बहुत की प्रभावशाली जैविक विधि है। ट्राइकोडर्मा एक कवक (फफूंद) है। यह लगभग सभी प्रकार के कृषि योग्य भूमि में पाया जाता है। ट्राइकोडर्मा का उपयोग मृदा - जनित पादप रोगों के नियंत्रण के लिए सफलतापूर्वक किया जा सकता है। हमारे देश में फसलों को बीमारियों से होने वाले कुल नुकसान का  50 प्रतिशत से भी अधिक मृदा- जनित पादप रोग कारकों से होता हैं, जिसका नियंत्रण अन्य विधियों द्वारा सफलतापूर्वक नहीं हो पा रहा है। इसलिए ट्राइकोडर्मा की विभिन्न प्रजातियों से रोंगों का नियंत्रण प्रभावशाली रूप से किया जाता हैं इनमें से ट्राइकोडर्मा हरजीनियम एवं विरिडी का प्रयोग होता है। ये मृदा जनित रोग कारकों जैसे राजोक्टोनिया, स्केलेरोशियम, स्केलेरोटीनिया ,मैक्रोफोमिना ,पीथियम, फाइटोफथेरा एवं फ्यूजेरियम आदि का पूर्णरूपेण अथवा आंशिक रूप से विनाश करके उनके द्वारा होने वाली विभिन्न बीमारियों जैसे बीज सड़न, आर्द्रगलन, मूल  विगलन, अंगमारी एवं म्लानि रोग के नियंत्रण में सहायक सिद्ध हुई है। फसलों में लगने वाले जड़ गलन, उखटा, तना गलन आदि मृदा जनित फफूंद रोगों की रोकथाम के लिए ट्राइकोडर्मा नामक मित्र फफूंद बहुत उपयोगी है। बीजोपचार, जड़ोपचार एवं मृदा उपचार में इसका प्रयोग करते हैं, जिससे फसलों की जड़ो के...

Classification of anti fungal medicines and precautions in using them. पौध रोग फसल के उत्पादन में न केवल कमी करते है वरन उत्पादन के गुणों का भी हनन कर उसका बाजार मूल्य कम कर देते है। पौध रोग नियंत्रण का मुख्य उददेश्य फसल को आर्थिक क्षति से बचाना है इस हेतु पौध रोग के निदान को महत्वपूर्ण स्थान देते हुये फफुंदनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है। पौधों में अधिकांश रोग फफुंद द्वारा उत्पन्न होते है। फफुंदनाशक का अर्थ है वह रसायन जो रोगजनक फफुंद को नष्ट करने अथवा उनकी बढ़वार को अवरुद्ध करने मे सहायक होते है। कुछ रसायन फफुंदों की बढ़वार को अस्थाई रुप से रोक देते है और उन्हें नष्ट नहीं करते है। इन रसायनों को फफुंदरोधी कहते है। इसी तरह कुछ रसायन केवल फफुंद के बीजाणु बनने को रोकते है। इन रसायनों को बीजाणुक जननरोधी कहते है। फफुंदनाशक दवाओं का वर्गीकरण : इन दवाओं का तीन तरह से वर्गीकरण किया जा सकता है रसायनिक प्रकृति के आधार पर फफंदों के प्रति उनकी क्रियाविधि के आधार पर दवाओं के सामान्य उपयोग के आधार पर रसायनिक प्रकृति के आधार पर 1. गंधक युक्त दवायें :- अकार्बनिक गंधक दवायें:- गंधक चूर्ण, घुलनशील गंधक, चूना गंधक घोल,  कार्बनिक गंधक:-  फेरबम] थाइरम, जाइरम,  जिनेब, मेनेब,  नेबाम,  वेपाम। 2. ताम्रयुक्त दवायें :- बोर्डो मिश्रण, बरंगंडी मिश्रण, क्यूपरस आक्साइड, कापर कारबोनेट, सिथर झारकीय तांबा:- कापर...