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भूजल Tag

Making of rainwater harvesting system भूजल के जबर्दस्त दोहन से लगातार पानी का स्तर नीचे जा रहा है। शहरीकरण के कारण प्राकृतिक रिचार्ज क्षेत्रों मे भारी गिरावट हो रही है जिसके कारण भूजल का स्तर बहुत नीचे हो गया है अथवा कई जगहो पर तो उसे निकालना ही असंभव हो गया है।  इससे पेयजल की किल्लत हो रही है। वर्षा के अनियमित पैट्रन, कभी अति वर्षा और कभी सूखा जैैैसी घटनाओं के कारण बारिश का पानी यूँ ही बहकर बर्बाद हो जाता है। वर्षा जल को बचाकर संचय करने से साल भर उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। वर्तमान परिस्थिति मे वर्षा जल संचयन अत्यंत उपयोगी हो सकता है। इससे पेड़-पौधों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी। बड़े शहरों में पानी की समस्या में बहुत हद तक कमी आ सकती है। इससे सप्लाई वॉटर या अंडरग्राउंड वॉटर का इस्तेमाल कम होगा और उसकी बचत होगी। कैसे करें रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सबसे पहले इसे सही तरीके से समझने की जरूरत है। बारिश के पानी को हम जहाँ से भी ज्यादा-से-ज्यादा इकट्ठा कर सकते है, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग वहीं होनी चाहिए। छत इसके लिए सबसे मुफीद जगह होती है। सोसायटीज और खुद की जमीन पर अपने हिसाब से घर बनाने वालों के लिए वॉटर हार्वेस्टिंग आसान है और इसे अनिवार्य भी बनाया जा रहा है।  थोड़ी-सी जानकारी लेकर आप खुद भी रेन हार्वेस्टिंग...

Composite Hydrologic Index: Groundwater recharge estimation tool भूजल , पुनर्भरण वर्षा, भू-आकृति, मिट्टी के प्रकार और भूमि उपयोग, जलवायु और क्षेत्र के भूगर्भीय कारक पर निर्भर करता है। पिछले कुछ वर्षों में, भूजल पुनर्भरण में कमी आई है तथा भूजल का उपयोग बढ़ गया है। इसके परिणाम स्वरूप भारत के कई हिस्सों में पानी की गंभीर समस्या हो गई है। सिंचाई और घरेलू उपयोग के लिए पानी प्रदान करना एक प्रमुख चुनौती बन गया है। इसे सतह और भूजल संसाधनों के प्रबंधन के एकीकृत दृष्टिकोण से हल किया जा सकता है। जैसा की हम जानते हैं, भूजल पुर्नभरण और भूजल की मात्रा में बढ़ोतरी वर्षा के जल पर  निर्भर करता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग ५८  प्रतिशत भूजल पुर्नभरण में मानसून वर्षा का योगदान होता है। कृत्रिम भूजल पुनर्भरण के लिए सतह और भूजल संसाधनों के बीच परस्पर क्रिया की समझ होना जरूरी है। किसी क्षेत्र में कृत्रिम भूजल पुनर्भरण क्षमता की योजना और कार्यान्वयन के लिए सतही प्रवाह की क्षमता का आकलन आवश्यक है। भूजल उपयोग योजना और एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन रणनीतियों के विकास के लिए भूजल पुनर्भरण क्षमता का आकलन आवश्यक है। इस अध्ययन में बेतवा बेसिन में एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन के लिए वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण क्षमता को प्रतिरूपण करने का...

Bio-drainage is an eco-friendly solution for waterlogged areas भारत में कुल जलाक्रांत भूमि लगभग 7 मिलियन हेक्टेयर है।  परंपरागत जल निकासी प्रणाली या ड्रेनेज को सतहजल तथा धरातल जल निकासी पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। इसका तात्पर्य है की आवश्यकता से ज्यादा या अतिरिक्त पानी को मिट्टी की सतह और मिट्टी की प्रोफाइल से हटाना है। जल निकास प्रणाली को शुरुआत में बनाने के लिए अधिक पूंजी निवेश, संचालन और रखरखाव की आवश्यकता होती है। इस समस्या को सुलझाने के लिए जैविक जल निकासी या जैव जल निकासी तकनीक को एक संभावित विकल्प केरूप मे प्रयोग कि‍या जा सकता है। दुनिया का लगभग एक तिहाई सिंचित क्षेत्र में जलाक्रांत या जलभराव की समस्या है। जलाक्रांत क्षेत्र में बढ़ौतरी के मुख्य कारण नहरों से रिसाव, खारे भूजल के निकास में कमी, नहर के पानी से सतही सिंचाई और प्राकृतिक जल निकासी की अनुपस्थिति हैं। जलभराव, पर्यावरण प्रदुषण जैसे पानी और मृदा में नमक बढ़ाने जैसी समस्या भी उत्पन करती है। जैव जल निकासी तकनीक के अन्तर्गत पौधों के माध्यम से मिट्टी के पानी की ऊर्ध्वाधर जल निकासी करते है। इस तकनीक के तहत जलाक्रांत क्षेत्र से पानी को पौधों के वाष्पन-उत्सर्जन प्रतिक्रिया के द्वारा जल निकासी करते है। यह तकनीक अन्य जल निकास तकनीक की तुलना में कम पूंजी निवेशी है साथ...

Combined use of surface and groundwater for good farming भूजल का तातपर्य यह है की जो जल जमीन के निचली सतह में पाया जाता है। जैसा की हम जानते है, भारत दुनिया का सबसे ज्यादा भूजल उपयोग करने वाला देश है और यह ग्रामीण इलाकों में पेयजल का पच्चासी प्रतिशत आपूर्ति करता है। भारत देश में भूजल का सबसे ज्यादा उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है, जो की कृषि के लिए किए गये कुल सिंचाई पानी उपयोग का पच्चासी प्रतिशत है। हमारे इस भारत देश में प्रकृति द्वारा प्राप्त सतह और भूजल प्रयाप्त मात्रा में उपस्थिस्थ है, जो की असमान रूप से पूरे देश में वितरित है। दिन व दिन, हमारे देश में सतह जल का आभाव होता जा रहा है और भूजल का कृषि के लिए उपयोग बढ़ता जा रहा है जो की हम्रारे देश की खेती के लिए बहुत बड़ा संकट बन सकता है। सतह जल का आभाव का तातपर्य यह है की हमारे देश में वर्षा जल की कमी होती जा रही है, जो की हमारे देश की कृषि के लिए सही संकेत नहीं है। जैसा की हमलोग जानते है की हमारे देश की लगभग साठ प्रतिशत कृषियोग भूमि बर्षा पर आधारित है। बर्षा का जल सतह जल और भूजल की उपस्तिथि का सबसे बड़ा वाहक है। आज हमारे देश...

Management of degradation in groundwater level मिट्टी में जरूरत के मुताबिक नमी का होना बहुत जरूरी है । खेत की तैयारी से लेकर फसल की कटाई तक मिट्टी में एक निश्चित नमी रहनी चाहिए । कितनी नमी हो यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा कार्य करना है और मिट्टी की बनावट कैसी है । जैसे बलुवाही मिट्टी में कम नमी रहने से भी जुताई की जा सकती है, लेकिन चिकनी मिट्टी में एक निश्चित नमी होने से ही जुताई हो सकती है । इसी तरह अलग-अलग  फसलों के लिए अलग-अलग  नमी रहनी चाहिए । जैसे -धान के लिए अधिक नमी की जरूरत है लेकिन बाजरा, कौनी वगैरह कम नमी में भी उपजाई जा सकती है| पौधों के लिए आवश्यक नमी का होना बहुत ही जरूरी है । क्योंकि नमी के चलते ही पौधों की जड़ें फैलती हैं और पौधे नमी के साथ ही मिट्टी से अपना भोजन लेते हैं । साथ ही मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणु भी मिट्टी में हवा और पानी के एक निश्चित अनुपात में ही अपना काम कर पाते हैं और पौधों के लिए भोजन तैयार करते हैं । पठारी क्षेत्रों में सिचाई की क्षमता काफी कम है । यहाँ खरीफ में केवल सात प्रतिशत जमीन में ही सिंचाई हो सकती है, जबकि रबी के मौसम में...

पीने के पानी में फ्लोराइड: - एक छिपी हुई ज़हर  An adequate water resource for future generations is not only a regional issue but also a global concern. Like other parts of world, India is also facing a water crisis and by 2025 it is estimated that India’s population will be suffering from severe water scarcity. Although India occupies only 3.29 million Km2 geographical area, which forms 2.4% of the world’s land area, it supports over 15% of world’s population with only 4% of the world’s water resources. Groundwater contributes only 0.6% of the total water resources on earth; it is the major and preferred source of drinking water in rural as well as urban areas. It caters to 80% of the total drinking water requirement and 50% of the agricultural requirement in rural India. But in the era of economical growth, due to various ecological factors either natural or anthropogenic, the groundwater is getting polluted because of deep percolation from intensively cultivated fields, disposal of hazardous wastes, liquid and solid wastes from industries, sewage disposal, surface impoundments etc. Presence of various hazardous contaminants like fluoride, arsenic, nitrate, sulfate, pesticides, other heavy metals etc. in underground water has been reported from different parts of India. In many cases, the water sources have been...