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मोटे अनाज उत्पादन का मशीनीकरण और कठिन परिश्रम में कमी Several elements contribute to millet cultivation restrictions; like lack of awareness, weed infestation, labour intensive crops, limited research and many more. The researchers have put considerable efforts to make its cultivation easy and solve several challenges. In millet cultivation higher demand and drudgery of women in production, post-harvest processing, lower profitability compared to alternative crops, etc are reasons for neglecting them in farming as well as its use as food. It is thought that the Millets have existed for roughly 7,000 years. They are predominantly grown in Asia and Africa, with Nigeria, China, Niger, and India being the top producers. In 2022, 39% of the world's total millets were produced in India. Although these grains are grown in at least 130 nations, the dominance of rice and wheat has often sent them to the sidelines. Recently, the government renamed it to Shree Ann to draw attention to them. Compared to their more well-known counterparts, millets have a number of benefits. It is tolerant to climate change and can grow in arid areas with fewer inputs. They are inexpensive but a great source of fibre, antioxidants, minerals, proteins, and iron, and they are naturally gluten-free. For anyone with celiac disease, gluten intolerance, high blood...

Importance of millets in the context of climate change Coarse grain is called millet in English. Millets are a nutritious food for humans and animals. You can grow millet anywhere. It can be easily grown in dry areas, rainy areas, coastal areas or hilly areas. People around the world should take note of the general benefits of climate-friendly millet production and consumption as this crop is hassle-free to produce and has many health benefits. Importance of millets in the context of climate change मोटे अनाज को अंग्रजी में मिलेट कहते है। मोटे अनाज मानव और जानवरों के लिए एक पौष्टिक आहार है। मिलेट को आप कहीं पर भी उगा सकते है। इसे सूखे क्षेत्र, वर्षा क्षेत्रों, तटीय क्षेत्रों या पहाड़ी क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है। दुनिया भर के लोगों को जलवायु के अनुकूल मोटे अनाज के उत्पादन और खपत के सामान्य फायदों पर घ्यान देना चाहिया क्योंकि इस फसल का उत्पादन बिना किसी परेशानी के होता है और इसके खाने से लोगों को सेहत के मामले में बहुत लाभ होता हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी इत्यादि) का वर्ष घोषित किया है और सभी भागीदारों से कहा हैं कि पोषण और स्वास्थ्य के मामले में मोटे अनाज की खपत से होने वाले फायदों के साथ-साथ...

Food Security in the Age of Climate Change through Coarse Cereals जलवायु परिवर्तन का भारत जैसे उभरते देशों की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। यह खाद्य उपलब्धता, खाद्य पहुंच, खाद्य उपयोग और खाद्य प्रणाली स्थिरता को प्रभावित करता है जो खाद्य सुरक्षा के चार आयाम है। वर्तमान स्थिति में विश्व में हर तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण मुख्य खाद्य फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। कृषि विशेषज्ञ बारिश की बढ़ती अनियमतता और फसलों के पकाव के समय अत्यधिक तापमान के प्रतिकूल प्रभाव से फसलों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे है। मोटे अनाज वाली फसलों में अन्य खाद्य फसलों के मुकाबले सूखे और अधिक तापमान को सहन करने की क्षमता होती है। इसी वजह से जलवायु परिवर्तन का सबसे कम प्रकोप मोटे अनाज वाली फसलों में है और इनको आगामी दशकों में मूल भोजन के रूप में देखा जा रहा है। सामान्यतः मोटे अनाज वाली फसलों को सुपरफूड कहा जा सकता है। मोटे अनाज वाली फसलों को अक्सर कम लागत पर उगाया जाता है व इनमे रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग भी काफी कम मात्रा में होता है, जो टिकाऊ खेती का एक बड़ा स्तम्भ है। गेहूं और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों में ग्लूटेन की मात्रा ज्यादा होती हैं। गेहूं की अधिक खपत...

Nutritious and healthy coarse grains are super food cereals भारत में 60 के दशक के पहले तक कदन्न अनाज की खेती की परम्परा थी। कहा जाता है कि हमारे पूर्वज हजारों वर्षों से कदन्न अनाज का उत्पादन कर रहे हैं। भारतीय हिंदू परंपरा में यजुर्वेद में कदन्न अनाज का जिक्र मिलता है। 50 साल पहले तक मध्य और दक्षिण भारत के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में मोटे अनाज की खूब पैदावार होती थी। एक अनुमान के मुताबिक देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन में कदन्न अनाज की हिस्सेदारी 40 फीसदी थी। कदन्न अनाज को मोटा अनाज भी कहा जाता है क्योंकि इनके उत्पादन में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। ये अनाज कम पानी और कम उपजाऊ भूमि में भी उग जाते हैं। आज भी भारत में कुछ क्षेत्रों में कदन्न फसलों में ज्वार (सोरघम), बाजरा (पर्ल मिलेट), रागी (फिंगर मिलेट), कंगनी (फॉक्सटेल मिलेट), कुटकी (लिटिल मिलेट), चीना (प्रोसो मिलेट), कोदो (कोडोमिलेट), सांवां (बार्नयार्ड मिलेट) तथा भूराशीर्ष कदन्न (ब्राउनटॉप मिलेट) आदि की खेती की जाती है।   कदन्न प्रमुख खाद्य फसलों के अंतर्गत आते हैं तथा देश के विविध कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में इनकी खेती की जाती है। ये विशेषकर बारानी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त है। बहुत ही कम निवेश के साथ इनकी खेती की जा सकती है। ये फसलें जलवायु अनुकूल, कठोर परिस्थितियों में जीवनक्षम...

Finger Millet (Ragi) essential diet for today रागी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उगाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण मिलेट है। रागी  सबसे पौष्टिक और स्वस्थ अनाज में से एक है। अक्सर, आपने भी ऐसा सुना होगा की दूध के सेवन से हड्डियों को मजबूती मिलती है। साथ ही आपने यह भी सुना होगा की दूध के साथ कुछ पौष्टिक पदार्थ मिलाकर पिने से शरीर को ज्यादा मात्रा में ताकत मिलती है।  हम आज बात करेंगे रात के समय दूध में रागी मिलाकर पीने के क्या फायदे है। जैसा की आप सभी को यह बात विदित है की दूध हमारे शरीर के लिए एक अमृत वरदान से कम नहीं है क्योंकि, दूध में पाए जाने वाली विटामिन्स, मिनरल्स और अनेक तत्व हमारे शरीर की ऊर्जा एवं विकास के लिए बहुत ही गुणकारी एवं लाभदायी है। विशेषज्ञों के अनुसार दूध सेवन करने का सही समय रात को सोने से पहले बताया जाता है। इसके अलावा दूध के साथ प्रायः कुछ ना कुछ पौष्टिक पदार्थ मिलाकर पीने की सलाह दी जाती है। ताकि दूध से मिलने वाली शक्ति में वृद्धि हो और शरीर को भरपूर मात्रा में आवश्यक पौष्टिक तत्व मिल पाए। हम सभी जानते हैं कि रागी का उपयोग देशभर में बहुत से व्यंजनों के अंदर किया जाता है। अक्सर दूध के साथ...