30 Sep फसल विविधीकरण꞉ संसाधन संरक्षण एिं कृ वि स्थिरता
देश में निरंतर बढ़ती वैश्विक जनसंख्या के कारण खाद्य, रेशा एवं तिलहन की अतिरिक्त आपूर्ति की आवश्यकता बढ़ रही है, जिससे सीमित संसाधनों से अधिक उत्पादन करना एक गंभीर चुनौती बन गया है। जलवायु परिवर्तन, चरम मौसमी घटनाएँ तथा शहरीकरण कृषि की स्थिरता के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ हैं। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक वैश्विक जनसंख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि होगी तथा खाद्यान्न की मांग लगभग दोगुनी हो जाएगी। आईसीएआर के विज़न 2030 के अनुसार, देश में वर्ष 2030 तक खाद्यान्न की मांग बढ़कर 345 मिलियन टन तक पहुँच जाएगी, जिसे स्थिर शुद्ध कृषि क्षेत्र से ही पूरा करना होगा। ऐसी परिस्थितियों में कृषि उत्पादकता एवं स्थिरता बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण एक महत्वपूर्ण रणनीति के रूप में उभरकर सामने आया है। किसी क्षेत्र में केवल एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न फसलों की खेती करके कृषि उत्पादकता एवं स्थिरता बढ़ाने का प्रयास फसल विविधीकरण कहलाता है।
फसल विविधीकरण का अर्थ है नई फसलों अथवा ऐसी फसल प्रणालियों को अपनाना जो किसी विशेष क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप हों तथा साथ ही उत्पादकता एवं लाभप्रदता में वृद्धि सुनिश्चित करें। फसल विविधीकरण सतत कृषि उत्पादकता प्राप्त करने के लिए सबसे अधिक पर्यावरण-अनुकूल, लागत-प्रभावी एवं व्यवहारिक उपायों में से एक है। वर्तमान कृषि प्रणालियों को अधिक टिकाऊ एवं स्थायी बनाने की आवश्यकता है, ताकि वे घरेलू खाद्य, पोषण एवं पर्यावरणीय सुरक्षा की आवश्यकताओं को निरंतर पूरा कर सकें। फसल विविधीकरण का उद्देश्य किसानों को विभिन्न जलवायु-सहिष्णु क्षेत्रों में विविध प्रकार की फसलें उगाने के अधिक विकल्प प्रदान करना तथा कृषि प्रणाली को अधिक लचीला एवं टिकाऊ बनाना है। फसल विविधीकरण के प्रमुख उद्देश्यों में फसल उत्पादकता तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार करना, खरपतवार एवं मृदा अपरदन को कम करना, लाभकारी मृदा सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को बढ़ावा देना तथा मृदा नमी एवं प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना शामिल है। इसके अतिरिक्त, फसल विविधीकरण रोगों, कीटों, एवं अन्य पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय कारकों के कारण फसल विफलता के जोखिम को कम करता है। यह छोटे एवं सीमांत किसानों की आय बढ़ाने तथा ग्रामीण समुदायों में रोजगार सृजन के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। फसल विविधीकरण के लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किसान कम उत्पादन एवं कम मूल्य वाली फसलों से हटकर अधिक उत्पादन एवं अधिक मूल्य वाली फसलों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इस प्रकार, फसल विविधीकरण में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, आय वृद्धि, रोजगार सृजन तथा सतत कृषि विकास के उद्देश्यों को प्राप्त करने की मजबूत क्षमता निहित है।
फसल विविधीकरण के लाभ
फसल विविधीकरण के निम्नलिखित लाभ हैं
- खाद्य एवं पोषण सुरक्षा: फसल विविधीकरण खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने की एक महत्वपूर्ण रणनीति है, जिसमें केवल एक ही फसल या एकल फसल प्रणाली पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न प्रकार की फसलों उत्पादन किया जाता है। इससे कृषि उत्पादन में स्थिरता आती है तथा खाद्यान्न उपलब्धता सुनिश्चित होती है। यह बदलती जलवायु परिस्थितियों में कृषि को अधिक स्थायी एवं लचीला बनाती है। इसका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा, आर्थिक लाभ, तथा संसाधनों के संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना भी है। फल, सब्जियाँ, दलहन एवं अन्य पोषक तत्वों से समृद्ध तथा जैव-सुदृढ़ीकृत (Biofortified) फसलों की खेती द्वारा पोषण सुरक्षा एवं जीवन गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है। विविध फसलों का उत्पादन वर्षभर आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है तथा संतुलित आहार प्रदान कर पोषण सुरक्षा को मजबूत बनाता है। धान या गेहूँ आधारित प्रणाली के स्थान पर दलहनी फसलें, तिलहनी फसलें तथा बागवानी फसलें शामिल करने से आहार में प्रोटीन, विटामिन, खनिज तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।
- रोजगार सृजन एवं गरीबी उन्मूलन: परंपरागत एकल फसल प्रणाली अपनाने से प्रायः रोजगार की कमी हो जाती है तथा रोजगार के अवसर सीमित हो जाते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी एवं आय अस्थिरता की समस्या उत्पन्न होती है। फसल विविधीकरण रोजगार सृजन एवं गरीबी उन्मूलन की एक सतत रणनीति है। विभिन्न फसलों की श्रम आवश्यकताएँ अलग-अलग होती हैं, जिससे पूरे वर्ष रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं। यह किसानों की आय बढ़ाने तथा कृषि आधारित आजीविका को आर्थिक रूप से अधिक स्थिर बनाने में सहायक होता है। फसल विविधीकरण किसानों को एकल फसल पर निर्भरता कम करने में सहायता प्रदान करता है, जिससे किसान बाजार एवं जलवायु संबंधी जोखिमों से स्वयं को सुरक्षित रख सकते हैं। वर्तमान फसल प्रणालियों में उच्च मूल्य वाली फसलों जैसे फल, सब्जियाँ, मसाले, दलहन एवं तिलहन को शामिल करने की आवश्यकता है, क्योंकि ये पारंपरिक फसलों की तुलना में बेहतर मूल्य प्रदान करती हैं तथा किसानों की आय वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
- प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं पर्यावरणीय क्षरण से सुरक्षा: फसल विविधीकरण प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा पर्यावरणीय क्षरण को रोकने, मृदा उत्पादकता तथा भूजल स्तर में गिरावट की प्रवृत्ति को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके माध्यम से किसान प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग करते हुए उत्पादकता बढ़ा सकते हैं तथा भविष्य के लिए पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित कर सकते हैं। फसल प्रणाली में दलहनी फसलों को शामिल करने से वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है, जिससे मृदा उर्वरता बनाए रखने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सहायता मिलती है। यह पोषक तत्वों के संतुलित चक्र को बनाए रखने तथा भूमि के अत्यधिक दोहन को रोकने में भी सहायक है। विविध फसलें एवं फसल प्रणालियाँ जलवायु संबंधी तनावों के प्रति अपेक्षाकृत कम संवेदनशील होती हैं । रासायनिक आदानों के कम उपयोग से खेतों से होने वाले हानिकारक रासायनिक अपवाह में कमी आती है, जिससे नदियों, तालाबों एवं भूजल में प्रदूषण का स्तर घटता है। साथ ही, मृदा में रासायनिक अवशेषों का संचय कम होने से उसकी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणवत्ता संरक्षित रहती है।
- पारिस्थितिक संतुलन: फसल विविधीकरण प्राकृतिक जैव विविधता को बढ़ावा देने में सहायक होता है। फसल प्रणाली में विभिन्न फसलों का समावेश मृदा सूक्ष्मजीवों एवं परागणकर्ताओं की जैव विविधता को बढ़ाता है, जो पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह मृदा जैव विविधता, सूक्ष्मजीवी गतिविधियों तथा पोषक तत्व चक्रण को बढ़ावा देता है। कम कीटनाशक उपयोग वाली फसलों को शामिल करने से कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में प्राकृतिक शत्रुओं एवं परजीवियों का संरक्षण संभव होता है। बेहतर जैव विविधता पारिस्थितिकी तंत्र की सहनशीलता को बढ़ाती है तथा कीट प्रकोपों के प्रभाव को कम करने में सहायता करती है।
- जोखिम में कमी: फसल उत्पादकता में होने वाली अधिकांश परिवर्तनशीलता मौसम पर निर्भर करती है, इसलिए फसल विविधीकरण जलवायु एवं जैविक तनावों के प्रति एक प्रभावी अनुकूलन रणनीति माना जाता है। विविध फसल प्रणालियों में यदि किसी एक फसल पर प्रतिकूल मौसम, कीट या रोग का प्रभाव पड़ता है, तो अन्य फसलें उत्पादन एवं आय को बनाए रखने में सहायक होती हैं। विशेष रूप से छोटे एवं सीमांत किसान नवीन किस्मों एवं विविध फसल प्रणालियों को अपनाकर खाद्य सुरक्षा एवं कृषि आय में सुधार कर सकते हैं। मिश्रित फसल प्रणाली कीट एवं रोग प्रकोप को कम करने के साथ-साथ लाभकारी कीटों एवं प्राकृतिक शत्रुओं को बढ़ावा बढ़ावा देता है, जो कीट नियंत्रण में सहायक होते हैं तथा कृषि प्रणाली की स्थिरता एवं लचीलापन बढ़ाती है।
- फसल अवशेष उत्पादन में संतुलन: गेहूँ की बुवाई से पूर्व धान के अवशेषों का प्रबंधन अनेक क्षेत्रों में एक प्रमुख कृषि चुनौती के रूप में सामने आता है। विशेष रूप से धान–गेहूँ फसल प्रणाली में धान की कटाई के बाद खेत में बड़ी मात्रा में फसल अवशेष (पराली) शेष रह जाते हैं, जिनका समय पर एवं प्रभावी प्रबंधन करना किसानों के लिए कठिन हो जाता है। फसल विविधीकरण अपनाकर इस समस्या को कम किया जा सकता है तथा फसल अवशेषों के संतुलित प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
- प्रभावी खरपतवार प्रबंधन: धान की एकल फसल प्रणाली अपनाने से घास कुल एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की समस्या बढ़ जाती है। धान की फसल से पूर्व ढैंचा को हरी खाद फसल के रूप में उगाने से इसके एलीलोपैथिक तथा आवरण प्रभाव के कारण खरपतवारों की संख्या कम होती है। ऊँची भूमि क्षेत्रों में सनहेम्प तथा निचली भूमि क्षेत्रों में ढैंचा को फसल विविधीकरण में शामिल करना खरपतवार प्रबंधन के लिए उपयोगी पाया गया है। इसी प्रकार लगातार गेहूँ की खेती के कारण फैलेरिस माइनर के बीजों का भंडार मृदा में अत्यधिक बढ़ गया है, जिससे इसका प्रबंधन कठिन हो गया है। ऐसी स्थिति में राजमा तथा मटर जैसी दलहनी फसलों को फसल विविधीकरण में शामिल करने से इस खरपतवार के प्रभावी प्रबंधन में सहायता मिलती है।
- मृदा जल का कुशल उपयोग: विभिन्न फसलों की जड़ प्रणाली अलग-अलग होती है। गहरी जड़ों वाली फसलें जैसे अल्फाल्फा, अरहर, मक्का एवं कपास मृदा की गहरी परतों से नमी एवं जल का उपयोग कर सकती हैं। बाजरा, ज्वार एवं अन्य मोटे अनाज जल की कमी वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होते हैं। अल्पावधि वाली तथा नमी तनाव सहन करने वाली फसलें जैसे मूंग एवं उड़द को फसल विविधीकरण कार्यक्रम में शामिल कर मृदा जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है।
फसल विविधीकरण को लागू करने की रणनीतियाँ
फसल विविधीकरण कृषि उत्पादन प्रणाली को अधिक उत्पादक, टिकाऊ एवं लाभकारी बनाने की एक समग्र रणनीति है। यह कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता, लाभप्रदता तथा कीट, रोग एवं बाजार मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव से उत्पन्न जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें एकल फसल पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न प्रकार की फसलों का वैज्ञानिक एवं संतुलित समावेश किया जाता है। फसल विविधीकरण को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए निम्नलिखित रणनीतियाँ अपनाई जा सकती हैं:
- कम उत्पादन एवं कम मूल्य वाली फसलों के स्थान पर अधिक उत्पादन क्षमता एवं उच्च बाजार मूल्य वाली फसलों को अपनाना, जो वर्तमान फसल प्रणालियों की तुलना में अधिक शुद्ध लाभ प्रदान करें। इससे किसानों की आय में वृद्धि होने के साथ-साथ कृषि प्रणाली की लाभप्रदता एवं दीर्घकालिक स्थिरता भी सुनिश्चित होती है।
- अधिक जल आवश्यकता वाली फसलों के स्थान पर कम जल आवश्यकता वाली फसलों को अपनाना। जल संकट वाले क्षेत्रों में सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों के माध्यम से फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है। स्प्रिंकलर सिंचाई के लिए चाय तथा सघन दूरी वाली फसलों की पहचान तथा ड्रिप सिंचाई के लिए केला, पपीता एवं फल फसलों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- फसल प्रणाली में दलहनी एवं तिलहनी फसलों को शामिल करना फसल विविधीकरण का एक प्रभावी उपाय है, जो कृषि उत्पादकता एवं संसाधन उपयोग दक्षता को बढ़ाने में सहायक होता है। दलहनी फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा उर्वरता में सुधार करती हैं, जबकि तिलहनी फसलें किसानों को अतिरिक्त आय एवं बाजार आधारित अवसर प्रदान करती हैं।
- फसल विविधीकरण के नए क्षेत्रों एवं विकल्पों की पहचान करना। मेंड़ो पर उगाई जाने वाली फसलें, रिले फसलें, कैच फसलें, मधुमक्खी आकर्षक फसलें, ट्रैप फसलें, मिश्रित फसलें एवं अंतरवर्तीय फसलें, फसल विविधीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
- राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक मांग वाली फसलों को फसल प्रणाली में शामिल करना किसानों की आय एवं कृषि लाभप्रदता बढ़ाने की एक महत्वपूर्ण रणनीति है। इसके अंतर्गत ऐसी फसलों का चयन किया जाता है जिनकी बाजार में स्थिर एवं उच्च मांग हो, जिससे बेहतर मूल्य प्राप्त किया जा सके। पारंपरिक अनाज फसलों के साथ चना, मूंग, मसूर, सोयाबीन, मसाले एवं बागवानी फसलों को शामिल कर किसान घरेलू एवं निर्यात बाजारों से अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
- कम ऊर्जा दक्षता वाली फसलों के स्थान पर अधिक ऊर्जा दक्ष फसलों को अपनाना।
- मुख्य फसलों के बीच क्लोवर, मूंग आदि जैसी आवरण फसलों की खेती करना, जिससे मृदा अपरदन कम होता है, खरपतवार नियंत्रण में सहायता मिलती है तथा मृदा में कार्बनिक पदार्थ की स्थिति में सुधार होता है।
- उपयुक्त फसलों को सम्मिलित करते हुए समेकित कृषि प्रणाली को बढ़ावा देना।
- फसल विविधीकरण के अंतर्गत उत्पादित फसलों के लिए विपणन सुविधाओं एवं बाजार तंत्र को सुदृढ़ करना।
फसल विविधीकरण के उपाय
- i) फसल चक्र: फसल चक्र एक ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें एक ही भूमि पर निश्चित क्रम में विभिन्न फसलों की खेती की जाती है। इसका उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य में सुधार करना तथा कीट एवं खरपतवार के दबाव को कम करना होता है। मृदा उर्वरता बनाए रखने एवं कीट चक्र को तोड़ने के लिए अनाज फसलों के साथ दलहनी फसलों का फसल चक्र अपनाना एक सामान्य एवं प्रभावी उपाय है।
- ii) कैच फसल: मुख्य फसलों के बीच अथवा उस अवधि में जब मुख्य फसल नहीं उगाई जा रही हो, उस समय अल्प अवधि एवं तीव्र वृद्धि वाली फसलों की खेती को कैच फसल कहते हैं। यह आवरण फसल का एक विशेष प्रकार है, जो नाइट्रोजन के अपक्षालन को कम करने, पर्यावरणीय लाभ बढ़ाने, मृदा संरचना में सुधार तथा मृदा की जैविक सक्रियता को बढ़ावा देने में सहायक होती है।
iii) द्वि-फसली अथवा बहुफसली प्रणाली: एक ही खेत में एक फसल मौसम के दौरान दो या अधिक फसलों की खेती करना द्वि-फसली अथवा बहुफसली प्रणाली कहलाता है। इससे किसानों की आय में वृद्धि होती है, खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है तथा एकल फसल प्रणाली की तुलना में कीट एवं रोगों का प्रकोप कम होता है। साथ ही, यह जैविक एवं अजैविक कारकों के कारण फसल विफलता के जोखिम को भी कम करता है।
- iv) रिले फसल प्रणाली: रिले फसल प्रणाली एक सतत कृषि तकनीक है, जिसमें पहली फसल की कटाई से पहले उसी खेत में दूसरी फसल की बुवाई कर दी जाती है। इस प्रणाली में दो फसलों की वृद्धि अवधि आंशिक रूप से एक-दूसरे से ओवरलैप करती है, जिससे संसाधनों का अधिकतम एवं कुशल उपयोग संभव होता है। यदि इस प्रणाली में दलहनी फसलों को शामिल किया जाए, तो यह मृदा उर्वरता एवं मृदा संरचना में सुधार करने में सहायक होती है।
- vi) कृषि-वानिकीकरण: कृषि-वानिकीकरण में वृक्षों एवं झाड़ियों को फसलों अथवा पशुपालन के साथ एकीकृत किया जाता है। वृक्ष छाया प्रदान करते हैं, मृदा संरचना में सुधार करते हैं तथा कार्बन संचयन में योगदान देते हैं।
vii) अंतरवर्तीय खेती: अंतरवर्तीय खेती वह पद्धति है जिसमें एक ही खेत में एक निश्चित पंक्ति व्यवस्था के साथ एक ही समय पर दो या अधिक फसलों की खेती की जाती है। इसमें विभिन्न फसलों को निकटता में उगाया जाता है ताकि उनकी पूरक वृद्धि विशेषताओं का लाभ लिया जा सके। इसका मुख्य उद्देश्य उन संसाधनों का अधिकतम उपयोग करके कुल उत्पादकता बढ़ाना है जिनका उपयोग एकल फसल पूरी तरह नहीं कर पाती।
viii) मिश्रित खेती: अंतरवर्तीय खेती के विपरीत, मिश्रित खेती में दो या अधिक फसलों की खेती एक ही समय पर बिना किसी निश्चित पंक्ति व्यवस्था के की जाती है। इसका उद्देश्य उत्पादन जोखिम को कम करना तथा उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करना होता है।
- ix) ट्रैप फसल: ट्रैप फसल वह प्रणाली है जिसमें मुख्य फसल के साथ उसी खेत में दूसरी फसल उगाई जाती है ताकि कीटों को मुख्य फसल से आकर्षित कर दूसरी फसल की ओर मोड़ा जा सके। इस तकनीक द्वारा कीटों को मुख्य फसल तक पहुँचने से रोका जा सकता है तथा उन्हें खेत के एक सीमित क्षेत्र में नियंत्रित कर कम लागत पर प्रभावी कीट प्रबंधन किया जा सकता है।
निष्कर्ष
जलवायु परिवर्तन के वर्तमान परिदृश्य में एकल फसल प्रणाली से फसल हानि एवं पर्यावरणीय क्षरण का जोखिम बढ़ रहा है। ऐसे में फसल विविधीकरण कृषि उत्पादन, लाभप्रदता एवं स्थिरता बढ़ाने का एक प्रभावी उपाय है। यह खाद्य, पोषण एवं पर्यावरणीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के साथ किसानों की आय एवं आजीविका सुधारने में सहायक है। विविध फसलों की खेती से कीट, रोग एवं अजैविक तनावों के कारण फसल विफलता का जोखिम कम होता है तथा कृषि आय का सतत प्रवाह बना रहता है। साथ ही, यह कृषि को अधिक लचीला, टिकाऊ एवं आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाकर जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः फसल विविधीकरण को इस प्रकार अपनाया जाना चाहिए कि वर्तमान एवं भविष्य की पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा तथा पर्यावरणीय संतुलन दोनों सुनिश्चित हो सकें।

Author’s
मोहम्मद हाशिम, नरेंद्र कुमार, आदर्शकुमार, मन मोहन देव एवं कृष्ण कुमार सिंह
भाꞏ कृꞏ अनुꞏ पꞏ- भारतीय दलहन अनुसन्धान संस्थान] कानपुर- 208024
Corresponding author’s email: hashim.agronomy@gmail.com