Agriculture Knowledge for Everyone

जैव उर्वरक Tag

भूमिका मृदा स्वास्थ्य कृषि उत्पादन की आधारशिला है। स्वस्थ मिट्टी ही लंबे समय तक टिकाऊ उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और कम लागत वाली खेती सुनिश्चित करती है। आज की कृषि व्यवस्था में केवल अधिक उत्पादन के लक्ष्य के कारण नाइट्रोजन (यूरिया) का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिससे मिट्टी में पोषक असंतुलन, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और जैविक सक्रियता में गिरावट देखी जा रही है। भारत सरकार किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने के लिए भारी उर्वरक सब्सिडी (Fertilizer Subsidy) प्रदान करती है। हालांकि, उर्वरकों के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग के कारण यह सब्सिडी अब सरकार के खजाने पर एक बड़ा बोझ बनती जा रही है। संतुलित पोषक प्रबंधन का उद्देश्य केवल उर्वरक देना नहीं, बल्कि मिट्टी, पौधे और सूक्ष्मजीवों के बीच प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना है। इसके लिए रासायनिक, जैविक और प्राकृतिक खेती के तरीकों का समन्वय आवश्यक है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाकर किसान न केवल अपनी भूमि को बचा सकते हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी अपना योगदान दे सकते हैं। 1. मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन मृदा परीक्षण वैज्ञानिक खेती का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। विधि खेत से 8-10 स्थानों से 0-15 सेमी गहराई तक मिट्टी नमूना लें सभी नमूनों को मिलाकर 500 ग्राम से 1 किग्रा प्रतिनिधि नमूना बनाएं कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या मृदा परीक्षण...

जैविक खेती की तकनीक आज जब हम अपनी खेती में हुई प्रगति को देखते है तो वह बहुत ही उत्साहित करती है। इस प्रगति का श्रेय हरित क्रांति को जाता है। हरित क्रांति की प्रगति के साथ अन्य क्रान्तियों का भी देश की प्रगति में बड़ा योगदान है जैसे श्वेत क्रांति(दुग्ध उत्पादन), पीली क्रान्ति (तिलहन उत्पादन), नीली क्रान्ति (मतस्य उत्पादन), लाल क्रान्ति (मांस) एवं गोल्डेन क्रान्ति (हार्टीकल्चर सहयोग)। रसायनिक उर्वरकों के अन्धाधुंध एवं असन्तुलित प्रयोग से कृषि जगत का पर्यावरणीय सन्तुलन बिगड़ गया है इसलिये पर्यावरण की सुरक्षा लिये तथा मृदा की उर्वरता बनाये रखने के लिये भविष्य में जैविक खेती एक उत्तम विकल्प है । जैविक खेती जैविक खेती, खेती की वह प्रक्रिया है जिसमें उत्पादन के लिए प्रयोग किये जाने वाले निवेशों का आधार जीव अंश से उत्पादित हो और पशु मानव और भूमि के स्वास्थ्य को स्थिरिता प्रदान करते हुए पर्यावरण का पोषण करें जैविक खेती कहलाती है। जैविक खाद एवं जैव उर्वरक जैविक खाद एवं जैव उर्वरक वही खाद है जिसका प्रयोग प्रारम्भिक समय से करते आ रहे हैं और आज भी कमोवेश इनका प्रयोग किसान कर रहा है। इन जैविक खादों की श्रृंखला में कुछ नवनिर्मित खाद जैसे वर्मी कम्पोस्ट। ये जैविक खाद प्राकृतिक पदार्थ जैसे- घास -फूस, पशुओं के मलमूत्र एवं अन्य अवशेषों द्वारा बनाये जाते है इनमें कम मात्रा...

Wonderful world of agricultural useful organisms, the basis of good and advanced agriculture सूक्ष्मजीवों का संसार अनदेखा, विस्मयकारी और अद्भुत हैं। नग्न आँखों से नजर न आने वाले ये जीव धरती पर जीवन की निरंतरता को बनाये रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिक शोधों से पता चलता है कि ये सूक्ष्मजीव कृषि के क्षेत्र में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये सूक्ष्मजीव विभिन्न प्रकार कि जैव-रासायनिक प्रकियाओं में सहभागी बनकर फसलों के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ये सूक्ष्म जीव विभिन्न प्रकार के एंटीबायोटिक्स का स्त्राव कर अन्य रोगकारक जीवों की वृद्धि को या तो रोक देते हैं या फिर उनको मार देते है। दूसरे कुछ सूक्ष्मजीव पौधे की मिट्टी में से पोषक तत्व ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ा कर उनके विकास और वृद्धि में सहायक सिद्ध होते हैं। कुछ सूक्ष्म जीव  पर्यावरण में उपस्थित महत्वपूर्ण पोषक तत्वों जैसे की नाइट्रोजन को विभिन प्रकियाओं द्वारा पौधों के उपयोग के लिए उपलब्ध करवाते हैं। कुछ सूक्ष्म जीव सल्फर, फॉस्फेट तथा जिंक जैसे सूक्ष्म तत्वों को घुलित अवस्थ में बदल देते हैं जो बाद में पौधे द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं। कुछ सूक्ष्म जीव वृद्धि हार्मोन्स जैसे की ऑक्सिन और साइटोकिनिंस का निर्माण करके पौधे की अंकुरण, वृद्धि एवं उत्पादन की क्षमता को प्रभावित करते हैं। नवीन वैज्ञानिक शोधों में ये...

जैविक खेती में जैव उर्वरकों की भूमिका जैविक कृषि एक उत्पादन प्रणाली है जो मिट्टी, पारिस्थितिक तंत्र और लोगों के स्वास्थ्य को बनाए रखती है। यह पारिस्थितिक प्रक्रियाओं, जैव विविधता और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल चक्रों पर निर्भर करता है। जैव उर्वरक प्राकृतिक खाद हैं जिसमें जीवाणुओं, शैवाल के सूक्ष्म जीवाणु , बीजाणु के रूप में रहते हैं। अकेले कवक या उनका संयोजन पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि करते हैं। कृषि में जैव उर्वरक की भूमिका विशेष महत्व रखती है, विशेष रूप से वर्तमान में रासायनिक उर्वरक की बढ़ती लागत और मिट्टी के स्वास्थ्य पर उनके खतरनाक प्रभावों के संदर्भ में। आधुनिक कृषि,  संकर बीज और उच्च उपज देने वाली किस्मों का उपयोग करने पर जोर देती है जो की रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई की बड़ी खुराक के लिए उत्तरदायी है। कृत्रिम उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग मृदा और जल नालियों के प्रदूषण का कुछ हद तक कारण बना है। इससे मिट्टी क़े आवश्यक पोषक तत्व और कार्बनिक पदार्थ का भी छरण हो रहा है। इससे लाभकारी सूक्ष्म जीवों का कमी हो रहा है और जिसके कारण नुकसान पहुचने वाले कीट की अप्रत्यक्ष रूप से जनसंख्या मिट्टी में बढ़ रही है और फसलों  में बीमारियों की समस्याएं दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है I हरित क्रांति के बाद से रासायनिक उर्वरकों का बड़े...

Blue Green Algae Generated Biofertilizer भूमि की उर्वरा शक्ति बरकरार रखने तथा इसे बढ़ाने के लिए एक जैव उर्वरक जो नील हरित शैवालों के संवर्धन से बनाया जाता है अति महत्वपूर्ण है। यह जैव उर्वरक खरीफ सीजन में 20-25 कि.ग्रा. नेत्रजन प्रति हे. पैदा करता है तथा मिट्टी के स्वास्थ्य को ठीक रखता है। इसके अतिरिक्त भूमि के पानी संग्रह की क्षमता बढ़ाना एवं कई आवश्यक तत्व पौधों को उपलब्ध कराता है। भूमि के पी.एच. को एक समान बनाये रखने में मदद करता है तथा अनावश्यक खरपतवारों को पनपने से रोकता है। इसे जैव उर्वरक के लगातार प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है तथा धान एवं गेहूं की उपज भी 5-10 प्रतिशत बढ़ती है। इस जैव उर्वरकों का प्रयोग कम से कम 70 कि.ग्रा./हे यूरिया बचत करता है। जिससें अधिक यूरिया के अनावश्यक प्रयोग से भूमि उसर में नजदीक होने से बचाव होता है। इतना उपयोगी जैव उर्वरक किसान अपने खेत खलिहान पर स्वयं बनाकर अपने खेतों में प्रयोग कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त अधिक मात्रा में उत्पादित करके धनोपार्जन भी कर सकता हैं। इस जैव उर्वरक को विभिन्न तरीके से बनाया जा सकता है। उत्पादन तकनीक- नील हरित शैवाल जनित जैव उर्वरक में मुख्यतया आलोसाइरा, टोलीपोथ्रिक्स, एनावीना, नासटाक, प्लेक्टोनीमा नील हरित शैवाल होते है। ये शैवाल वायुमंडल के नेत्रजन को लेकर...

Measures to increase production in rabi crops वर्तमान जलवायु परिवर्तन के दौर में विभिन्न फसलों का अपेक्षित उत्पादन एक गंभीर चुनौती है। मृदा उर्वरता घटने के कारण वर्तमान खाद्यान्न उत्पादन स्तर भी बरकरार रख पाना कठिन प्रतीत हो रहा है। कृषि उत्पादन में बढोतरी के लिए हमारे सामने दो महत्वपूर्ण विकल्प हैं - पहला यह कि हम पैदावार बढा़ने के लिए कृषि योग्य भूमि में वृद्धि करें जो कि लगभग असंभव है। अब हमारे पास सिर्फ दूसरा महत्वपूर्ण विकल्प बचता है कि कम से कम क्षेत्रफल से अधिक से अधिक पैदावार लें। एकीकृत फसल प्रबंधन एक ऐसी विधि है जिससे पर्यावरण संरक्षित रखते हुए अधिक कृषि उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। दीर्घकालीन टिकाऊ खेती हेतु उत्पादन के विभिन्न घटकों जैसे भूमि, जल, मृदा एवं फसलों आदि के प्रभावशाली प्रबंधन करने होंगे। उपरोक्त बिन्दूओं को दृष्टिगत रखते हुए रबी फसलों के उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि हेतु विभिन्न उपायों के विवरण निम्नलिखित हैं।  फसलों के उत्पादन वृद्धि हेतु उपाय:- बुवाई पूर्व बीजोपचार यह बीज जन्य रागों की रोकथाम की सबसे आसान, सस्ती और लाभकरी विधि है। फफूंदनाशी रसायन बीज जन्य रोगाणुओं को मार डालता है अथवा उन्हें फैलने से रोकता है। यह एक संरक्षण कवच के रूप में बीजों के चारों ओर एक घेरा बना लेता है जिससे बीज को रोगजनक के आक्रण एवं सड़ने...

जैव उर्वरक: टि‍काऊ खेती के लिए एक साधन After the introduction of chemical fertilizers in the last century, farmers were happy of getting increased yield in agriculture in the beginning. However, slowly chemical fertilizers started displaying their ill effects such as leaching out and polluting water basins, destroying microorganisms and friendly insects, making the crop more susceptible to diseases, reducing the soil fertility and thus causing irreparable damage to the overall system. A number of intellectuals found that biofertilizers can help in increasing the yield without causing the damage associated with chemical fertilizers. What is Bio Fertilizer?  Biofertilizers are preparations containing microorganisms, with capability of mobilizing nutritive elements from non-usable form to usable form through biological processes. The name itself is self-explanatory. The fertilizers are used to improve the fertility of the land using biological wastes, hence the term bio fertilizers, and biological wastes do not contain any chemicals, which are detrimental to the living soil. They are extremely beneficial in enriching the soil with those microorganisms, which produce organic nutrients for the soil and help combat diseases. The farm produce does not contain traces of hazardous and poisonous materials. Thus, those products are accepted across the world as organic ones. Hence, for organic farming the use of bio fertilizers is mandatory. Organic fertilizers differ from chemicals fertilizers...

Soil Health- an integral part of the beneficial and sustainable agriculture. भारत की लगभग दो तिहाई आबादी की जीविका का मूल आधार कृषि है। शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण कृषि योग्य जमीन दिन प्रतिदिन घटती जा रही है, साथ ही साथ इसकी गुणवत्ता में उल्लेखनीय कमी आती जा रही है। बीसवी श्‍ादी के उत्तरार्ध में देश मेे हरि‍त क्रांति से कृषि उपज में गुणात्मक बढ़ोत्तरी हुई। जिसके मूल में अधिक उपज देने वाली किस्में, रासायनिक उर्वरक एवं व्यापक पैमाने पर पाक-संरक्षक उपायों का अपनाये जाना था। जिसके दुष्परिणाम कृषि उत्पादन की कमी के रूप में बाद के दशकों में दिखाई देने लगे। जिसका एक प्रमुख कारण मृदा गुणवत्ता में आई उत्तरोतर कमी को भी माना गया। जिसके अनिगिनत वैज्ञानिक सन्दर्भ उपलब्ध है। अतः मृदा स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखना आधुनिक कृषि की सबसे बड़ी एवं विषम चुनातियों में से एक है । मृदा स्वास्थ्य क्‍या है   मृदा अथवा जमीन को अभी तक एक निर्जीव संसाधन माना जाता रहा है। परन्तु तथ्य इसके एकदम विपरीत है। मृदा एक जीवंत निकाय है। जिसके परिभाषित जैविक, रासायनिक और भौतिक गुणधर्म होते है। इनमे से किसी भी एक गुणधर्म में परिवर्तन अथवा बदलाब मृदा के मूलभूत स्वरुप में, उसके स्वभाव में उल्लेखनीय परिवर्तन कर देते है। फलतः मृदा की उर्वरता में खासी कमी देखने को मिलती है। उदाहरण के तौर पर,...