21 Sep संतुलित उर्वरक उपयोग एवं प्राकृतिक खेती पर आधारित किसानों हेतु तैयार-प्रयोग मार्गदर्शिका
भूमिका मृदा स्वास्थ्य कृषि उत्पादन की आधारशिला है। स्वस्थ मिट्टी ही लंबे समय तक टिकाऊ उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और कम लागत वाली खेती सुनिश्चित करती है। आज की कृषि व्यवस्था में केवल अधिक उत्पादन के लक्ष्य के कारण नाइट्रोजन (यूरिया) का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिससे मिट्टी में पोषक असंतुलन, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और जैविक सक्रियता में गिरावट देखी जा रही है। भारत सरकार किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने के लिए भारी उर्वरक सब्सिडी (Fertilizer Subsidy) प्रदान करती है। हालांकि, उर्वरकों के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग के कारण यह सब्सिडी अब सरकार के खजाने पर एक बड़ा बोझ बनती जा रही है। संतुलित पोषक प्रबंधन का उद्देश्य केवल उर्वरक देना नहीं, बल्कि मिट्टी, पौधे और सूक्ष्मजीवों के बीच प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना है। इसके लिए रासायनिक, जैविक और प्राकृतिक खेती के तरीकों का समन्वय आवश्यक है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाकर किसान न केवल अपनी भूमि को बचा सकते हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी अपना योगदान दे सकते हैं। 1. मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन मृदा परीक्षण वैज्ञानिक खेती का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। विधि खेत से 8-10 स्थानों से 0-15 सेमी गहराई तक मिट्टी नमूना लें सभी नमूनों को मिलाकर 500 ग्राम से 1 किग्रा प्रतिनिधि नमूना बनाएं कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या मृदा परीक्षण...