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दलहन Tag

भारत में दलहन उत्पादन की संभावनाएं  प्राचीन काल से ही भारत में उगाई जाने वाली फसलों में दलहनी फसलों का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। शाकाहारी भोजन में प्रोटीन का मुख्य जरीया होने के कारण दलहनी फसलों का महत्त्व काफी बढ़ जाता है। ये फसलें सामान्यतः प्रोटीन की प्रमुख स्त्रोत मानी जाती है। दलहनी फसलों के अंतर्गत प्रमुखतः अरहर, मूंग, उड़द की खेती खरीफ मौसम में तथा चना, मसूर, राजमा एवं मटर की खेती रबी मौसम में की जाती है। भारत के कई स्थानों में मूंग एवं उड़द की खेती जायद में भी की जाती है। दलहनी वर्ग की इन सभी फसलों में प्रोटीन काफी मात्रा में होने के कारण इन में नाइट्रोजन की भी जरूरत पड़ती है। इन फसलों में नाइट्रोजन की मात्रा की पूर्ति वायुमंडल में मौजूद आण्विक नाइट्रोजन से हो जाती है। दलहनी फसलें लेग्यूमेनेसी कुल की फसलें हैं। लेग्यूमेनेसी कुल की फसलों की विशेषता होती है कि उनकी फसलों की जड़ों में ग्रंथियां पाई जाती हैं तथा इन ग्रंथों में राइजोबियम नामक जीवाणु सहजीवन करता है। राइजोबियम नामक जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन का मिट्टी में स्तरीकरण करके मिट्टी को नाइट्रेट की आपूर्ति करता है और इस प्रकार से मिट्टी में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ाकर दलहनी फसलें मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती हैं। परंतु अन्य फसलें मिट्टी की उर्वरता को घटा...

सोयाबीन (ग्लाइसीन मैक्स) की प्रमुख किस्में और उनकी विशेषतायें सोयाबीन एक दलहन कुल की मुख्य तिलहनी फसल है| इसमें 30-40 प्रतिशत प्रोटीन तथा 20-22 प्रतिशत तेल की मात्रा पाई जाती है| यह भोजन और पशु आहार के लिए प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है| इसका वनस्पति तेल खाद्य व औधोगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है| सोयाबीन एक प्रमुख खरीफ फसल है, इसकी बुआई जून-जुलाई में और कटाई सितम्बर-अक्टूबर में की जाती है| राजस्थान में इसकी खेती झालावाड़, कोटा, बारां, चित्तौडगढ़ आदि जिलों में की जाती है| सोयाबीन की प्रमुख किस्में और उनकी विशेषतायें: राजस्थान में उगाई जाने वाली सोयाबीन की विभिन्न किस्में जो सोयाबीन के उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है, निम्न प्रकार है - 1. पी. के. 472: यह मध्यम आकार के पीले दानों वाली, मध्यम ऊँचाई (40 से. मी.) की किस्म हैं| सिंचित अवस्था में इस किस्म में 60-65 दिन में फूल आ जाते हैं और 100-115 दिन में फसल पककर तैयार हो जाती हैं| इसकी औसत उपज असिंचित क्षेत्रों में 9-10 तथा सिंचित क्षेत्रों में 20-25 क्विंटल प्रति हैक्टर होती हैं 2. एन. आर. सी. 37: इस किस्म के दानें पीले व उत्तम अंकुरण क्षमता वाले होते है तथा इसकी फलियों और पत्तियों पर सलेटी रंग के रोयें पाए जाते हैं| यह मध्यम ऊँचाई की 90-95 दिन में पकने वाली किस्म...

प्रचुर मात्रा में मसूर उत्पादन के लिए उन्नत खेती  रबी मौसम में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में मसूर का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके दानों में 24-26% प्रतिशत प्रोटीन, 3% प्रतिशत वसा, 2% प्रतिशत रेशा, 57% प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, कैल्सियम 68 मिली ग्राम/ 100 दाने, स्फुर 300 मिलीग्राम / 100 दाने, लौह तत्व 7 मिलीग्राम / 100 दाने, विटामिन C 450 IU पाई जाती है।  इन विशेषताओ के कारण इसका उपयोग दाल के अलावा अन्‍य कई प्रकार के व्यंजनों में , पूर्ण दाने या आटे के रूप, में किया जाता हैं। मसूर की खेती के लि‍ए भूमि एवं खेत की तैयारीः- मसूर की खेती प्रायः सभी प्रकार की भूमियों मे की जाती है। किन्तु दोमट एवं बलुअर दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। जल निकास की उचित  व्यवस्था वाली काली मिट्टी मटियार मिट्टी एवं लैटराइट मिट्टी में इसकी अच्छी खेती की जा सकती है। खेत की तैयारी के लिये वर्षाकालीन फसल की कटाई के बाद भूमि में उपलब्ध नमी के अनुसार एक या दो बार देशी हल या बरवर से जुताई कर मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती हैं। इसके तुरन्त बाद पाटा चला कर खेत समतल करने से नमी सुरक्षित रहती हैं एवं बुवाई के समय बीज एक समान गहराई पर बोया जाता हैं। जिससे बीज का अंकुरण भी अच्छा होता हैं। हल्की अम्लीय (4.5.- 8.2 पी.एच.) की भूमियों में मसूर की खेती की...

Advanced techniques for cultivating Lentils मसूर एक मूल्यवान मानव भोजन है, जो दाल के रूप में प्रयोग होती है। उच्च जैविक मूल्य के साथ इसे आसानी से पकाया जा सकता है । मसूर में प्रोटीन - 24-26%, कार्बोहाइड्रेट - 57 - 60%, फैट - 1.3%, फाइबर - 3.2%, फास्फोरस - 300 मिलीग्राम/100 ग्राम, आयरन - 7 मिलीग्राम/100 ग्राम, विटामिन सी - 10-15 मिलीग्राम/100 ग्राम, कैल्शियम - 69 मिलीग्राम/100 ग्राम एवं विटामिन ए - 450 आईयू पोषक तत्‍व पाऐ जाते है।  सूखे पत्ते, और टूटी फली को  पशु चारा के रूप में उपयोग किया जाता है।    मसूर की उत्पादकता क्रोएशिया में सबसे अधिक उत्पादकता दर्ज की गई है (2862 किलोग्राम / हेक्टेयर), इसके बाद न्यूजीलैंड (2496 किलो / हे)। भारत की उत्पादकता  (611 किलोग्राम / हेक्टेयर) की तुलना में कनाडा की उत्पादकता  (1633 किलो प्रति हेक्टेयर) के उच्च स्तर की वजह से कनाडा  उत्पादन में प्रथम स्तर पर है  (एफएओ स्टेटस, 2014)। बारहवीं योजना (2012-15) के दौरान देश में मसूर के क्षेत्र में 14.79 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 10.38 लाख टन  मसूर का उत्पादन हुआ। मसूूूर के प्रमुख उत्‍‍‍‍‍‍पादक राज्‍‍‍य मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल , झारखंड है। । मसूर के लि‍ए मिट्टी और खेत की तैयारी: अच्छी तरह से सूखा, तटस्थ प्रतिक्रिया के साथ भुरभुरी मिट्टी मसूर की खेती के लिए सबसे अच्छा है। अम्लीय...

Improved technology for cultivation of Mungbean मूंग भारत में उगायी जाने वाली, कम समय मे पकने वाली, महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इन फसल में वातावर्णीय नाइट्रोजन को पौधों द्वारा ग्रहण करने योग्य बनाने की अदभुत क्षमता होती हैं। जिससे पौधों को कम उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है, और उत्पादन लागत कम हो जाती है। इनकी खेती लगभग सभी राज्यों मे की जाती है। परन्तु महाराष्ट, आन्ध्र प्रदेश,  उत्तर प्रदेश , राजस्थान, मध्य प्रदेश तमिलनाडु तथा उड़ीसा, मूंग तथा उड़द उत्पादन के प्रमुख राज्य हैं। मूंग की खेती के लि‍ए भूमि की तैयारी मूंग की खेती के लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। भूमि में उचित जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चहिये। पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो चलाकर करनी चाहिए तथा फिर एक क्रॉस जुताई हैरो से एवं एक जुताई कल्टीवेटर से कर पाटा लगाकर भूमि समतल कर देनी चाहिए। मूंग की  बीज की बुवाई मूंग की बुवाई 15 जुलाई तक कर देनी चाहिए।  देरी से वर्षा होने पर शीघ्र पकने वाली किस्म की वुबाई 30 जुलाई तक की जा सकती है। स्वस्थ एवं अच्छी गुणवता वाला तथा उपचरित बीज बुवाई के काम लेने चाहिए। वुबाई कतरों में करनी चाहिए। कतरों के बीच दूरी 45 से.मी. तथा पौधों से पौधों की दूरी 10 से.मी. उचित है। मूंग फसल में खाद...

 दलहनी फसल अरहर में एकीकृत रोग प्रबंधन Pigeon pea is an important pulse crop and has major role in food and nutritional security because it is a rich source of protein, minerals and vitamins. The cultivated area and production of pigeonpea have recorded a steady positive growth in the past 50 years, but the mean national productivity has remained unchanged at around 700 kg/ha. To increase its productivity, breeders are trying to develop suitable varieties with subjective spread, growth, duration, disease and pest resistance under varied agro-climatic growing conditions.  Diseases are a continual problem and control measures must be planned for developing sustained production. Each condition that affects plant growth also affects the disease causing organism and the effectiveness of any control measure. In general, conditions that favour rapid, lush plant growth also favor disease development. No single control method is effective in every disease situation. Often a complex of disease interactions defies simple explanations or solutions. Thus to overcome these constraints Integrated disease management (IDM) has been developed for pigeonpea diseases. “Integrated disease management (IDM) involves reducing losses due to diseases to tolerable levels, allowing agriculture to remain productive and profitable while minimizing health and environmental risks. IDM contributes to long-term sustainability by combining the judicious use of management tools”. Integrated disease management for pigeonpea diseases includes...

अरहर के मुख्‍य रोगों तथा कीटों का एकीकृत प्रबंधन Pigeonpea (Cajanus cajan (L.) Millsp.) is one of the most important legume crops of India. It is known as red gram, arhar and tur in the country. It is an important source of proteins (22%) along with carbohydrates, fibre, certain minerals viz., iron, calcium, magnesium, zinc, iodine, potassium and Phosphorous and ‘B’ complex vitamins.  Pigeonpea stalks are also a major source of firewood and live stock feed. India is the world’s largest producer and consumer of pulses including pigeonpea. About 90% of the global pigeonpea area is in India contributing to 93% of the global production. It occupies 4.9 m ha area with 3.1 mt production which accounts for a productivity of 1145 kg/ha; ranking ninth in the world. Kharif is the main growing season of pigeonpea in India and major pigeonpea growing states are Maharashtra, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Karnataka, Gujarat, Andhra Pradesh, Tamil Nadu, Bihar and Chhattisgarh. Cultivation of pigeonpea on bunds in low land areas is becoming popular and profitable among the farmers. Traditional varieties of pigeonpea need about 6 to 9 months to mature, while the improved varieties developed can be harvested in 3-4 months. Both long duration (180 days) and medium duration (130-140 days) genotypes are grown in...

Improved method of Lentil cultivation बिहार में रबी की दलहनी फसलों में मसूर का प्रमुख स्थान है। यह यहाँ की एक बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय दलहनी फसल है जिसकी खेती प्रायः सभी जिलों में की जाती है। बिहार राज्य में मसूर की खेती 1.73 लाख हेक्टेयर तथा इसकी औसल उत्पादकता 935 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। मसूर की खेती प्रायः असिंचित क्षेत्रों मंे धान के फसल के बाद की जाती है। बिहार राज्य में उतेरा विधि से धान की खड़ी फसल में बीज को छिड़कर भी बोया जाता है। रबी मौसम में सरसों एवं गन्ने के साथ अंततः फसल के रूप में लगाया जाता है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने में भी मसूर की खेती बहुत सहायक होती है। उन्नतशील उत्पादन तकनीको का प्रयोग करके मसूर की उपज में बढ़ोतरी की जा सकती है। मसूर की खेती का चुनाव एवं तैयारीः- ऐस मसूर की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है लेकिन दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। खेत को 2-3 बार देशी हल अथवा कल्टीवेटर से जुताईकर मिट्टी को भूरभूरी बना देते है। मसूर की खेती के लिए अनुसंसित उन्नत प्रजातियाँ:- मसूर की छोटे दाने की प्रजातियाँ:- पंत के 639:- यह प्रजाति 135-140 दिन में तैयार हो जाती है। यह जड़ सड़न एवं उकठा रोग के लिए प्रतिरोधी मानी जाजी है। पी0एल0 406:- यह प्रभेद...