07 Mar मधुमक्खियों के रोग एवं शत्रुकी बीमारी एवं उनका निवारण
Bee disease and their prevention एपिस मैलिफेरा मधुमक्खी 1964 में भारतवर्ष में लाई गई थी। पिछले 30 सालों में इसमें बीमारी का कोई भी प्रकोप नहीं देखा गया। परन्तु पिछले 3-4 सालों से मधुमक्खी वंशों में दो ब्रुड बीमारी (सैक ब्रुड एवं यूरोपियन फाउल ब्रुड) का प्रकोप कई प्रान्तों में दिखाई देने लगा है मधुमक्खीयों के रोग: 1 सैक़ ब्रुड : यह बीमारी मधुमक्खियों के शिशुओं में कोष्ठ बन्द होने से पहले आती है। इसमें लारवे (सूण्डी) के बाहर की चमड़ी मोटी हो जाती है और अन्दर के अंग पानी की तरह हो जाते हैं। यह एक विषाणु रोग है। इसका कोई नियन्त्रण नहीं है परन्तु यह रोग शक्तिशाली मधुमक्खी वंशों में कम पाया जाता है। इसके प्रकोप को कम करने के लिए कॉलोनी की साफ-सफाई रखना अति आवश्यक है। 2 यूरोपियन फाउल ब्रुड : यह बीमारी आजकल मधुमक्खी वंशों में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं बिहार में काफी नुकसान कर रही है। यह एक बैक्टीरिया जनित रोग है। इसमें मधुमक्खी के लारवे अण्डे से निकलने के पश्चात् 1-3 दिन के अन्दर ग्रसित हो जाते हैं। शुरू में हल्का पीला, बाद में ब्राउन और अन्त में काले रंग की स्केल बन कर कोष्ठ की तली में पड़े दिखाई देते हैं। इसके नियन्त्रण के लिए टैरामाईसीन 250 मिग़ाम (आक्सीटैट्रासाईक्लीन 250 मि ग्राम750 मिली पानीएक चम्मच शहद...