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7 Major diseases of eggplant crop and their prevention बैंगन की फसल कई प्रकार के हानिकारक रोगों द्वारा प्रभावित होतीहै। अगर इसका समय रहते नियंत्रण ना किया गया तो बाजार मूल्य में गिरावट एवं अत्यधिक हानि का सामना करना पड़ सकता हैं। बैंगन के प्रमुख रोगआर्द गलन, फोमोप्सिस झुलसा ,पत्ती धब्बा रोग, स्कलेरोटीनिया अगंमारी, उक्टा या म्लानी, एवं छोटी पत्ती रोग इत्यादि हैं। अत: बैगन के प्रमुख रोगो की पहचान कर उनका समय पर उपचार अत्यंत आवश्यक है। बैंगन भारत का देशज है। प्राचीन काल से भारत से इसकी खेती होती आ रही है। ऊँचे भागों को छोड़कर समस्त भारत में यह उगाया जाता है। बैंगन वर्तमान मे आलू के बाद दूसरी सबसे अधिक खपत वाली सब्जी है। विश्व में चीन (54 प्रतिशत) के बाद भारत बैंगन की दूसरी सबसे अधिक पैदावार (27 प्रतिशत) वाला देश हैं। यह देश में लगभग 7 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है। बैंगन की फसल कई प्रकार के हानिकारक रोगों द्वारा प्रभावित होतीहै जिनकी पहचान एवं रोकथाम निम्न प्रकार है। बैंगन की फसल प्रमुख रोग एवं उनसे बचाव:- 1. आर्दगलन (डेम्पिंगऑफ) :-  यह रोग पीथियम अफेनिडर्मेटम नामक कवकद्वारा उत्पन्न होता है। यह रोग मुख्यत: पौधषाला में उगे पौधों पर लगता हैं। यह पौधों की दो अवस्थाओं में पाया जाता हैं । पहली अवस्था में पौधों के भूमि से निकलने से पूर्व अथवा तुरन्त पश्चात तथा...

Major Disease of Brinjal crop- symptoms and control बैंगन भारत की कुछ प्रमुख सब्जियों मे से एक हैं। बैंगन की तीन प्रकार की प्रजातियां पाई जाती हैं (1) लम्बे फलवाली - पूसा परपल कलस्टर एवं पूसा कांति इत्यादि (2) नाषपाती आकार के फल एवं (3) गोल फल वाली प्रजातियां जैसे- पूसा पर्पिल राउण्ड, टाइप-3, पंजाब बहार, अर्का नवनीत एवं पन्त ऋतुराज इत्यादि। बैंगन का जन्म स्थान भारत एवं चीन के उष्ण कटिबन्धी प्रदेष ही माने जाते हैं। बैंगन की खेती लगभग पूरे वर्ष भर की जाती हैं।  बैंगन की अच्छी पैदावार हेतु गर्म जलवायु की आवष्यकता होती हैं। तथा जल जल निकास युक्त दौमट मिट्टी इसके उत्पादन हेतु सर्वोत्ताम मानी गयी हैं। बैगन की एक हेक्टयर में पौध रोपण हेतु 400-500 ग्राम बीज की आवष्यकता होती हैं। एवं बीजों को बुवाई से पूर्व थाइराम या केप्टान नामक कवकनाषी दवा की 2 ग्राम प्रति किलों बीज की दर से उपचारित कर नर्सरी में बुवाई करनी चाहिए इसके लिए वर्षाकालीन फसल हेतु फरवरी मार्च, शरदकालीन फसल हेतु जून - जुलाई एवं बसंतकालीन फसल हेतु सितम्बर में नर्सरी में पौधे 30-40 दिन बुवाई के बाद 10-15 सें.मी. ऊंचाई के हो जायें तो कतार से कतार की दूरी 60-70 सेन्टीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 60 से.मी. ध्यान में रखते हुए रोपाई कर देनी चाहिए। आमतौर पर बैंगन...

भारतीय किसान के लिए बैंगन के उत्पादन प्रौद्योगिकी  Brinjal or eggplant (Solanum melongena L.) is an important solanaceous crop grown in India.   In India, it is one of the most common, popular and principal vegetable crops grown throughout the country except higher altitudes. It is a versatile crop adapted to different agro-climatic regions. Brinjal can be grown throughout the year. It is a perennial but grown commercially as an annual crop. The varieties of Brinjal display a wide range of fruit shapes and colours, ranging from oval or egg-shaped to long club-shaped; and from white, yellow, green through degrees of purple pigmentation to almost black.  Seedling raising: Nursery Bed Preparation : Brinjal seeds are sown on nursery beds to raise seedlings for transplanting in the field. Raised beds are necessary to avoid problem of water logging in heavy soils. In sandy soils, however, sowing can be taken up in flat beds. Raised beds of size 7.2 x 1.2 m and 10-15 cm in height are prepared. Thus, ten such beds are sufficient to raise seedlings for planting one hectare area. About 70cm distance is kept between two beds to carry out operations of watering, weeding, etc. The surface of beds should be smooth and well levelled. Well-decomposed FYM or leaf mould may be mixed with the...