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पशुधन पोषण में गैर-पारंपरिक चारा संसाधनों के महत्व का दोहन Livestock farming plays a crucial role in global food security and rural livelihoods. However, ensuring the adequate nutrition of livestock has always been a significant challenge, especially with the rising demand for animal products. Specific feeding system methods created in temperate climates might not be totally suitable for the requirements of growing tropical nations. The fact that feeding systems designed for temperate climates are sometimes impractical and irrelevant in tropical climates is a major barrier to their adoption. The world's supply and demand for conventional feed resources for livestock feeding are significantly out of balance. Increasing the availability of conventional feed resources for the various livestock production and management systems is crucial to managing this supply and demand issue. In this context, non-conventional feed resources have gained importance as alternative sources of nutrition for livestock. These resources offer a sustainable solution to alleviate pressure on traditional feed sources while promoting efficient production systems. Diversifying Feed Resources Traditional feed resources such as grains and forages are finite and susceptible to price fluctuations and environmental factors. Non-conventional feed resources (NCFR) encompass a wide range of materials that are often overlooked but possess significant nutritive value. This includes agricultural by-products like rice bran, wheat bran, and oilseed meals, as well...

Silage: Best source of food management in dairy business साइलेज को पशु पालन व्यवसाय के लिए एक संजीवनी आहार के तौर पर देखा जा सकता है। यह पोषक तत्वों मे हरे चारे के सामान ही होता है। पशु पालन व्यवसाय पर होने वाले कुल खर्च या लागत का लगभग 65 - 70% चारा एवं दाना पर होता है। चारे की लागत को कम करने के लिए और चारे की अधिकता के समय, साइलेज तकनीक से हरे चारे को अचार के रूप में सरंक्षण करना एक लाभकारी विकल्प सिद्ध हो सकता है। इस तकनीक का मुख्य उदेश्य चारे की अधिकता के समय इसे उपयुक्त तरीके से सरंक्षित करके चारे की आवश्यकता को आशा के अनुरूप पूरा करना है। साईलेज विधि से हरे चारे को पोषक तत्वों की हानि के बगैर सरंक्षित किया जाता है ।  इससे वर्तमान में चारे की उपलब्धता को भविष्य के लिए समायोजित करना, आसानी से चारे को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना तथा हरे चारे के प्रबंधन में सहयता मिलती है साइलेज पशुपालन व्यवसाय के लिए बहुत ही पौष्टिक और सस्ता आहार है। इससे हर रोज हरा चारा की कटाई पर होने वाले श्रमिक खर्च और समय की बचत होती है। साइलेज बनाने से चारे के पोषक तत्वों की पाचनशीलता बढ़ती है, इससे पशु स्वस्थ और तनाव मुक्त...

पशुओ में ऋणात्मक और घनात्मक आहार का महत्त्व खनिज, हड्डी के निर्माण से लेकर इलेक्ट्रोलाइट संतुलन तक सभी जैविक प्रक्रियाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेते हैं। खनिज, घनायन और ऋणायन के रूप में आहार में पाये जाते हैं और आहार में खनिजों का सही अनुपात, विशेष रूप से जानवरों के उत्पादन के लिए घनायन और ऋणायन के बीच संतुलन आवश्यक होता है। जानवरों द्वारा ग्रहण किए गए खनिज आयन तेजी से परिसंचरण (रक्त) में पहुच जाते हैं और रक्त के समग्र पीएच को प्रभावित करते हैं। घनायन रक्त को थोड़ा क्षारीय करते हैं (पीएच को बढ़ाते हैं), जबकि ऋणायन रक्त को थोड़ा अम्लीय करते हैं (पीएच में कमी)। पशु आहार में घनायन और ऋणायन के अंतर (DCAD) का तात्पर्य कुछ आहार संबंधी घनायन और कुछ आहार संबंधीऋणायन के योग के बीच संख्यात्मक अंतर से है। प्रमुख घनायन में सोडियम और पोटेशियम आते है और प्रमुख ऋणायन में क्लोराइड और सल्फेट होते है । इस प्रकार, DCAD को (Na + + K+) - (Cl- + S2-) के मिलिइक्युवैलेन्ट का प्रति 100 ग्राम शुष्क पदार्थ के रूप में परिभाषित किया गया है। यदि सूत्र में शामिल आयनों के अवशोषण गुणांक को सम्मिलित करेंगे तो DCADकी गणना में अधिक सटीकता आयेगी। इसका मूल्य (वैल्यू) घनात्मक या ऋणात्मक हो सकता हैं। ऋणात्मक DCAD रक्त में...

Care of newborn dairy calf  नवजात  बछड़ो  की देखभाल या नवजात  बछड़ो का वैज्ञानिक प्रबंधन करके डेरी यवसाय में  फायदा हो कमाया जा सकता हैं । गाय ब्याने के बाद उसके बच्चे को दो तरीके से पाला जा सकता है एक पशु के साथ रखकर और दुसरा बच्चे को दूसरे बच्‍चों के साथ रखकर (वीनिंग). वीनिंग ज्यादा फययेदेमन्द होता है उसको आवश्यकता अनुसार खानपान दिया सकता है और बच्चा मरने पर भी माँ दूध देती रहती है। बच्चा पैदा होने के बाद टाट भूसा रगड़कर अच्छे से साफ़ करना चाहिए। और उसके पिछले पैरो  को पकड़कर उल्टा लटका दे ताकि नाक से स्लेश्मा बाहर निकल जाए अौर वो ठीक से  सांस लेने लगेे। ब्याने के बाद बछड़े की नाल साफ़ कैची से  ३-४ इंच छोड़कर काट दे तथा टिंचर आयोडीन ३-४ दिनों तक लगाते रहे जिससे बछड़े को जॉइंट इल या नैवेल इल नामक बिमारी से बचाया  सके। यह करने के बाद बच्‍चे को तुरन्त कोलस्ट्रम  (खीस) पिलाने का इंतज़ाम करना चाहिए। कोलस्ट्रम  निकालते समय माँ के पिछले थनाे व पिछले भाग का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए पोटेशियम परमेगनेट (लाल दवा) या नीम की पत्ती का पानी गुनगुना करके पिछले भाग व थनाे को अच्छी तरह से साफ़ करना चाहिए इसके बाद स्वच्छ बर्तन मे खिस निकालकर नवजात बछड़े को पिलाये (बछड़े...

अजोला की खेती और इसका देशी दुधाारु जानवरो के चारे के रुप मे ऊपयोग  अब तक अजोला का इस्तेमाल मुख्यत: धान में हरी खाद के रूप में किया जाता था, लेकिन अब इसमें छोटे किसानों हेतु पशुपालन के लिए चारे हेतु बढती मांग को पुरा करने की जबरदस्त क्षमता हैं।  अजोला खेती की प्रक्रिया किसी छायादार स्थान पर पशुओं की संख्या के अनुसार किसान 1.5 मीटर चौडी, लम्बाई आवश्यकतानुसार (3 मीटर) और 0.30 मीटर गहरी क्यारी बनाये। क्यारी को खोदकर या ईंट लगाकर भी बनाया जा सकता हैं। क्यारी में आवश्यकतानुसार सिलपुटिन शीट को बीछाकर ऊपर के किनारों पर मिट्टी का लेप कर व्यवस्थित कर दें। सिलपुटिन शीट को बिछाने की जगह पशुपालक पक्का निर्माण कर क्यारी तैयार कर सकते है। 100-120 किलोग्राम साफ उपजाऊ मिट्टी की 3 इंच मोटी मिट्टी की परत क्यारी में बना देवें। नोट- आज कल बाजार में कृत्रिम अजोला टब भी उपलब्ध हैं, किसान चाहे तो उसे खरीद सकते हैं। अब इसमें 5-10 सेमी तक जलस्तर आ जाये इतना पानी क्यारी में भरते हैं। 5-7 किलो गोबर (2-3 दिन पुराना) 10-15 लीटर पानी में घोल बनाकर मिट्टी पर फैला दे, यदि जानवर गोबर की घोल वाले अजोला को नहीं खाते हैं, तो इसके लिए रासायनिक खाद भी तैयार करके डाला जाता हैं, जैसे- एसएसी- 5 किलो मैग्नीशियम सल्फेट- 750 ग्राम पोटाश- 250 ग्राम इनका मिश्रण तैयार करके,...

Azolla production techniques and benefits of Azolla कृषि उत्पादों की कीमत में अनिश्चितता और कृषि आदानों की तेजी से बढ़ती लागत, भूजल स्तर में गिरावट के कारण कृषि लागत बढ़ गई है, यही कारण है पिछले कुछ वर्षो में पेशे के रूप में खेती के प्रति किसानों का आकर्षण कम हो रहा है। इस समस्या के समाधान के लि‍ए अजोला की खेती बहुत ही लाभकारी हो सकती है। अजोला एक महत्वपूर्ण  बहुगुणी फर्न  है जिसका उपयोग पशुओं, मछली एवं कुक्कुट के चारे के रूप में उपयोग किया जाता है और इसकी कास्त लागत भी बहुत कम (एक रुपय प्रति कि.ग्रा.)  होती है। अजोला  तेजी से बढ़ने वाली एक प्रकार की जलीय फर्न है,  जो पानी की सतह पर छोटे - छोटे समूह में सघन हरित गुच्छ की तरह तैरती रहती है। भारत में मुख्य रूप से अजोला की जाति अजोला पिन्नाटा पायी जाती है। यह  गर्मी सहन करने वाली किस्म है । अजोला की पंखुड़ियो में एनाबिना नामक नील हरित काई के जाति का एक सूक्ष्मजीव होता है जो सूर्य के प्रकाश में वायुमण्डलीय नत्रजन का यौगिकीकरण करता है और हरे खाद की तरह फसल को नत्रजन की पूर्ति करता है। अजोला की विशेषता यह है कि यह अनुकूल वातावरण में 5 दिनों में ही दो गुना हो जाता है। यदि इसे पूरे वर्ष बढ़ने दिया जाये तो 300 टन से भी अधिक सेन्द्रीय पदार्थ प्रति...

Azolla is a boon for livestock राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पश्‍ाुपालन की सदैव महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पशुपालन व्यवसाय लघू और सीमान्त किसानों, ग्रामीण महिलाओं और भूमिहीन कृषि श्रमिकों को रोजगार के पर्याप्त व सुनिश्‍चित अवसर देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ठोस आधार प्रदान करता है। प्राय: मानसून के अलावा पशुओं को फसल अवशेषों एवं भूसे आदि पर पालना पड़ता है जिससे पशुओं की बढोतरी, उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस समस्या से उभरने के लिए पशुपालकों को अजोला फर्न की खेती आश्‍वयक रूप से की जनीत चाहिए। अजोला के गुण:- अजोला जल सतह पर मुक्त रूप से तैरने वाली जलीय फर्न है। यह छोटे छोटे समूह में सद्यन हरित गुक्ष्छ की तरह तैरती है। भारत में मुख्य रूप से अजोला की जाति अजोला पिन्नाटा पाई जाती है। यह काफी हद तक गर्मी सहन करने वाली किस्म है। यह जल मे तीव्र गति से बढवार करती है। यह प्रोईन आव5यक अमीनो अम्ल, विटामिन (विटामिन ए, विटामिन बी-12 तथा बीटा कैरोटीन) विकास वर्धक सहायक तत्वों एवं कैल्श्‍ाियम, फॉस्फोरस, पोटेश्‍ाियम, फैरस, कॉपर एवं मैग्नश्‍ाियम से भरपूर है। इसमें उत्तम गुणवत्ता युक्त प्रोटीन एवं निमनलिखत तत्व होने के कारण मवेश्‍ाी इसे आसानी से पचा लेते है। शुष्क वजन के आधार पर इसमें 20-30 प्रति‍शत प्रोईन, 20-30 प्रति‍शत वसा, 50-70 प्रति‍शत खनिज ततव, 10-13 प्रति‍शत रेश्‍ाा, बायो-एक्टिव पदार्थ...

Azolla: An awesome and amazing Plant अजोला  तेजी से बढ़ने वाली एक प्रकार की जलीय फर्न है, जो  पानी की सतह पर तैरती रहती है। धान की फसल में नील हरित काई की तरह अजोला को भी हरी खाद के रूप में उगाया जाता है और कई बार यह खेत में प्राकर्तिक रूप से भी उग जाता है। इस हरी खाद से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और उत्पादन में भी आशातीत बढ़ोत्तरी होती है।   एजोला की सतह पर नील हरित शैवाल सहजैविक के  रूप में विध्यमान होता है। इस नील हरित शैवाल को  एनाबिना एजोली के  नाम से जाना जाता है जो  कि वातावरण से नत्रजन के  स्थायीकरण के  लिए उत्तरदायी रहता है। एजोला शैवाल की वृद्धि के  लिए आवश्यक कार्बन स्त्रोत  एवं वातावरण प्रदाय करता है । इस प्रकार यह अद्वितीय पारस्परिक सहजैविक संबंध अजोला को  एक अदभुद पौधे के  रूप में विकसित करता है, जिसमें कि उच्च मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध होता है।  प्राकृतिक रूप से यह उष्ण व गर्म उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। देखने में यह शैवाल से मिलती जुलती है और  आमतौर पर उथले पानी में अथवा धान के  खेत में पाई जाती है। पशुओं को अजोला चारा खिलाने के लाभ अजोला सस्ता, सुपाच्य एवं पौष्टिक पूरक पशु आहार है। इसे खिलाने से वसा व वसा...