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मिर्च की न्यूट्रास्युटिकल क्षमता और स्वास्थ्य लाभ Chili is one of the most important vegetable cum spice crops in the world. Green chili is used as vegetable whereas ripe dried fruits as spice because of their pungent test and appealing colour and flavours. Indian chilli is considered world famous for colour and pungency. The North Eastern region of India, is considered as ‘hot spots’ for different land races. Some of them like ‘Bhut Jolokia’, Dalle Khursani recorded among the top pungent type in the world. Many varieties have been developed which differs according to growth habit, size, shape, color, yield, pungency and preference of customer. Chili is a good source of vitamin A and C used in different food and beverage industries. It contains oleoresin which permits better distribution of colour and flavour in foods. The details bioactive compounds present in chilli and their health benefits are discussed hereunder. Bioactive compounds in chilli and their health benefits Capsaicinoids The pungency of chilli is due to capsaicins which belong to capsaicinoides and mainly present in the placenta of the fruit. Dehydrocapsaicin is the second most prevalent capsaicinoid of chilli. The seeds do not contain capsaicin but they occasionally absorb capsaicin because of their proximity to the placenta. The capsaicin has diverse prophylactic and therapeutic uses in Allopathic and...

Red chilli: Harvest and Post Harvest Handling भारत मिर्च का विश्व में सबसे बड़ा निर्माता एवं उपभोक्ता है। इसका योगदान वैश्विक उत्पादन का लगभग २५ प्रतिशत है। इसकी खेती भारत के विभिन्न भागों में होती है और यह सालभर उपलब्ध रहता है। इसकी तुड़ाई ज्यादातर दिसंबर से मार्च तक होती है तथा इसकी आपूर्ति फरवरी से अप्रैल तक चरम पर होती है। इसके रोपाई का मुख्य समय खरीफ का मौसम है।  लाल मिर्च की तुड़ाई: लाल मिर्च की तुड़ाई सवेरे करनी चाहिए.  बारिश या बारिश के पश्चात् तुड़ाई से बचना चाहिए. तुड़ाई के समय फलों के डंठल को मजबूती से पकड़ कर ऊपर के तरफ खींचना चाहिए. इससे फलों का टूटना बचाया जा सकता है. अगर सूखे लाल मिर्च के लिए तुड़ाई करनी है तो यह ध्यान रखना चाहिए की फल अधिक परिपक्व न हो. तुड़ाई विलम्बित नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे मिर्च की गुणवत्ता कम हो जाती है. तुड़ाई उपरांत प्रबंधन: तोड़े हुए फलों को छायादार स्थान पर एकतत्र कर २ से ३ दिनों के लिए रख देना चाहिए जिससे अर्धपक्के फल पक जाए और सभी फलों का एकसमान रंग हो जाये. पकने के लिए २२०C से २५०C तापमान सबसे अच्छा होता है. प्रत्यक्ष धूप से फलों को बचाना चाहिए क्योंकि इससे फलों पर सफ़ेद दाग आ जाते है.    पके हुए फलों को धूप में साफ़ सुथरी जगह जैसे...

मिर्च की खेती के लिए नर्सरी की तैयारी मिर्च को सामान्य रूप से प्रत्यारोपित किया जाता है क्योंकि बहुत बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं और विशेष देखभाल दी जा सकती है, जब पौध नर्सरी में तैयार की जाती है| मि‍र्च नर्सरी के लिए साइट का चयन चयनित क्षेत्र अच्छी तरह से सूखा होना चाहिए, और जल जमाव से मुक्त होना चाहिए उचित धूप होनी चाहिए, नर्सरी को पानी की आपूर्ति पास होनी चाहिए ताकि सिंचाई आसान हो सके। इस क्षेत्र को पालतू और जंगली जानवरों से अच्छी तरह से संरक्षित किया जाना चाहिए। कार्बनिक पदार्थों से भरपूर रेतीली दोमट और दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है ।। स्वस्थ रोपाई के लिए, बीज और मिट्टी को रोगज़नक़ और कीट से मुक्त होना चाहिए। मि‍र्च नर्सरी तैयार करना क्यारी  का आकार: सीडबेड 90 सेमी (3 फीट) चौड़ा, 30 सेमी (1 फीट) जमीन के स्तर से ऊंचा होना चाहिए और 45 सेमी (18 फीट) लंबाई,  एक एकड़ में रोपाई करने के लिए एक एकड़ में 4 क्यारीयो की आवश्यकता होगी। नर्सरी बनाने की प्रक्रिया: जुताई से पहले जमीन की सतह को पहले साफ कर लें। ढेलों और ठूंठ को हटा दें। फिर बीज की तैयारी से पहले देसी हल से 2 बार खेत की जुताई करें बीज बोने के लिए (जैसे 3 फीट × 18 फीट × 1 फीट) के बेड आकार के साथ 4 उठाए गए बेड तैयार करें। फिर...

Leaf curl disease in chilli and its control पर्ण कुंचन या मुरड़ा, मिर्च पौध की भारत में एक विनाशकारी बीमारी। यह बीमारी विषाणु से होता है और सफ़ेद मक्खी द्वारा फैलता है। उत्तर और मध्य भारत में यह बीमारी ज्यादा विनाशकारी थी परन्तु अब यह दक्षिण भारत में भी दर्ज की जाने लगी है। एक बार पर्ण कुंचन बीमारी लगने के बाद मि‍र्च के पोधे की पत्तियां मुड़ने लगती है और पौधों में फल लगना बंद हो जाते है। अगर फल बनते भी है तो विकृत होते है। बहुत छोटी अवस्था में बीमारी लगने पर पौधों का विकास रुक जाता है और एक भी फल नहीं बनते है। यह बीमारी मानसून या खरीफ में लगायी गयी फसलों पर ज्यादा आती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि खरीफ में उच्च तापमान के साथ उच्च आर्द्रता होता है जिसमे सफ़ेद मक्खी की संख्या बहुत बढ़ जाती है। सफ़ेद मक्खी ही विषाणु फैलाती है जो इस बीमारी का कारण है। इस बीमारी से बचने के लिए कई उपाय सुझाये गए है जो की इस प्रकार है: नर्सरी मे स्‍वस्‍थ पौद तैयार करें: जिस पौधशाला में पौधों की तैैयारी की जाती है उसे नायलॉन नेट (४०० मेष साइज) से ढक देना चाहिए। इससे पौधों को सफ़ेद मक्खी के प्रकोप से बचाया जा सकता। पौधों का संरक्षण अति आवश्यक है क्योकि...

मिर्च की पौध की तैयारी व देखभाल मिर्च की खेती पौध तैयार कर के की जाती है। अच्छे और स्वस्थ पौध अच्छी खेती का आधार होती है। पौध की तैयारी पौधशाला या नर्सरी में की जाती है। इसके लिए जगह का चुनाव बहुत मत्वपूर्ण है। पौधशाला ऐसी जगह पर होना चाहिए जहाँ छाँव न हो और पर्याप्त मात्रा में धूप उपलब्ध हो। पौधशाला का क्षेत्र सीमित होना चाहिए ताकि देखभाल आसान हो। पौधशाला की मिट्टी उपजाऊ और दोमट होनी चाहिए जहाँ जल निकासी की व्यवस्था हो। अगर पौधशाला की भूमि ऊंचाई पर हो तो अच्छा है जिससे वर्षा काल में पानी ठहरने का भय न हो साथ ही साथ सिंचाई की व्यवस्था भी होना चाहिए। एक बात का ध्यान रखे की अन्य टमाटर वर्गीय सब्जियां जैसे की टमाटर, बैगन आदि के पौध मिर्च के साथ तैयार न करें। इससे रोगों के प्रकोप का डर कम हो जाता है। पौधशाला का क्षेत्र व आकार : कितने क्षेत्र में मिर्च पौध की तैैयारी करनी है, यह इस बात पर निर्भर करता है की मिर्च की खेती कितने क्षेत्रफल में होनी है। प्रायः एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए ४००-५०० ग्राम बीज संकर किस्मों की चाहिए तथा १-१.५ कि. ग्रााा. बीज अन्य उन्नत किस्मों के लिए चाहिए। सामन्यतः बीजाई क्यारियों में की जाती है जिसकी लम्बाई २-३ मीटर, चौड़ाई १-१.५...

 Nutritional benefits and medicinal uses of chilli मिर्च के फलों के आकार, रंग, स्वाद और तीखेपन में काफी भिन्नता है. यह भिन्नता मिर्च के पोषण सरंचना में भी पायी जाती है जो मिर्च के प्रजातियों पर, किस्मों पर, फसल उगाने के तरीके पर और फलों के परिपक्वता पर निर्भर करता है. साथ ही साथ पोषण तत्वों की भिन्नता तुड़ाई उपरान्त रखरखाव और उसके भण्डारण पर भी निर्भर करता है. यह पाया गया है की विटामिन ए, विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा फलों के परिपक्वता के साथ ही सभी प्रजातियों और किस्मों में बढ़ जाती है. लाल मिर्च में विटामिन बी 6 हरी मिर्च की तुलना में काफी ज्यादा होता है.  विटामिन ए कई लोगों के लिए दुनिया में गाजर विटामिन ए का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत माना जाता है. हालाकि मिर्च में विटामिन ए अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं है परन्तु अल्फा, बीटा और गामा कैरोटीन प्रस्तुत है जिसे मनुष्यों का जिगर विटामिन ए के रूप में तब्दील कर देता है. एक व्यस्क की दैनिक विटामिन ए की आवशयकता को सिर्फ ३-४ ग्राम (लगभग आधा चम्मच) पीसी लाल मिर्च द्वारा पूरा किया जा सकता है. विटामिन ए और प्रोटीन की कमी दुनिया में सबसे ज्यादा विख्यात है. महामारी विज्ञानं के अध्यन से  यह संकेत प्राप्त होता है की विटामिन ए के उच्च सेवन से...

Integrated management of Major diseases of Okra and Chilli 1. भिण्डी में पाऊडरी मिल्डयू अथवा चूर्ण फंफूदी रोग रोग के लक्षण - यह भिण्डी का एक प्रमुख रोग है जो देरी से बोई गई फसल पर अत्यधिक संक्रमण करता है। रोग के लक्षण की शुरूआत पुरानी पत्तियों पर सफेद चकते के रूप में दिखाई देते है। ये चकते कुछ ही दिनो में ऊपर की और अन्य पत्तियों पर फैल जाते है। संक्रमित पौधों की पत्तियों पर सफेद पाऊडर जैसा रोगजनक देखा जा सकता है जो पत्तियों के दानो तरफ तथा पौधे के सभी भाग पर (जड़ के अतिरिक्त) पर देखा जा सकता है बाद में पौधे का ऊपरी भाग पीला पड़कर सूखने लगता है। पौधे की वृद्वि कम जाती है। रोग प्रभाव से दाने सिकुड़े हुये प्राप्त होते हैं। रोगजनक - एरीसाइफी सिकोरेसिएरम रोगचक्र एवं अनुकूल वातावरण - रोग जनक खेत में संक्रमित पादप अवषेषों पर उतरजीवी रहने वाले क्लिस्टोथीसिया से एक मौसम से दूसरे मौसम मे खेत में पहुँचता है। परपोषी पौधो पर कवकजाल विद्यमान रह सकता है जो प्राथमिक निवेश द्रब्य का कार्य करता है । रोग जनक का द्वितीयक प्रसार वातोढ कोनिडियमों द्वारा होता है। रोग के तीब्र विकास के लिये उच्च तापमान, निम्न आर्द्रता एवं वायु प्रवाह के साथ कम वर्षा सर्वाधिक अनूकुल कारक है। इस रोग के विकास के लिये १५ - २८  से०...

13 Major Insect pests and diseases of Chilli and their prevention measures मिर्च के फसल का सबसे घातक तथा ज्यादा नुकसान करने वाली बीमारी है पत्ता मोडक बीमारी। जिसे विभिन्न स्थानों में कुकड़ा या चुरड़ा-मुरड़ा रोग के नाम से जाना जाता है। यह रोग न होकर थ्रिप्स व माइट के प्रकोप के कारण होता है। थ्रिप्स के प्रकोप के कारण मिर्च की पत्तियां ऊपर की ओर मुड़ कर नाव का आकार धारण कर लेती है। माइट के प्रकोप से भी पत्तियां मुड़ जाती है परन्तु ये नीचे की ओर मुड़ती हैं। मिर्च में लगने वाली माइट बहुत ही छोटी होती है जिन्हें साधारणत: आंखों से देखना सम्भव नहीं हो पाता है। यदि मिर्च की फसल में थ्रिप्स व माइट का आक्रमण एक साथ हो जाये तो पत्तियां विचित्र रूप से मुड़ जाती हैं। इसके प्रकोप से फसल के उत्पादन में बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। यहां यह जानना भी आवश्यक है कि माइट कीट नहीं है, इनके नियंत्रण में कीटनाशक उपयोगी सिद्ध नहीं होंगे। इनके लिए माइटीसाइड/ एकेरीसाइड का उपयोग करना होगा। यदि दोनों थ्रिप्स व माइट का प्रकोप एक साथ हुआ है तो कीटनाशक तथा माइटीसाइड का उपयोग एक साथ करना होगा। दोनों के प्रकोप की स्थिति में थ्रिप्स के लिए ट्राइजोफॉस 40 ई.सी. के 30 मि.ली. तथा माइट के लिए प्रोपरजाईट 57...