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भारत में अनुबंध खेती की सम्भावना एवं वस्तुस्थिति Contract farming is defined as an agricultural production that is carried out on the basis of an agreement between a buyer and a farmer with established terms for the production and marketing of agricultural products. In simple terms, contract farming refers to a variety of formal and informal agreements entered into between producers and processors/buyers.  भारत में अनुबंध खेती की सम्भावना एवं वस्तुस्थिति भारतीय कृषि खाद्य प्रणाली तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और उपभोक्ता मांग की हालिया वृद्धि और विविधीकरण संगठित का विस्तार भारत में कृषि प्रसंस्करण और विपणन उद्यमों में बाजार को बढ़ावा देने की क्षमता रखता है और इस परिवर्तन में अनुबंध खेती की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। अनुबंध कृषि को एक कृषि उत्पादन के रूप में परिभाषित किया जाता है जो कि खरीदार और किसान के बीच कृषि उत्पादों के उत्पादन और विपणन के लिए स्थापित शर्तों के साथ एक समझौते के आधार पर किया जाता है। सरल शब्दों में, अनुबंध खेती उत्पादकों और प्रोसेसर/ खरीदारों के बीच किए गए एक विविध औपचारिक और अनौपचारिक समझौते को संदर्भित करती है। इसमें ढीली खरीद व्यवस्था, सरल खरीद समझौता और इनपुट प्रावधान के साथ पर्यवेक्षित उत्पादन, बंधे ऋण और जोखिम कवरेज के साथ शामिल हैं। इस कृषि प्रक्रिया में, एक किसान विशिष्ट कृषि उत्पाद प्रदान...

Modern system of agricultural market कृषि बाजार के वर्तमान स्वरूप में किसानों (उत्पादकों) तथा उपभोक्ताओं के मध्य बिचौलियों (मध्यस्थों) का जरूरत से अधिक दखल होने से किसानों के हितों को भारी नुकसान हो रहा है। किसी भी प्रकार के बाजार में मध्यस्थों की सेवाओं को अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। मगर जब उनका दखल जरूरत से अधिक होने लगता है तब यह नुकसानदायक होता है। आज की स्थिति में कुल लाभ का 50 से 60 प्रतिशत बाजार खर्च तथा मध्यस्थों के भेंट चढ़ जाता है तथा मात्र 40 से 50 प्रतिशत रकम ही किसानों तक पहुंच पाती है। कृषि उपज के संग्रह तथा उनके विक्रय के लिये जिस तरह के सहकारी बाजार व्यवस्था की आवश्यकता है उसका आज भी अभाव महसूस हो रहा है। बाजार व्यवस्था में कई प्रकार की कमियां देखने को मिलती है उदाहरण के लिये नियमित बाजारों में नियमों के अनुसार नीलामी नहीं होती है। कई व्यापारी समूह बनाकर पहले से ही कृषि उत्पादों का भाव निर्धारित कर लेते है। परिणामस्वरूप किसानों को उत्पादों का सही भाव नहीं मिल पाता है तथा वे ठगा सा महसूस करते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में कृषि उत्पाद को बेचने के लिये कई व्यवस्थाएं प्रचलन में हैं । ये सभी वैकल्पिक रूप किसानों को उनकी उपज का किफायती मूल्य प्रदान करवाने और उनको अधिक सक्षम बनाने...