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पराली जलाने के नुकसान और रोकने के उपाय Stubble burning is not only harming the environment, but by doing so the fertility of the land is also decreasing. The innovations can help farmers to manage crop residue effectively by using agricultural machines like Happy Seeder, Rotavator, Baler, Paddy Straw Chopper, etc. पराली जलाने के नुकसान और रोकने के उपाय भारत में वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या है जिसके लिए अनेक कारण जिम्मेवार हैं। इनमें से एक कारण पराली भी है। पता चला है कि देश में फसलों के बचे अवशेषों को जलाने से न केवल वायु गुणवत्ता खराब हो रही है, साथ थी इसकी कीमत इंसानी जीवन के रुप में भी चुकानी पड़ रही है। जो राज्य कभी भारत में हरित क्रांति का लाभ हथियाने में कामयाब रहे थे, वे वर्तमान में उसी की भारी संख्या में कमियों से पीड़ित हैं। पिछले कुछ वर्षों में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसान विशेष-उच्च उपज देने वाली चावल-गेहूं फसल प्रणाली में चले गए हैं, जिसे “कुशल” माना जाता है, लेकिन पर्यावरण और स्वास्थ्य की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। दिल्ली, एनसीआर में विशेष रूप से उत्तर भारत में किसानों द्वारा पराली जलाने को दिल्ली में वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण माना जाता है। पराली जलाना खेत से कृषि अपशिष्ट को हटाने की एक प्रथा है...

Stubble Burning in India: Problems and Mitigation Strategies जहां एक तरफ भारत कोविड-19 से जंग लड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ हम पर्यावरणीय स्थिरता के साथ-साथ वैश्विक स्वास्थ्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी को नहीं भूल सकते। पूरा विश्व एक सांस की बीमारी से जूझ रहा है। इस स्थिति में वैज्ञानिक वायु प्रदूषण में मध्यस्थता में वृद्धि के कारण उत्तर भारत में अधिक श्वसन हानि की भविष्यवाणी कर रहे हैं। जो राज्य कभी भारत में हरित क्रांति का लाभ हथियाने में कामयाब रहे थे, वे वर्तमान में उसी की भारी संख्या में कमियों से पीड़ित हैं। पिछले कुछ वर्षों में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसान विशेष-उच्च उपज देने वाली चावल-गेहूं फसल प्रणाली में चले गए हैं, जिसे "कुशल" माना जाता है, लेकिन पर्यावरण और स्वास्थ्य की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिबंध के बावजूद पराली जलाने की प्रथा अभी भी जारी है। पराली जलाने के कार्य में आर्थिक फसल भागों की कटाई के बाद अवशेषों को जानबूझकर आग लगाना शामिल है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के अनुसार, भारत हर साल औसतन 500 मिलियन टन फसल अवशेष उत्पन्न करता है। इस फसल अवशेष का अधिकांश हिस्सा वास्तव में अन्य घरेलू और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए चारे, ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है। हालाँकि, अभी भी...

Soil Health Management through Waste Management भारत में बड़ी संख्या में फसलें उगाई जाती हैं जिसके चलते प्रतिवर्ष लगभग 100 मिलियन टन फसल अवशेष रीसाइक्लिंग के लिए उपलब्ध होते हैं। इन फसलों के आर्थिक भागों का उपयोग करने के बाद, कुछ फसलों को छोड़कर, अक्सर अवशेषों को जलाकर निपटाया जाता है जिससे इनका ज्यादातर भाग बर्बाद हो जाता है एवं वातावरण प्रदूषित होता है। यह फसल अवशेष पौधों के पोषक तत्वों (क्रमशः 0.5, 0.6 और 1.5 मिलियन टन के लगभग नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश) का एक बड़ा भंडार हैं। घरों तथा खेतों में जो कूड़ा करकट पैदा होता है उसे अगर ऐसे ही इधर-उधर पड़ा रहने दें तो वह एक गंदगी का ढेर बन जाता है, उस पर मक्खी - मच्छर बैठना शुरु कर देते हैं, बदबू आनी शुरू हो जाती है, बीमारियां फैलनी शुरू हो जाती हैं। इस कचरे का बायो - कंपोस्टिंग द्वारा कुशल सेल्युलोलाइटिक सूक्ष्मजीवों के साथ टीकाकरण करके, लाभकारी माइक्रोफ्लोरा (जैसे नाइट्रोजन फिक्सर और फॉस्फेट सॉल्युबलाइज़र) का विकास और संवर्धन कर मिट्टी के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में सुधार किया जा सकता है, हवा एवं पानी के कटाव से मिट्टी की रक्षा की जा सकती है और वातावरण को शुद्ध रखा जा सकता है। बायो कंपोस्टिंग क्या है बायो कंपोस्टिंग जैविक/कार्बनिक खाद बनाने की एक ऐसी विधि है जिसमें सूक्ष्म...

चावल-गेहूं की फसल प्रणाली के परिप्रेक्ष्य में मिट्टी की उर्वरता पर फसल अवशेषों का प्रभाव Crop residues (CRs) are considered a vital natural resource for conserving and sustaining soil productivity. Addition of CRs to soil is a useful tool in maintaining and increasing amounts of soil organic matter. Therefore, soils have significant capacity for C storage and to mitigate atmospheric CO2. As rice-wheat cropping system (RWCS) is one of the world’s largest agricultural production systems, covering an area of ~26 M ha spread over the Indo Gangetic Plains (IGPs) in South Asia and China. Rice and wheat are harnessing enormous soil fertility therefore, to maintain the productivity of this system, replenishment of soil nutrients is necessary. It has not only resulted in mining of major nutrients (NPKS) from soil, created a nutrient imbalance, leading to deterioration in soil quality. Deficiencies of NPK are most extensive. One ton of wheat grains are estimated to remove 24.5, 3.8, and 27.3 kg N, P, and K, respectively, whereas similar production of rice grains removes 20.1 kg N, 4.9 kg P, and 25.0 kg K. Because of agricultural strength of the country, crop residues (CRs) production is also huge. In India, over 500 Mt of agricultural residues are produced every year. Punjab alone produces ~20.8 Mt of...

फसल उत्पादन में अवशेषों का पुनःचक्रण Residues are the by-products of crops plants and other vegetative products of plants are which are organic in nature and has vital importance for agricultural production. The monotonous use of inorganic fertilizers devoid of balanced NPK and micronutrients has resulted in decreasing soil organic carbon (SOC) and fatigued crop production. Soil organic matter (SOM) mostly obtained from organic residues facilitates the aggregation and structural stability of soils and responsible for air-water relationship for root growth and protection of soil from wind and water erosion. The composting, in-situ incorporation or retention as stubble mulch are the common methods of residue management. Residues in general are C-rich materials but contain sufficient amounts of essential plant nutrients. Therefore, their recycling in crop production is an important means of meeting nutrient requirements of the crop plants. Hence, residue application is useful to enhance crop productivity, soil health and profitability both in irrigated and rainfed ecosystems. Scope of Crop residues recycling Indian agriculture is entering a new phase. With time the growing concerns for sustainable agriculture have shown a positive response with the advance of conservation agriculture and it has come as a new paradigm to achieve goals of sustained agricultural production. The residue recycling is more common in conservation agriculture.About 675 Mt crop...

Improve environment with the help of micro-organisms. पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के “परि” उपसर्ग (चारो ओर) और “आवरण” से मिलकर बना है जिसका अर्थ है ऐसी चीजो का समुच्चय जो किसी वयक्ति या जीव धारी को चारो ओर से आव्रत किये हुए है । पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध प्रक्रति से है । अपने परिवेश में हम तरह तरह के जीव जंतु, पेड़- पौधे तथा अन्ये सजीव- निर्जीव वस्तुएँ पाते है । ये सुब मिलकर पर्यावरण की रचना करते है । मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो भागो में विभाजित किया जाता है ,  प्राक्रतिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण । हालांकि पूर्ण रूप से प्राक्रतिक पर्यावरण (जिसमे मानव है हस्तक्षेप बिलकुल न हो ) या पूर्ण निर्मित पर्यावरण (जिसमे सब कुछ मानव निर्मित हो ) कही नही पाए जाते है। यह विभाजन प्राक्रतिक परिक्रियाओ और दशाओ में मानव हस्तक्षेप की मात्रा कि अधिकता और न्यूनता का द्योतक मात्र है। तकनीक, यानि‍ मानव द्वारा आर्थिक उद्देशय और जीवन में विलासिता के लक्ष्यों के प्राप्ति हेतु प्रक्रति के साथ छेड़ छाड़ के क्रियाकल्प, ने प्राक्रतिक पर्यावरण का संतुलन नष्ट किया है ,जिससे प्राक्रतिक व्यवस्था खराब हो गई है । इस तरह कि समस्या परयवर्णीय अवनदन कहलाती है । पर्यावरण प्रदूषण प्रदूषण का अर्थ है वातावरण में दूशकों का घुलना, चाहे उनका जो भी पूर्व-निर्धारित या परस्पर सहमत...

Harmful effects of burning crop residues and management of crop residues भारत में पहले खेती केवल जीविकोपार्जन के लिए किया जाती थी लेकिन धीरे धीरे खेती ने व्ययसाय का रूप ले लि‍या है।  किसान अधिक उपज प्राप्त करने के लिय अंधाधुंध रासायनिक उर्वरक, कीटनाशकों का प्रयोग कर रहा है जिससे मृदा के साथ-साथ पर्यावरण पर भी हानिकारक प्रभाव हो रहा है फसल अवशेष  को जलना भी एक पर्यावरण तथा मृदा प्रदुषण का महत्वपूर्ण कारण है। पिछले कुछ वर्षों में एक समस्या मुख्य रूप से देखी जा रही है कि जहां हार्वेस्टर के द्वारा फसलों की कटाई की जाती है उन क्षेत्रों में खेतों में फसल के तने के अधिकतर भाग खेत में खड़े रह जाते हैं तथा वहां के किसान खेत में फसल के अवशेषों को आग लगाकर जला देते हैं। क्या है फसल अवशेष  फसल अवशेष पौधे का वह भाग होता है जो फसल की कटाई और गहाई के बाद खेत में छोड़ दिया जाता है। भूसा, तना, डंठल, पत्ते व छिलके आदि फसल अवशेष कहलाते हैं। सरसों, गेहूं, धान, ग्वार, मूंग, बाजरा, गन्ना व अन्य दूसरी फसलों से काफी मात्रा में फसल अवशेष मिलते हैं। सबसे ज्यादा फसल अवशेष अनाज वाली फसलों में तथा सबसे कम अवशेष दलहनी फसलों से मिलते हैं। खरीफ सीजन में 500 लाख टन फसल अवशेष का उत्पादन होता...

Management of Crop residues in rice-wheat crop system by adopting conservation agriculture फसल अवशेष बहुत ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं। ये न केवल मृदा कार्बनिक पदार्थ का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, अपितु मृदा के जैविक, भौतिक एवं रासायनिक गुणों में वृद्धि भी करते हैं।  पादप द्वारा मृदा से अवशोषित 25 प्रतिशत नत्रजन व फास्फोरस, 50 प्रतिशत गन्धक एवं 75 प्रतिशत पोटाश जड़, तना व पत्ती में संग्रहित रहते है। अतः फसल अवशेष पादप पोषक तत्वों का भण्डार है। यदि इन फसल अवशेषो को पुनः उसी खेत में डाल दिया जाये तो मृदा की उर्वरकता में वृद्धि होगी और फसल उत्पादन लागत में भी कमी आयेगी।  भारत में प्रतिवर्ष 600 से 700 मिलियन टन फसल अवशेष उत्पादित होता है जिसका एक-चौथाई भाग इन्हीं दोनों फसलों से प्राप्त होता है, परन्तु किसानों को इन फसल अवशेषों का महत्व ज्ञात न होने के कारण वे इनका उचित तरीके से उपयोग नहीं करते।  सारणी 1. धान एवमं गेहूं के फसल अवशेषो की भारत में उपलब्धता एवमं उनमें पोषक तत्वों का स्तर (मिलियन टन)  राज्य   फसल अवशेष उपलब्धता पुनर्चक्रण के लिए फसल अवशेष उपलब्धता पोषक तत्व (नाइट्रोजन+फॉस्फोरस +पोटाश) सामर्थ्य धान     गेहूं   कुल कुल सापेक्ष  पुनर्चक्रण के लिए उपलब्ध रसायनिक उर्वरक  प्रतिस्थापन मान  पंजाब 10.0 18.2 28.2 9.40 0.462 0.154 0.077 हरियाणा 2.5 9.7 12.2 4.07 0.194 0.065 0.032 उत्तरप्रदेश     14.0 27.5 41.5 13.83 0.677 0.226 0.113 बिहार  9.6 5.3 14.9 4.97 0.257 0.086 0.043 पश्चिम बंगाल       16.7 0.1 16.8 5.60 0.308 0.103 0.051 कुल 52.8 60.8 113.6 37.87 1.898 0.634 0.316 (सारकर,1999) फसल अवशेष प्रबंधन विधियाँ  कम्पोस्ट मृदा से निष्कासन अवशेष दहन मृदा में समावेश अवशेष मल्च 1. जैव वर्धक 2. फॉस्फोरस  घुलनकारी सूक्ष्म जीव 3. नाइट्रोजन स्तरीकरण जीवाणु 4 .वर्मी कम्पोस्टिंग  1. अत्यधिक महंगा  2. अत्यधिक श्रमिक आवश्यकता 3....