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Role of nutrition in reproductive health and management of dairy animals Fertility of dairy animals is influenced primarily by a nexus of genetic, environmental, and management indicators, and their complex interactions make it even more difficult to isolate the exact cause of this decline. The physical condition and reproductive capacity of dairy animals depend on nutrition.  Role of nutrition in reproductive health and management of dairy animals दूध और उसके उत्पाद एक पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत हैं और उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में यह ग्लोबल स्तर पर बढ़ेगा, जो बढ़ती वैश्विक जनसंख्या के साथ मेल खाता है। हालांकि आनुवांशिक उन्नति ने पशु उत्पादकता को बढ़ावा दिया है, डेयरी गायों की विफलता में भी गिरावट का सामना किया गया है। डेयरी जानवरों की फर्टिलिटी को प्रमुख रूप से जेनेटिक, पर्यावरणीय, और प्रबंधन संकेतकों की एक संज्ञानबद्ध श्रृंग के द्वारा प्रभावित किया जाता है, और उनके जटिल संवादों के कारण इस गिरावट के सटीक कारण को अलग करना और भी मुश्किल बनाता है। डेयरी जानवरों की शारीरिक स्थिति और प्रजनन क्षमता पोषण पर निर्भर करती है। भोजन में विभिन्न घटक शामिल होते हैं, लेकिन ज्यादातर वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, और छोटे तत्व पशु की प्रजनन प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स रूमेन संगठन के लिए उपकारक होते हैं, जो वॉलेटाइल फैटी एसिड्स (VFA)...

दुधारू पशुओं में टीकाकरण का महत्व  भारतीय किसान सह-व्यवसाय के तौर पर  मुख्यतः पशुपालन पर निर्भर रहता है। पशुधन से स्वच्छ दुग्ध उत्पादन हेतु उसे विभिन्न संक्रामक रोगों से बचाना आवश्यक है।  संक्रामक रोगों की चपेट मे आने से पशुओं के दुग्ध उत्पादन मे कमी होना, गर्भपात, फुराव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है और अगर समय रहते इलाज ना किया जाये तो पीड़ित पशु की मृत्यु भी हो सकती  है। संक्रामक रोगों से बचाव के लिए पशुओं  का टीकाकरण एकमात्र प्रभावी उपाय है जो कि पशुओं की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर उनकी संक्रामक रोगों से रक्षा करता है।  मुँहपका खुरपका रोग - यह एक विषाणुजनित रोग है, जो गाय, भैंस, भेड़,  बकरी एवं  सूकर  प्रजाति को प्रभावित करता है।  आमतौर पर संक्रमित पशु में  तीव्र ज्वर  से ग्रसित होना, मुँह मे  छाले, लार का गिरना, दुग्ध उत्पादन कम होना, गर्भपात होना जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं।   इस रोग से बचाव के लिए  वर्ष मे  दो बार मई तथा नवंबर मे टीकाकरण करवाना चाहिए।  गलघोटू रोग - यह भैंस, गाय, बकरी एवं सूकरों में  होने वाला प्राणघातक जीवाणुजनित रोग है। जो मानसून के दौरान या आर्द्र वातावरण में  पशुओं को संक्रमित करता है। यह जीवाणु भैंसों को गायों के मुकाबले अधिक संक्रमित करता है।  गलघोटू रोग में  पशु को अचानक तेज बुखार आता  है,...

दूधारू पशुओं में बाँझपन की समस्या के कारण एवं उनका निवारण  पिछले कई दशकों से यह पाया गया है कि जैसे-जैसे दूधारू पशुओं के दुग्ध उद्पादन में वृद्धि हुई है वैसे-वैसे प्रजनन क्षमता में गिरावट हुई है । दूधारू पशुओं की दूध उत्पादन की क्षमता प्रत्यक्ष रूप से उनकी प्रजनन क्षमता पर निर्भर करती है । दूधारू पशुओं में बाँझपन की स्थिति पशुपालकों के लिए बहुत बड़े आर्थिक नुकसान का कारण  है । पशुओं में अस्थायी रूप से प्रजनन क्षमता के घटने की स्थिति को बाँझपन कहते है । बाँझपन की स्थिति में दुधारू गाय अपने सामान्य ब्यांत अंतराल  (12 माह) को क़ायम नहीं रख पाती । सामान्य ब्यांत अंतराल को क़ायम रखने के लिए पशु ब्याने के बाद 45-60 दिनों के मध्यांतर मद में आ जाना चाहिए और 100 दिनों के भीतर गाभिन हो जाना चाहिए । यदि पशु ब्याने के 60 दिनों के बाद भी मद (गर्मी) में नहीं आता है तो पशु की पशुचिकित्सक से जांच करानी चाहिए और वह सब उपाए करने चाहिए जिससे की पशु जल्द से जल्द मद में आ जाये । दूधारू पशुओं में बाँझपन की स्थिति के लिए 4 प्रमुख कारण जिम्मेदार है: जन्मजात/ संरचनात्मक/ अनुवांशिक, कार्यात्मक, संक्रामक एवं प्रबंधन से संबंधित । 1. जन्मजात/ संरचनात्मक/ अनुवांशिक बाँझपन: इसके अंतर्गत अंडाशय (ओवरी) का अविकसित होना, अंडाशय में पुटक...