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Role of nutrition in reproductive health and management of dairy animals Fertility of dairy animals is influenced primarily by a nexus of genetic, environmental, and management indicators, and their complex interactions make it even more difficult to isolate the exact cause of this decline. The physical condition and reproductive capacity of dairy animals depend on nutrition.  Role of nutrition in reproductive health and management of dairy animals दूध और उसके उत्पाद एक पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत हैं और उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में यह ग्लोबल स्तर पर बढ़ेगा, जो बढ़ती वैश्विक जनसंख्या के साथ मेल खाता है। हालांकि आनुवांशिक उन्नति ने पशु उत्पादकता को बढ़ावा दिया है, डेयरी गायों की विफलता में भी गिरावट का सामना किया गया है। डेयरी जानवरों की फर्टिलिटी को प्रमुख रूप से जेनेटिक, पर्यावरणीय, और प्रबंधन संकेतकों की एक संज्ञानबद्ध श्रृंग के द्वारा प्रभावित किया जाता है, और उनके जटिल संवादों के कारण इस गिरावट के सटीक कारण को अलग करना और भी मुश्किल बनाता है। डेयरी जानवरों की शारीरिक स्थिति और प्रजनन क्षमता पोषण पर निर्भर करती है। भोजन में विभिन्न घटक शामिल होते हैं, लेकिन ज्यादातर वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, और छोटे तत्व पशु की प्रजनन प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स रूमेन संगठन के लिए उपकारक होते हैं, जो वॉलेटाइल फैटी एसिड्स (VFA)...

महिलाओं के पोषण और आजीविका सुधार में डेयरी की सम्भाब्य भूमिका Dairying is a livelihood option after agriculture in most parts of India. But due to industrialization, privatization, male migration for employment, many women farmers in hilly and natural calamity areas have accepted dairy as their primary option of livelihood. महिलाओं के पोषण और आजीविका सुधार में डेयरी की सम्भाब्य भूमिका भारत में पशुधन क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद का 4.11 प्रतिशत और कुल कृषि सकल घरेलू उत्पाद का 25.6 प्रतिशत योगदान देता है। भारत के लगभग 20.5 मिलियन लोग अपनी आजीविका के लिए पशुधन पर निर्भर हैं और उनमें से 69 प्रतिशत कार्यबल का योगदान महिलाओं द्वारा किया जाता है। अन्य क्षेत्रों के विपरीत, पशुधन क्षेत्र महिलाओं की सशक्तिकरण और आजीविका को सुरक्षित करने का अवसर प्रदान करता है । महिलाएं अन्य संपत्तियों की तुलना में अधिक पशुधन रखती हैं, इसलिए वे उनके संबंध मे ठोस निर्णय ले सकती हैं। भारत को खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में पशुधन क्षेत्र विशेष रूप से डेयरी की महत्वपूर्ण भूमिका है। बढ़ती मानव आबादी और सिकुड़ते भूमि संसाधनों के कारण स्वस्थ भोजन की बढ़ती मांग ने डेयरी को आज की जलवायु संकट के समय में किसानों के लिए जीवन रक्षक विकल्प बना दिया है। 19वीं पशु गणना की तुलना में 20वीं पशुगणना में पशुधन की संख्या में 4.6...

ठण्ड में पशुओं की देखभाल In most parts of our country, the winter season lasts from the month of November to February. The changing weather and cold cause stress on the animals. Due to which their growth, diet, nutrition and production are affected. That's why it is necessary to take proper care of animals at this time.  ठण्ड में पशुओं की देखभाल हमारे देश के अधिकतर भागों में ठण्ड का मौसम नवम्बर से फरवरी माह तक रहता है। बदलते मौसम तथा ठण्ड से पशुओं पर तनाव पड़ता है। जिसके कारण उनके बढ़वार, खान-पान, पोषण एवं उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए इस समय पशुओं की उचित देखभाल करना आवश्यक है। पशु आवास, आहार और स्वास्थ्य का समुचित प्रबंधन कर प्रतिकुल मौसम के प्रभाव का पशुओं के उत्पादन पर असर न पड़ने दें। आवास प्रबंधन - उचित आवास से पशु का दूध बढ़ जाता है, वजन में बढ़ोतरी होती है तथा उनकी बिमारियों में कमी आती है। एक सफल पशुपालक को पशुपोषण एवं प्रजनन के साथ-साथ ठण्ड में पशु आवास प्रबंधन पर निम्न बातों को ध्यान में रखनी चाहिए – आवास की दिशा पूरब-पश्चिम हो, इससे ठण्ड में धूप अन्दर तक आ जाती है तथा गर्मी में धूप को आसानी से अन्दर आने से रोका जा सकता है। आवास का फर्श साफ-सुधरा सुखा रहे। इसके लिए फर्श इस प्रकार...

डेयरी एनालॉग्स डेयरी उत्पादों का विकल्प Products obtained by processing milk of any milch animal are termed dairy products.  However dairy analogues (Soy milk, Tofu, Cheese analogues etc.) are alternate of dairy products. Dairy analogues are cost effective and offer good nutritional value.  Nowadays, people are demanding plant based milk instead of animal milk due to many illness reasons like lactose intolerance, high level of cholesterol in animal milk and hypersensitivity towards milk protein. Plant based analogues of milk are produced from legumes, cereals, seeds etc.  There are many orthodox varieties of milk analogues are present in market like sikhye (cooked rice), Boza (fermented drink from wheat, rye, maize etc.), soy milk. Soy milk is very popular plant based milk analogues. Plant based milk analogues like almond, walnut, soy, coconut milk are formed by using following steps- Milling, Filtration, Incorporation of ingredients, Hear treatment, Homogenization, Packaging and Storage at desirable temperature. In plant based milk analogues we can also add proteins, vitamins and minerals to enhance the nutritional value of product. Fortification of plant based milk is also a great concern because nowadays people are worried about what they eat. Plant based milks Soy milk  Soy milk first came into market in 1940 in China(Hong Kong) (2) .Food and agriculture organization (FAO), confirmed that soy bean plant is oilseed...

Silage: Best source of food management in dairy business साइलेज को पशु पालन व्यवसाय के लिए एक संजीवनी आहार के तौर पर देखा जा सकता है। यह पोषक तत्वों मे हरे चारे के सामान ही होता है। पशु पालन व्यवसाय पर होने वाले कुल खर्च या लागत का लगभग 65 - 70% चारा एवं दाना पर होता है। चारे की लागत को कम करने के लिए और चारे की अधिकता के समय, साइलेज तकनीक से हरे चारे को अचार के रूप में सरंक्षण करना एक लाभकारी विकल्प सिद्ध हो सकता है। इस तकनीक का मुख्य उदेश्य चारे की अधिकता के समय इसे उपयुक्त तरीके से सरंक्षित करके चारे की आवश्यकता को आशा के अनुरूप पूरा करना है। साईलेज विधि से हरे चारे को पोषक तत्वों की हानि के बगैर सरंक्षित किया जाता है ।  इससे वर्तमान में चारे की उपलब्धता को भविष्य के लिए समायोजित करना, आसानी से चारे को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना तथा हरे चारे के प्रबंधन में सहयता मिलती है साइलेज पशुपालन व्यवसाय के लिए बहुत ही पौष्टिक और सस्ता आहार है। इससे हर रोज हरा चारा की कटाई पर होने वाले श्रमिक खर्च और समय की बचत होती है। साइलेज बनाने से चारे के पोषक तत्वों की पाचनशीलता बढ़ती है, इससे पशु स्वस्थ और तनाव मुक्त...

Motivating and Attracting Youth in Agriculture Entrepreneurship भारत मे 25 वर्ष से कम आयु के युवाओं की जनसंख्या लगभग पचास प्रतिशत है और 15 से 29 वर्ष के युवाओं का भारत के सकल राष्ट्रीय आय (GNI) में योगदान लगभग 34% है। कृषि गतिविधियों में उनकी भागीदारी और भी बढ़ाने और रचनात्मक रूप से उन्हें संलग्न करके इस समूह के योगदान को और अधिक बढ़ाने की एक बड़ी क्षमता मौजूद है । भारत सरकार ने इस महत्वपूर्ण समूह पर ध्यान दिया है, जिसे राष्ट्र निर्माण में लगाया जा सकता है, यदि वे कौशल प्रशिक्षण पाकर और कौशल उन्मुख नौकरियों में संलग्न हो सकें। ICAR ने 2015-16 में युवाओं को आकर्षित करने और कृषि में बने रहने के लिये ARYA कार्यक्रम शुरू किया है। इसके अलावा, हाल ही में एक कार्यक्रम, मोटिवेटिंग एंड अट्रैक्टिंग यूथ टू एग्रीकल्चर (MAYA) लॉन्च किया गया है। आईवीआरआई ने 2017-18 के दौरान ग्रामीण युवाओं के बीच कृषि व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए एक युवा सलाह कार्यक्रम भी डिजाइन और कार्यान्वयन किया । उद्यमशीलता से जुड़ाव के लिए युवाओं को प्रेरित करने के लिए इन पहलों को मजबूत करने की आवश्यकता है । यह नौकरियों के लिए भटकने के बजाय कृषि व्यवसाय चलाने में उनकी भागीदारी को बढ़ावा देगा जो देश में विशाल युवा आबादी को अवशोषित करने में मदद करेगा । उद्यमिता...

अजौला: दुधारु पशुओ के लिए एक पौष्टिक आहार  भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि‍ व्यवसाय के सहायक उद्यम के रूप में पशुपालन की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रायः मानसून के अलावा पशुओं को फसल अवशेषों, सूखे चारें आदि खिलाया जाते है। पौष्टिक चारें के अभाव में पशुओं के विकास, उत्पादन तथा प्रजनन क्षमता में कमी आती है जिससे पशुपालक की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस समस्या से उभरने के लिए पशुपालको द्वारा अजौला उगाकर पशुओं को पौष्टिक चारा खिलाया जा सकता है। क्या है अजौला : अजौला एक जलीय फर्न है जो छोटे-छोटे समूह के रूप में सघन हरित गुच्छे की तरह जल की सतह पर मुक्त रूप से तैरती रहती हैं। भारत में इसकी प्रजाति अजौला पिन्नाटा मुख्य रूप से पायी जाती है, जो काफी हद तक अधिक तापमान को सहन कर लेती है। अजौला के गुण : यह तीव्र गति से बढवार करती है, सामान्य अवस्था में यह फर्न तीन दिन में दोगुनी हो जाती हैं। इसमें उत्तम गुणवत्ता युक्त तत्व होनें के कारण आसानी से पच जाती है। इसकी उत्पादन लागत काफी कम होती है तथा औसतन 15 किग्रा प्रति वर्गमीटर की दर से प्रति सप्ताह उपज देती है। यह पशुओं के लिए प्रतिजैविक का कार्य करती है क्योंकि इसमें प्रोटीन, आवश्यक अमीनों अम्ल, विटामिन ए व बी, कैल्सियम, फास्फोरस, पोटेशयम, आयरन, कॉपर तथा...

How to properly nurture newborn calf? पशुपालन व्यवसाय की सफलता के लिये उचित संख्या में उत्तम गुणों वाले बच्चों का विकास आवश्यक है। यही बछड़े बड़े होकर पुराने, बूढ़े तथा अनुत्पादक पशुओं का स्थान लेते है। इस तरह यह सतत प्रक्रिया चलती रहती है एवं उत्पादकता और लाभ दोनों ही बढ़ते हैं। यदि बछड़े पर्याप्त संख्या में ना हों तो अगली पीढ़ी के लिये उच्च उत्पादकता के पशु चयन करने में सफलता नहीं मिल पाएगी । यदि पालन पोषण पर ध्यान नहीं दिया जाए तो बछड़ों की मृत्युदर अधिक हो जाती है साथ ही जो बच्चे बच जाते हैं उनकी वृधिदर कम हो जाती है तथा उत्पादकता घट जाती है। बछड़ों की मृत्युदर सबसे अधिक जन्म से एक माह तक की आयु में होती है। पशुओं की विभिन्न प्रजातियों में इनके कारण भिन्न होते हैं । परन्तु कुछ कारण सभी में एक जैसे होते हैं एवं इनसे बचाव के उपाय भी समान होते हैं। कुछ सावधानियों को ध्यान में रखकर इनका उचित प्रबंधन करने से मृत्युदर में कमी की जा सकती है। बछड़े के पैदा होने का स्थान कैसा हो?   बछड़ों का स्वास्थ इस बात पर निर्भर होता है की उसका जनन स्थल कैसा है। यह बात सभी प्रजातियों  जैसे गाय, भैस, भेड़, बकरी, शुकर आदि पर सामान रूप से लागु होती है। बच्चा देने वाले...