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Intensive gardening of pomegranate अनार बहुत ही पौष्टिक एवं गुणकारी फल है। अनार स्वास्थ्यवर्द्धक तथा विटामिन ए, सी, ई, फोलिक एसिड, एंटी आक्सीडेंट व कई औषधियों गुणों से भरपूर होता है, साथ ही सेहत के लिए भी बहुत लाभदायक होता है। अनार का रस स्वाद से भरा होता है। अनार में कई महत्वपूर्ण पाचक एन्जाइम व तत्व मौजूद रहते है। यह स्वास्थवर्धक तथा लोक प्रिय है। इसके ताजे फलों को सेवन करने से लम्बी कब्जियत की बिमारी भी दूर की जा सकती है। इसलिए बाजार में अनार की मांग लगातार बढ़ रही है। अनार की फसल किसानों को कम समय में अधिक लाभ कमाने का अवसर देती है। इसकी खेती व्यवसायक रूप में की जाती है। इसे एक बार लगा देने के बाद 15 से 20 वर्ष तक फसल ली जा सकती है। अन्य फल वृक्षों की तरह अनार में भी सघन बागवानी की अच्छी संभावनाएँ हैं। अनार की सघन बागवानी (हाई डैनिसिटी आर्चडिंग/ एच. डी. पी.) उच्च उत्पादकता के साथ उच्च गुणवत्तायुक्त अनार उत्पादन की पद्धति है, जिसमें अनार को परम्परागत दूरी से कम दूरी पर लगाये जाते हैं। आम तौर पर देखें तो अनार के सामान्य बागवानी में पौधो को अधिक दूरी 5 से 6 मी पर लगाये जाते हैं, जबकि सघन बागवानी में परम्परागत दूरी  के मुकाबले कम दूरी पर पौधे लगाये...

Improved dense orchard techniques of nutrient fruit lychee लीची एक फल के रूप में जाना जाता है। जिसे वैज्ञानिक नाम लीची चाइनेन्सिस से बुलाते है। इसका परिवार है सोपबैरी। यह ऊपोष्ण कटिबन्धीय फल है, जिसका मूल निवास चीन है। लीची के फल अपने आकर्षक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के कारण भारत ही नहीं बल्कि विश्व में अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुये है। इसमें प्रचुर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है। इसके अलावा प्रोटीन, खनिज पदार्थ, फास्फोरस,  चूना, लोहा, रिबोफ्लेविन तथा विटामिन-सी इत्यादि पाये जाते हैं। इसका उपयोग डिब्बा बंद, स्क्वैश, कार्डियल, शिरप, आर.टी.एस., लीची नट इत्यादि बनाने में किया जाता है। लीची को सघन बागवानी के रूप में सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। परन्तु इसकी खेती के लिए विशिष्ट जलवायु की आवश्यकता होती है जो देश के कुछ ही क्षेत्रों में है। अतः इसकी खेती बहुत ही सीमित भू-भाग में की जा रही है। देश में लीची की बागवानी सबसे अधिक बिहार में की जाती है। इसके अतिरिक्त देहरादून की घाटी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र, झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र तथा छत्तीसगढ के अंबिकापुर क्षेत्र में की जाती है। फलों की गुणवत्ता के आधार पर अभी तक उत्तरी बिहार की लीची का स्थान प्रमुख है। सघन बागवानी सघन बागवानी से तात्पर्य है कि एक निश्चित क्षेत्रफल मे आधुनिक प्रबंधन के सामंजस्य से आधिक से अधिक पौधो का समावेश...

Intensive Horticulture - Today's requirement for growing population भारत मे फलो के उत्पादन के लिये विभिन्न प्रकार की जलवायु उपलब्ध है, लेकिन प्रति व्यक्ति फलो की उपलब्धता एवं उपयोग अन्य विकसित देशो की तुलना मे काफी कम है। हमारे यहां प्रति व्यक्ति फलो की उपलब्धता केवल 85 ग्राम है। कृषि मे बागवानी एक ऐसा क्षेत्र है जिसमे किसान अपनी भूमि से अधिक से अधिक आय प्राप्त कर सकते है। प्रति व्यक्ति फलो की उपलब्धता को बढ़ाने के लिये क्षेत्रफल को बढ़ाना अत्यंत मुश्किल कार्य है। हम उत्पादन को कुछ विशेष प्रबंधन अपनाकर आसानी से बढ़ा सकते है। इसके लिये अधिक उपज देने वाली किस्मो का चयन, सही समय पर कटाई-छंटाई, वृद्धि नियामको का प्रयोग, रोग कीट प्रबंधन एवं सघन बागवानी अपनाना प्रमुख है। सघन बागवानी से तात्पर्य है कि एक निश्चित क्षेत्रफल मे आधुनिक प्रबंधन के सामंजस्य से आधिक से अधिक पौधो का समावेश करते हुए प्रति इकाई क्षेत्रफल से गुणवत्तायुक्त अधिक उत्पादन प्राप्त करना सघन बागवानी का प्रचलन सबसे पहले सेब मे किया गया था जिसमे एक हेक्टेयर क्षेत्रफल मे काॅट-छाॅट एवं प्रबंधन की आधुनिक विधियो को अपनाकर अधिक से अधिक पौधो का समावेश करते हुये उत्पादन कई गुना अधिक प्राप्त किया गया था। वर्तमान मे भारत मे इस पद्धति का उपयोग प्रायः सेब, केला, पपीता, अनार, नीबू वर्गीय फल, अमरूद, लीची, आम,...

High density or Intensive farming of Fruit trees भारतवर्ष में जनसंख्या वृध्दि के साथ साथ फल उत्पादन भी बढ़ रहा है, लेकिन फल उत्पादन में द्वितीय स्थान होने के बावजूद भी प्रति व्यक्ति फलों की उपलब्धता केवल 80 ग्राम प्रतिदिन है। प्रति व्यक्ति फलों की उपलब्धता को बढ़ाने के लिए क्षेत्रफल का बढ़ाना बहुत ही मुश्किल काम है लेकिन फल उत्पादन को हम निम्न तरीके से बढ़ा सकते हैं जैसे अधिक उपज वाली किस्में लगाकर, समय के साथ कटाई, छंटाई व अन्य, फल वृक्षों की रोग तथा किटाणुओं के प्रति प्रबन्धन तथा सघन खेती से भी हम फल उत्पादन बढ़ा सकते हैं। सघन खेती से हमारा अभिप्राय किसी क्षेत्र में फल वृक्षों की संख्या बढ़ाना है जिससे हमें अधिक फल उत्पादन मिल सके। सघन खेती में फल वृक्ष की शाखाओं का क्षेत्र कम करते हैं क्योंकि फल वृक्षों में मुख्यत: बाहरी एक मीटर तक की शाखाओं पर ही फल आते हैं। फल वृक्षों में टहनियों का धन्तव ज्यादा होने के कारण एक मीटर से अन्दर का बहुत क्षेत्र फल रहित रह जाता हैं क्योंकि वृक्ष के अन्दर वाले क्षेत्र में सूर्य की किरणें नहीं पहुंच पाती। इसलिए छोटे वृक्षों में फल उत्पादित क्षेत्र ज्यादा होता है। सघन खेती के लिए ध्यान रखने योग्य बातें छोटी किस्म के फल वृक्षों को लगाना चाहिए फल वृक्षों में कम वृद्वि होनी...