23 Jan Computer Based Simulation Approaches for Integrated Disease Management
Disease forecasting plays an important role in protecting crops by predicting disease risks early and supporting timely management decisions....
Disease forecasting plays an important role in protecting crops by predicting disease risks early and supporting timely management decisions....
Five Major Diseases of Podded Vegetables and their Integrated Disease Management मानव आहार में सब्जियों का विशेष महत्व है। सब्जियों में विटामिन, कार्बोहाड्रेट, प्रोटीन तथा खनिज प्रदार्थ पर्याप्त मात्रा में पाये जाते है जो शरीर को स्वस्थ्य बनाने एवं रोगों से लड़ने में काफी सहायता करती है। फलीदार सब्जियां जैसे सेम, लोबिया इत्यादि, आयरन का एक बड़ा स्रोत है और इसमें कई खनिज तत्व काफी मात्रा में पाए जाते है । यह मांस, पनीर तथा अन्य वसीय खाद्यों के पाचन के दौरान बने अम्लो के निस्प्रभावित करने में सहायक है । इसमें घुलनशील फाइबर कोरोनरी हार्ट रोग को कम करती है एवं फलीदार सब्जियों में कैलोरी कम होने के कारण मोटापा भी कम करने में सहायक होती है । भारत में फलीदार सब्जियों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता केवल 37 ग्राम प्रतिदिन है, इसलिए प्रोटीन की आवश्यकता को पूरा करने में 54 ग्राम प्रतिदिन तक इसके उत्पादन में वृद्धि करने की नितांत आवश्यकता है। फलीदार सब्जियों के उत्पादन को बढाने के लिए यह आवश्यक है कि इसकी वैज्ञानिक खेती की जाय एवं इसमें लगने वाले रोग से बचाए जिससे किसान भाई का काफी नूकसान होता है । इस लेख में फलीदार सब्जियों में लगने वाले रोगों के पहचान, रोग के लिए अनुकूल वातावरण एवं उनका समेकित प्रबंधन विस्तार से दिया जा रहा है । 1. आर्द्रपतन रोग के लक्षण:...
10 Major Diseases of Tomato and Their Integrated Disease Management 1. आर्द्रपतन इस रोग में रोगजनक का आक्रमण बीज अंकुरण के पूर्व अथवा बीज अंकुरण के बाद होता है। पहली अवस्था में बीज का भ्रूण भूमि के बाहर निकलने से पूर्व ही रोगग्रसित होकर मर जाता है । मूलांकुर एवं प्राकूर बीज से बाहर निकल आते फिर भी वे सड़ जाते है दुसरी अवस्था में बीज अंकुर के बाद कम उम्र के छोटे के तनों पर भूमि से सटे तनों पर अथवा भूमि के अंदर वाले भाग पर संक्रमण हो जाता है जिससे जलसिक्त धब्बे बन जाते है और पौधा संक्रमित स्थान से टुट कर गिर जाता है पौधों में गलने के लक्षण भी दिखाई देते है। रोग का प्रकोप नम भूमि मे ज्यादा होता है। रोगजनक:- पिथियम, फाइटोफ्थोरा, स्क्लेरोशियम, फ्यूजेरियम आदि। रोगचक्र एवं अनुकूल वातावरण:- रोगजनक भूमि में या पादप अवशेषों पर काफी समय तक जीवित रहता है। इन रोजनकों के जिवाणु जैसे पोषित कवकजाल स्क्लेरोषियम आदि प्रतिकुल मौसम में भी भूमि में पड़े रहतें है एवं अनकुल वातावरण निकलने पर उग जाते है तथा यही प्राथमिक निवेष द्रव्य का काम करते है। रोग के संक्रमण के लिए 25-30 डिग्री तापमान अनुकूल होता है। 2. अगेती झुलसा रोग का लक्षण नर्सरी में एवं पौध लगाने के बाद खेतो में पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे (कान्संन्ट्रिक रिंगं)...
Integrated disease management of major diseases of Cotton crop based on crop stage कपास एक नकदी फसल हैं। इससे रुई तैयार की जाती हैं, जिसे “सफेद सोना“ कहा जाता हैं। सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक एवं प्राकृतिक फाइबर और तिलहन फसलों में महत्वपूर्ण योगदान है। प्राकृतिक फाइबर की कम से कम 90 प्रतिशत अकेले कपास की फसल से प्राप्त की है। कपास वैश्विक कपड़े का 35 प्रतिशत और भारत में कपड़ों की जरूरत का 60 प्रतिशत योगदान देता है। भारत में सभी चार कपास प्रजातियों अर्थात् देशी कपास (द्विगुणित) गोसिपियम अर्बोरेम, गोसिपियम हेरबसियम, अमेरिकी कपास गोसिपियम हिर्सुटम एवं मिश्र की कपास गोसिपियम बारबडेन्स का व्यावसायिक रूप उत्पादन होता है । यहां करीब 123 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर इसकी खैती होती है। जो भारत की कृषि योग्य भूमि का करीब 7.5 प्रतिशत और वैश्विक कपास क्षेत्र का 36.8 प्रतिशत है। भारतीय कपास का वैश्विक उत्पादन में 23.5 प्रतिशत योगदान है। उत्तर पश्चिम भारत में अधिकांश कपास की व्यावसायिक किस्मेें, गोसिपियम, गोसिपियम अर्बोरेम एवं गोसिपियम हिर्सुटमद्ध से निकाली गई है । कपास की फसल करीब 15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के अंतर्गत है और ज्यादातर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के उत्तर-पश्चिम भारत में खेती की जाती है । भारत में 130 कीट प्रजातियों पाई जाती हैं, उनमे से आधा दर्जन से अधिक आर्थिक महत्व के हैं और विकसित कपास संकर और...