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दुधारू पशुओं में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के उपाय For successful animal husbandry and dairy business, It is important to achieve better health of the animals and good quantity of milk production. To achieve this, lot of care should be taken. Many people give injections and medicines to animals, which are harmful to the health of animals. In such a situation, veterinarians also recommend adopting indigenous and home remedies, which are completely safe for animals. दुधारू पशुओं में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के उपाय सफल पशुपालन और डेयरी व्यवसाय की दो महत्वपूर्ण निशानियां होती हैं, एक तो पशुओं का बेहतर स्वास्थ्य और दूसरा अच्छी मात्रा में दूध उत्पादन ।इस उद्देश्य को हासिल करने के लिये पशुओं का रखरखाव, साफ-सफाई और खान-पान, सेहत और सैर-सपाटे पर काफी ध्यान रखना चाहिए । इसके लिये कई लोग पशुओं को इंजेक्शन और दवायें भी देते हैं, जो पशुओं की सेहत के लिये हानिकारक होता है।ऐसी स्थिति में पशु चिकित्सक भी देसी और घरेलू उपायों को अपनाने की सलाह देते हैं, जो पशुओं के लिये पूरी तरह सुरक्षित होते हैं और इनके लिये पशुपालकों को अलग से खर्चा करने की जरूरत भी नहीं होती ।  ध्यान रखें कि पशुओं को आहार किलाने से पहले कम से कम 4 से 5 घंटे के लिये दाने को भिगो देना चाहिये, ताकि पशुओं को आहार...

अजौला: दुधारु पशुओ के लिए एक पौष्टिक आहार  भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि‍ व्यवसाय के सहायक उद्यम के रूप में पशुपालन की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रायः मानसून के अलावा पशुओं को फसल अवशेषों, सूखे चारें आदि खिलाया जाते है। पौष्टिक चारें के अभाव में पशुओं के विकास, उत्पादन तथा प्रजनन क्षमता में कमी आती है जिससे पशुपालक की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस समस्या से उभरने के लिए पशुपालको द्वारा अजौला उगाकर पशुओं को पौष्टिक चारा खिलाया जा सकता है। क्या है अजौला : अजौला एक जलीय फर्न है जो छोटे-छोटे समूह के रूप में सघन हरित गुच्छे की तरह जल की सतह पर मुक्त रूप से तैरती रहती हैं। भारत में इसकी प्रजाति अजौला पिन्नाटा मुख्य रूप से पायी जाती है, जो काफी हद तक अधिक तापमान को सहन कर लेती है। अजौला के गुण : यह तीव्र गति से बढवार करती है, सामान्य अवस्था में यह फर्न तीन दिन में दोगुनी हो जाती हैं। इसमें उत्तम गुणवत्ता युक्त तत्व होनें के कारण आसानी से पच जाती है। इसकी उत्पादन लागत काफी कम होती है तथा औसतन 15 किग्रा प्रति वर्गमीटर की दर से प्रति सप्ताह उपज देती है। यह पशुओं के लिए प्रतिजैविक का कार्य करती है क्योंकि इसमें प्रोटीन, आवश्यक अमीनों अम्ल, विटामिन ए व बी, कैल्सियम, फास्फोरस, पोटेशयम, आयरन, कॉपर तथा...

दुधारू पशुओं के लिए आहार प्रबंधन  डेयरी व्यवसाय के लिए उत्तम नस्ल के साथ-साथ आहार प्रबंध अति आवश्यक है। उचित आहार प्रबंध से न केवल पशु अधिक दूध देते हैं बल्कि उसकी शारीरिक बढ़वार, प्रजनन क्षमता एवं स्वास्थ्य पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। लाभप्रद डेयरी व्यवसाय हेेतुु पशु को बचपन से लेकर वृद्धि की विभिन्न अवस्थओ, प्रजनन काल एवं उत्पादन काल के दौरान समुचित पोषण उपलब्ध होना चाहिए। बछड़े-बछड़ियों की उनकी आरंभिक अवस्था में वृद्धि एवं मृत्यूू, गर्भकाल में माँ केे आहार प्रबंधन से प्रभावित होता है । बछड़ियों को जन्म के 2 घंटे के अंदर माँ का खीस पिलाना आवश्यक है। खीस की मात्रा निर्धारण बछड़ियों के शारीरिक भार पर निर्भर करता है। जब बछड़ियों को माँ के साथ रखा जाता हैं, तो आवश्यकतानुसार वे माँ से पोषण ले लेती हैं। परन्तु यदि कृत्रिम विधि से पाला जा रहा है, तो इस बात का महत्व और भी अधिक हो जाता है। आरंभिक अवस्था में दूध बच्चे के लिए सम्पूर्ण आहार का कार्य करता है इसलिए उसे समुचित मात्रा में दूध उपलब्ध होना चाहिए। नवजात के पालन - पोषण में सबसे महत्वपूर्ण स्थान खीस पिलाने का है। खीस न मिलने से बछड़े-बछियों में रोगो से लड़ने की क्षमता का विकास नही हो पाता हैै, साथ ही बीमार होने की संभावना बढ़ जाती...