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Plastic bags substitute cow dung pots in nursery प्रकृति अनादि काल से मानव की सहचरी रही है। लेकिन मानव ने अपने भौतिक सुखों एवं इच्छाओं की पूर्ति के लिये इसके साथ निरंतर खिलवाड किया और वर्तमान समय में यह अपनी सारी सीमाओं की हद को पार कर चुका है। स्वार्थी एवं उपभोक्तावादी मानव ने प्रकृति यानि पर्यावरण को पॉलीथीन के अंधाधुंध प्रयोग से जिस तरह प्रदूषित किया और करता जा रहा है उससे सम्पूर्ण वातावरण पूरी तरह आहत हो चुका है।  आज के भौतिक युग में पॉलीथीन के दूरगामी दुष्परिणाम एवं विषैलेपन से बेखबर हमारा समाज इसके उपयोग में इस कदर आगे बढ़ गया है मानो इसके बिना उनकी जिंदगी अधूरी है। वर्तमान समय को यदि पॉलीथीन अथवा प्लास्टिक युग के नाम से जाना जाए तो इसमें कोई अतिषयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि सम्पूर्ण विष्व में यह अपना एक महत्तवपूर्ण स्थान बना चुका है और दुनिया के सभी देष इससे निर्मित वस्तुओं का किसी न किसी रूप में प्रयोग कर रहे है। सोचनीय विषय यह है कि सभी इसके दुष्प्रभावों से अनभिज्ञ हैं या जानते हुए भी अनभिज्ञ बने जा रहे हैं। पॉलीथीन एक प्रकार का जहर हैं जो पूरे पर्यावरण को नष्ट कर देगा और भविष्य में हम यदि इससे छुटकारा पाना चाहेंगे तो हम अपने को काफी पीछे पाएंगे और तब तक...

फलदार पौधों में प्रसार तकनीक Fruit plants, as basic input have vital importance in the development of fruit industry. However, long gestation period of fruit crops calls for utmost care in selection of planting material and adoption of right technology for its mass multiplication, as any mistake committed during the initial establishment of an orchard may result in huge economic loss at a later stage. In commercial fruit production, planting material should be of high quality, uniform and true to the type. Most of the fruit plants do not produce true to the type progeny when propagated through seed. Since fruit crops are cross pollinated, the progeny produced through seeds are not exactly that of parent. Therefore, fruit plants are mostly propagated through vegetative means like cutting, budding, grafting and through specialized vegetative structures. Prior to planting in the field, the plants are kept in a specialized dedicated area called nursery. Therefore, fruit plant nursery is an area where fruit plants are nurtured during their early stage of growth until they are strong enough to be planted in the orchards. Raising of nursery: Following steps should be taken for raising quality nursery plants: The seed sowing should be done at recommended depth and the transplantation of seedlings is carried out at proper spacing for each kind...

Method of preparation of onion nursery हमारे देश में प्याज की खेती मुख्य रुप से रबी की फसल के रुप में की जाती है। अनेक राज्यों प्याज की खेती खरीफ में भी की जाती है। प्याज एक महत्वपूर्ण व्यापारिक फसल है जिसमें विटामिन सी, फास्फोरस आदि पौष्टिक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। प्याज का उपयोग प्रतिदिन सब्जी व मसाले के रुप में किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह सलाद, चटनी एवं अचार आदि के रुप में भी प्रयोग किया जाता है। गर्मी में लू लग जाने तथा गुर्दे की बीमारी में भी प्याज लाभदायक रहता है। प्‍याज की खेती के लि‍ए जलवायु एवं भूमि प्याज की फसल के लिए समशीतोष्ण जलवायु की अवश्यकता होती है। अच्छे कन्द बनने के लिए बड़े दिन तथा कुछ अधिक तापमान होना अच्छा रहता है। कन्द बनने से पहले 12.8-230 सेल्सियस तापमान तथा कन्दों के विकास के लिए 15.5-210 सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है। आमतौर पर सभी किस्म की भूमि में इसकी खेती की जाती है, लेकिन उपजाऊ दोमट मिट्टी, जिसमे जीवांश खाद प्रचुर मात्रा में हो व जल निकास की उत्तम व्यवस्था हो, सर्वोत्तम रहती है। भूमि अधिक क्षारीय व अधिक अम्लीय नहीं होनी चाहिए अन्यथा कन्दों की वृद्धि अच्छी नहीं हो पाती है। अगर भूमि में गंधक की कमी हो तो 400 किलो जिप्सम प्रति हेक्टर की दर...

Seed Priming Techniques for Seed Germination Quality Improvement बुवार्इ के पश्चात खेतों की प्रायोगिक परिसिथतियों में बीजों का उच्च तथा एक समान रुप से उगना अच्छी फसल के लिए आवश्यक है। विषम तापमान तथा वातावरण में बीजों का उगाव अपेक्षाकृत कम होकर एक समान नहीं रह पाता। परिणामस्वरुप उत्तर भारत के सब्जी किसान बसंतकालीन फसल की अगेती बुवार्इ हेतु सामान्य से अधिक बीज-दर अपनाते है। अधिक आय की आशा में कृषक समयपूर्व बुवाई करते है। कमगुणता युक्त बीजों की बुवार्इ उपरांत उगाव प्रतिशत सुधारने में बीज प्राइमिंग की विधि उपयोगी पायी गई है। इस प्रक्रिया में बीजों को उनकी अंकुरण पूर्व चयापचय गतिविधि को आगे बढने तक नियमित जलयुक्त किया जाता है। परंतु सूक्ष्म तरुमूल को प्रस्फुटित होने से रोका जाता है। बीजों की प्राइमिंग हेतु विभिन्न विधिया अपनार्इ जाती है। इसमें बीजों में प्राथमिक मूलांकूरण प्रकि्रया आरंभ की जाती है परंतु मूलांकूर को बीजावरण से बाहर निकालने से रोका जाता है। बीजों को बोने से पूर्व सुषुप्तावस्था से जगाया जाता है। हाइड्रो प्राइमिंग: बीजों को बुवार्इ से पहले, फसल और प्रजाति के गुणानुसार पूर्व निशिचत काल तक जल में भिगोया जाता है। भीगने का समय पुरा होने पर, बीज सतह को वस्त्रों की परत में दबा कर या फिर खुली धूप में सुखाया जाता है। सुरक्षित सीमा की जानकारी होने पर कि‍सान अपना बीज हाइड्रो...