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पपीते के चार प्रमुख रोग और उनका प्रबंधन 1. Foot Rot of papaya  (Pythium aphanidermatum) Foot rot is also known as collars rot or stem rot or root rot and damping off ; is the most serious disease of papaya. In India, the disease appears during the rainy season. It is more common in trees of age 2-3 years. Symptoms In case of nursery plants, damping off symptoms are produced, whereas in adult plants foot rot, collar rot symptoms are produced. Foot rot is characterized by the appearance of water soaked patches on the stem near ground level. These patches enlarge rapidly and girdle the stem, causing rotting of the tissues, which then turn dark brown or black Pathogen Causal organism: Pythium aphanidermatum Mycelium is aseptate, brown and much branched. Sporangia vesicle formed at the time of germination, zoospores 30-40 in number present within the vesicle and are born on spherical Oogonia. They germinate by producing a germ tube. The sexual spores are the oospores, born singly and moderately thick walled. Disease cycle: The pathogen is soil inhabitant and is capable of growing and surviving on the residue left in the soil where it produces abundant oospores in the decaying organic matter. Survival and spread :- Primary infection: Oospores (Pythium) in soil Secondary infection : Zoospore and Seedlings raised in infected soil carry the disease to field Favourable...

Improved cultivation method of Papaya पपीता बहुत ही पौष्टिक एवं गुणकारी फल है। पपीता स्वास्थ्यवर्द्धक तथा विटामिन ए व कई औषधियों गुणों से भरपूर होता है, साथ ही सेहत के लिए भी बहुत लाभदायक होता है. पपीते की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये बहुत कम समय फल दे देता है I पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है। गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं। कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होता है। एक पपीते का वजन 300, 400 ग्राम से लेकर 1 किलो ग्राम तक हो सकता है। पपीता न केवल सरलता से उगाया जाने वाला फल है, बल्कि जल्‍दी लाभ देने वाला फल भी है I पपीते में कई महत्वपूर्ण पाचक एन्ज़ाइम तत्व मौजूद रहते है I यह स्‍वास्‍थवर्धक तथा लोक प्रिय है, इसी से इसे अमृत घट भी कहा जाता है, इसके ताजे फलों को सेवन करने से लम्‍बी कब्‍जियत की बिमारी भी दूर की जा सकती है। इसलिए बाज़ार में पपीते की मांग लगातार बढ़ रही है. पपीते की फसल किसानों को कम समय में अधिक लाभ कमाने का अवसर देती है I इसकी खेती व्यवसायक रूप में की जाती है. इसे एक बार लगा देने पर दो फसल...

Integrated crop disease and pest management in Papaya  पपीता एक प्रमुख उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय फल है। पपीते की  खेती गर्म एवं नम जलवायु में सफलता पूर्वक की जा सकती है। पपीता की अच्छी वृद्धि के लिए 22-26 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त पाया गया है। पपीता पकने के समय शुष्क एवं गर्म मौसम होने से फलों की मिठास बढ़ जाती है। पपीता का उपयोग कच्चे एवं पके फल के रूप में किया जाता है। कच्चे फल का उपयोग पेठा, बर्फी, खीर, रायता, सब्जी आदि बनाने के लिए किया जाता है, जबकि पके फलो से जैम, जैली, नेक्टर एवं कैंडी इत्यादि बनाये जाते हैं । क्षेत्रफल की दृष्टि से पपीता हमारे देश का पाँचवा लोकप्रिय फल है। इसके फलों में विटामिन ए, सी एवं अन्य खनिज लवण भी प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं ।   पपीते की खेती की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । यह सरलता एवं शीघ्रता से पैदा होने के कारण गृहवाटिका एवं व्यवसायिक फसल के रूप में लोकप्रिय होता जा रहा है। पपीते की प्रजातियाँ: पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा, पूसा जायन्ट, पूसा डेलिसियस, पूसा मजेस्टी, पुणे सेलेक्सन 1 एवं पुणे सेलेक्सन 3 आदि।  भूमि चयन एवं पौधशाला प्रबन्धन: पपीता की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली उँची एवं उपजाऊ भूमि होनी चाहिए । साथ ही पौधशाला मे उँची बनाई हुई क्यारियों पर बीजों की...

7 Major diseases of papaya crop and their control पपीते का बिहार की कृषि में प्रमुख स्थान है। पपीते में 20 से अधिक रोगों का आक्रमण होता है, जिनमें कवक एवं विषाणु जनित रोग प्रमुख हैं। बिहार राज्य में सबसे अधिक समस्या विषाणु जनित रोगों की है जिसके कारण किसान पपीते की खेती में कम रूचि ले रहे हैं। पपीते के कवक जनित रोग: 1. आर्द्र गलन (डैम्पिंग आॅफ): यह पौधशाला में लगने वाला गम्भीर रोग है जिससे काफी हानि होती है। इसका कारक कवक पीथियम एफैनिडरमेटम है जिसका प्रभाव नये अंकुरित पौधों पर होता है। इस रोग में पौधे का तना प्रारम्भिक अवस्था में ही गल जाता है और पौधा मुरझाकर गिर जाता है। नियंत्रण के उपाय: पौधशाला में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए एवं इसके लिए पौधशाला की उँचाई आस-पास की सतह से उपर होनी चाहिए जिससे जल जमाव न हो। नर्सरी की मिट्टी का उपचार फार्मेल्डिहाइड के 2.5 प्रतिशत घोल से करने के बाद 48 घंटे तक पाॅलीथीन सीट से ढ़क देना चाहिए। बीजोपचाार कार्बेन्डाजिम अथवा मेटालैक्सिल $ मेन्कोजेब के मिश्रण से 2 ग्राम/किलो बीज की दर से करें। पौधशाला में लक्षण दिखते ही मेटालैक्सिल $ मेन्कोजेब के मिश्रण का 2 ग्राम/लीटर पानी से छिड़काव करंे। 2. तना तथा जड़ सड़न रोग (कालर राॅट): पपीते में तना व जड गलन यानि‍ कालर राॅट रोग में तने के...

Advance Technique of Papaya cultivation पपीता सबसे कम समय में फल देने वाला पेड है इसलिए कोई भी इसे लगाना पसंद करता है, पपीता न केवल सरलता से उगाया जाने वाला फल है, बल्कि जल्‍दी लाभ देने वाला फल भी है, यह स्‍वास्‍थवर्धक तथा लोक प्रिय है, इसी से इसे अमृत घट भी कहा जाता है, पपीता में कई पाचक इन्‍जाइम भी पाये जाते है तथा इसके ताजे फलों को सेवन करने से लम्‍बी कब्‍जियत की बिमारी भी दूर की जा सकती है। पपीते की खेती के लि‍ए जलवायु :- पपीते की अच्‍छी खेती गर्म नमी युक्‍त जलवायु में की जा सकती है। इसे अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर उगाया जा सकता है, न्‍यूनतम 5 डिग्री सेल्सियस से कम नही होना चाहिए लू तथा पाले से पपीते को बहुत नुकसान होता है। इनसे बचने के लिए खेत के उत्‍तरी पश्चिम में हवा रोधक वृक्ष लगाना चाहिए पाला पडने की आशंका हो तो खेत में रात्रि के अंतिम पहर में धुंआ करके एवं सिचाई भी करते रहना चाहिए। पपीते की खेती के लि‍ए भूमि :- जमीन उपजाऊ हो तथा जिसमें जल निकास अच्‍छा हो तो पपीते की खेती उत्‍तम होती है, जिस खेत में पानी भरा हो उस खेत में पपीता कदापि नही लगाना चाहिए। क्‍योकि पानी भरे रहने से...

पपीते की उन्‍नत कि‍स्‍में:  किस्‍में द्वारा विकसित  उपज (किलो/पौधा) विशेषताऐं। पूसा जायंट Pusa Giant भा.कृ.अ.सं,  30-35 यह डायोशियस किस्‍म 1981 मे पूरे भारत के लिए अनुमोदित हुई 1 इसके फलों का आकार बडा (1.5 - 3.5 किलो), सब्‍जी व पेठा बनाने के लिए उपयुक्‍त हॅ। यह सितम्‍बर - अक्‍तूबर माह में रोपण के लिए उत्‍तम है।  पूसा मैजेस्‍टी Pusa Majesty  भा.कृ.अ.सं 40  यह गगयनाडायोशियस किस्‍म 1986 में पूरे भारत के लिए अनूमोदित हुई। पपेन हेतु उपयुक्‍त, विषाणु रोग के प्रति सहनशील तथा सूत्रकृमि के प्रति अवरोधी किस्‍म। सितम्‍बर-अक्‍तूबर माह में रोपण उत्‍तम।  पूसा डेलिसियस Pusa Delicious  भा.कृ.अ.सं  40-45 यह गगयनाडायोशियस किस्‍म 1986 में पूरे भारत के लिए अनूमोदित हुई। फल मध्‍यम आकार के (1-2 किलो), स्‍वादिष्‍ट एवं सुगन्‍धित, चीनी की मात्रा 10 से 13 प्रतिशत। सितम्‍बर-अक्‍तूबर माह में रोपण उत्‍तम।  पूसा नन्‍हा Pusa Nanha  भा.कृ.अ.सं  25-30 यह डायोशियस किस्‍म 1986 मे  भारत के मैदानी व पठार क्षेत्रों के लिए अनुमोदित हुई। यह अत्‍यंत बोनी किस्‍म है भूमि की सतह से 30 से.मी. की ऊचॉई से फलना प्रारम्‍भ। गृह वाटिका एवं सघन बागवानी के लिए उपयक्‍त किस्‍म सितम्‍बर-अक्‍तूबर माह में रोपण उत्‍तम।   पूसा डवार्फ Pusa Dwarf  भा.कृ.अ.सं  40-45 यह डायोशियस किस्‍म 1986 मे  भारत के मैदानी व पठार क्षेत्रों के लिए अनुमोदित हुई।  यह बोनी किस्‍म है भूमि की सतह से 35 से.मी. की ऊचॉई से फलना प्रारम्‍भ। सघन बागवानी के लिए उपयक्‍त किस्‍म सितम्‍बर-अक्‍तूबर माह में रोपण उत्‍तम। ...

 प्रमुख फल वृक्षों का फूलने व फलने का समय   Fruits Planting time Flowering time Fruiting time Mango आम July - August जुलाई - अगस्‍त Dec.-Jan. दिसंबर से जनवरी April-July अप्रैल से जुलाई Guava अमरूद   June-July, September-October जून-जुलाई, सितंबर- अक्‍तुबर   July-August, Feb.-April जुलाई-अगस्‍त और फरवरी- अप्रैल Papaya पपीता Sept.- Oct. सितम्‍बर - अक्‍तूबर July-Aug. जुलाई -अगस्‍त    Feb.-June फरवरी से जून   Lemon नीबू    Feb.-March & whole year फरवरी-मार्च व पूरे साल   July-Sept.& whole year जुलाई-सितंबर व पूरे साल   Grape अंगूर    Feb.-March फरवरी-मार्च   May-June मई-जून   Ber बेर   Sept.-Oct. सितम्‍बर से अक्‍तूबर    Feb.-March फरवरी- मार्च   Banana केला May-June & Sept - Oct मई से जुन व सितम्‍बर से अक्‍तूबर     ...