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1. Introduction Nano-bioformulations are innovative delivery systems that bring together the principles of nanotechnology with biological components to enhance the effectiveness of drugs, biomolecules, and agrochemicals. At the nanoscale (1–100 nm), molecules behave differently compared to their bulk forms, showing enhanced stability, solubility, bioavailability, and targeted delivery. These unique properties make nano-bioformulations a powerful tool in modern science, especially in medicine, agriculture, and biotechnology. The idea of working at the nanoscale was first envisioned by physicist Richard Feynman in 1959, who suggested that manipulating matter at the atomic level could open new scientific possibilities. 2. Types of Nano Bioformulations 2.1 Nanoparticles (NPs): Tiny solid particles (1–100 nm) made of polymers, lipids, or metals that are able to encapsulate drugs or biomolecules, protecting them from degradation and allowing slow, controlled release. Example: PLGA nanoparticles for anticancer drug delivery. 2.2 Nanoemulsions: Stable mixtures of oil and water at the nanoscale, stabilised by surfactants, can improve the solubility of hydrophobic compounds and are widely used in food, agriculture, and cosmetics. Example: Neem oil nanoemulsion for pest control. 2.3 Liposomes: Bilayered phospholipid spherical vesicles can mimic cell membranes and can carry both water-soluble (inside core) and fat-soluble (within bilayer) molecules. Example: Liposomal vitamin C for enhanced absorption. 2.4 Polymeric Nanocarriers: Biodegradable polymers such as chitosan or PLGA can form nanospheres or nanocapsules. They are...

Convent।onal methods of crop pest and disease management फसलों में बीमारीयों तथा कीडों के प्रकोप से उत्‍पादन मे सार्थक कमी होती है। इनके प्रबंधन के लि‍ए रासायनि‍क दवाओं का बहुतायत से प्रयोग कि‍या जाता है परन्‍तू परम्‍परागत तरीके अपनाकर भी फसलों में कीट पतंगों का प्रभावी नि‍यंत्रण कि‍या जा सकता है। इससे रसायनों के अवशिष्ट कूप्ररभाव से बचा जा सकता है।   एक किलो लहसुन कूचल कर 2.5 लीटर पानी में, मिट्टी के बर्तन में तथा 200-250 ग्राम तम्बाकू 2.5 लीटर पानी में मिट्टी के बर्तन में अलग अलग सडायें । सात दिनों के बाद दोनों को छान कर आपस में मिला दें तथा 100 ग्राम सर्फ़ और 95 लीटर पानी में मिलाकर गंधी कीट के खिलाफ प्रयोग करें । आवश्यकतानुसार इसी अनुपात में मिलकर छिड़काव करें । 50 ग्राम लाल सुखा मिर्च पाउडर 13 लीटर पानी में रात को भिगो लें तथा सुबह छान कर धूप में माहू के नियंत्रण के लिए प्रयोग करें । 20 ग्राम हींग 50 लीटर पानी में घोल कर लाल मकड़ी तथा सफ़ेद मक्खी के नियंत्रण के लिए प्रयोग करें । 20 ग्राम कपूर 50 लीटर पानी में घोल कर लाल मकड़ी के नियंत्रण के लिए प्रयोग करें । मक्के के खुखड़ी को मिट्टी के बर्तन (छेदे हुए) में रखकर धक दें तथा इसे दीमक वाली जगह पर मिट्टी में गाड़ दें...

Pest management in crops by ecological engineering फसलों में कीट प्रबंधन के लिए पारिस्थितिक अभियांत्रिकी  हाल ही में एक नए आयाम के रूप में उभरी हे जिसमे मुख्यतया कृषिगत क्रियाओ द्वारा कीटो के निवास स्थान में हेर फेर किया जाता हे, ताकि हानिकारक कीटो का जैविक नियत्रण हो सके । यह विधि आधुनिक काल में प्रचलित अन्य तरीको जैसे संश्लेषित कीटनाशको, किट प्रतिरोधी किस्मो इत्यादि से परे, पारिस्थितिक ज्ञान पर आधारित हे। वर्तमान में बढ़ते हुए कीटनाशी रसायनो के अंधाधुन्द उपयोग से कृषि पारिस्थितिक तंत्र में मित्र कीटो की जैव विविधता में काफी कमी आई हे I इसीलिए जरुरी हे की फसलों में मित्र कीटो की जैव विविधता में बढ़ावा देने वाली क्रियाये अपने जाये जो भविष्य में कृषि क्षेत्र  में सतत  विकास के लक्ष्यो को प्राप्त करने में सक्षम हो सके I पारिस्थितिक आभियांत्रिकी क्या हे? पारिस्थितिक अभियांत्रिकी कीट नियंत्रण की एक पारिस्थितिकीय विधि हे जिसमे पराग या नेक्टर उपलब्ध करने वाली फसलों को मुख्या फसल के किनारो पर तथा मध्य में पाश फसलों, किटकारी पोधो, अंतराशस्य, मिश्रित शस्य को ढकने वाली फसलों के रूप में लगाया जाता हे ताकि यह फैसले अधिक से अधिक संख्या में मित्र कीटो को आकर्षित कर हानिकारक कीटो की समष्टि को कम कर सके।   इस विधि में मित्र कीटो को छोटा पशुधन समझा जाता हे तथा उनके लिए...

Eco-friendly integrated pest management: Dire need of hour कीड़े-मकोड़े फसल की पैदावार को अत्यधिक क्षति पहुँचाते हैं जिससे किसानों का परिश्रम बर्बाद हो जाता है। इन समस्यों के निवारण हेतु किसान रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं । इस बात में कोई संदेह नहीं है कि रासायनिक कीटनाशक कीट प्रबन्धन के सफल हथियार है परन्तु इनके अनेकों दुष्परिणाम भी हैं। जीवनाशी के उपयोग से किसानों के मित्र जीव भी नष्ट हो गए। अधिक जीवनाशी उपयोग करने से जीवनाशी अवशेष फसलों में अधिक दिनों तक बना रहता है जो उपभोक्ता के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है । चना फली भेदक, सेमीलूपर, काला माहूँ जैसे कीटों से बचाव करने के लिए रासायनिक कीटनाशक इण्डोसल्फान का प्रयोग काफी प्रचलित हुआ परन्तु इसी कीटनाशक के विनाशकारी प्रभाव ने केरल के एक गॉंव में तबाही का मंजर पैदा कर दिया था । वहाँ की वर्षा खुशहाली का प्रतीक होने के बजाय विष का स्रोत बन गयी। अब इण्डोसल्फान के प्रयोग पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है । एक अच्छा कीटनाशक वही है जो पर्यावरण के लिए सुरक्षित हो, उचित मूल्य का हो और घातक कीटों का ही नाश करे परन्तु  रासायनिक कीटनाशक इन मापदंडों पर खरे नहीं उतरते हैं। यही कारण है अब वैज्ञानिकों और किसानों का ध्यान समेकित कीट प्रबन्धन कि तरफ है जो कि...

Microbial Pest management of crop diseases  अत्यधिक रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग के दुष्परिणाम अब सामने आने लगे है । किसानों को यह अनुभव होने लगा है कि रासायनिक कीटनाशक अब उन्हीं शत्रु  कीटों पर बेअसर हो रहे है, जिनपर वो रसायन प्रयोग कर पहले छुटकारा पा जाते थे। इसीलि‍ए अब किसान फसल सुरक्षा के अन्य विकल्प तलाशने लगे है | अतः यह बात अब समझ में आने लगी है कि प्रकृति के जितने समीप रहकर खेती की जाय उतनी ही समस्या कम आएगी । सूक्ष्म जैविक कीट प्रबंधन (Microbial Pest Management)  एक प्राकृतिक पारिस्थितिक घटना चक्र है , जिसमे नाशीजीवों के प्रबंधन में सफलतापूर्वक प्रयोग में लाया जा सकता है और यह एक संतुलित, स्थाई और किफायती कीट प्रबंधन का साधन हो सकता है| सुक्ष्जीवियों  का नाशीजीवों के लिए उपयोग सूक्ष्म-जैविक प्रबंधन कहलाता है | यह जैविक प्रबंधन का नया पहलु है, जिसमे नाशीजीवों के रोगाणुओं का उपयोग उनके नियंत्रण के लिए किया जाता है| इसके लिए उपयोग में लाये जाने वाले सूक्ष्मजीवों को जैविक कीटनाशक कहते है,जो वस्तुतः कम संख्या में प्रकृति में उपलब्ध रहते है| व्यवहारिक रूप से सूक्ष्म-जैविक प्रबंधन के लिए कीटों के प्राकृतिक शत्रुओं को ढूढ़कर ,पाल पोसकर (by rearing) और उनकी संख्या में वृद्धि करके उन्हें नाशीजीवों के प्रबंधन हेतु उपयोग में लाया जाता है| प्रकृति में बहुत से ऐसे सूक्ष्मजीव...

Trichogramma parasite: Chemical free pest management factor ट्राईकोग्रामा अतिसूक्ष्म आकार का एक मित्र कीट जीव है, जिन्हें खेतो में आसानी से देख पाना कठिन है परन्तु प्रयोगशालाओं में इन्हें आसानी से देखा जा सकता है । इसका बहुगुणन (Multiplication) प्रयोगशाला में किया जाता है  तथा बाद में इन्हें खेतो में छोड़ दिया जाता है । यह एक प्रकार का अंड-परजीवी मित्र कीट है, जो शत्रु कीट के अण्डों में अपना अंडा डालकर उन्हें अंडावस्था में ही नष्ट कर देते है और शत्रु कीट के अंडे से इनका (मित्र कीट ट्राइकोग्रामा) का वयस्क बाहर आता है, जो पुन: शत्रु कीट में अपना अंडा देता है। इनका जीवन चक्र बहुत छोटा होता है तथा एक फसल अवधि में इसकी अनेक पीढ़ियाँ आ जाती हैं | इस प्रकार इनकी संख्या शत्रु कीट की तुलना में अनेक गुणा बढ़ जाती है, तथा शत्रु कीट अण्डों को नष्ट करता रहता है । आज सम्पूर्ण विश्व में जैविक खेती पर जोर दिया जा रहा है, ट्राइकोग्रामा इसके लिए वरदान सिद्ध हो रहा है, क्योकि ये रसायन-मुक्त कीट प्रबंधन का सटीक उपाय है I विश्व में ट्राइकोग्रामा की 18 प्रजातियों का नाशीजीव प्रबंधन में उपयोग हो रहा है I ट्राइकोग्रामा विधि का प्रयोग रसायन-मुक्त कीट नियंत्रण का एकमात्र उपाय है, जिसमें शत्रु-कीटों का अंडावस्था में ही नाश हो जाता है। फसल की रक्षा...

कारगिल, लद्दाख क्षेत्र में कोडलि‍गं मोथ के प्रबंधन के लिए एक संभावित उपकरण - सामूहिक फंदा (मास ट्रैप)  Mass trapping is just as the name suggests, placement of a large number of traps in an area, which usually have a sticky cardboard bottom baited with pheromone lures. The lure mimics the scent of a female moth attracting male moths to the trap with the result preventing or delaying mating. Mass trapping requires a high density of traps in order to remove enough males to reduce insect damage. Mass trapping has been attempted for a variety of agricultural, orchard and forest pests on scales ranging from a few to thousands of hectares . The majority of mass trapping programs have been used for pest management rather than eradication program. Mass trapping has been tested both as a stand-alone control method and in combination with insecticides and other treatments. It can help to reduce codling moth populations but won’t  eliminate the damage. This method works best where trees are isolated from other trees harboring codling moth (Apple, Pear, English Walnut). The key objective of mass trapping in pest management or eradication is to capture enough insects in the treated area before they reproduce or damage crops, which requires the following:- Deployed traps release pheromone/attractant that is perceived by...