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Importance of fish farming in rural areas For the social and economic upliftment of rural areas, it is necessary to make good use of all available resources. At present, fish farming has been established as a profitable employment in other agriculture related businesses. Protein-rich food can be obtained in the form of fish by utilizing the water of ponds and ponds. Importance of fish farming in rural areas हमारे देश की अधिकतम जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों से है, जो कि अपनी आजीविका कृषि आधारित कार्यों से प्राप्त करती है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी एवं कुपो षण आदि अनेक तरह की परेशानियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में देखी जा सकती है। केवल कृषि से समस्त ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक एवं आर्थिक परेशानियों को दूर किया जाना सम्भव नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान हेतु सभी तरह के उपलब्ध संसाधनों का सदुपयोग आवश्यक है। वर्तमान समय में कृषि संबंधित अन्य व्यवसायों में मछली पालन एक लाभप्रद रोजगार के रूप में स्थापित हुआ है। पोखरों तालाबों के पानी का सदुपयोग कर प्रोटीन युक्त भोजन, मछली के रूप में प्राप्त किया जा सकता है। देश में लगभग हर गाँव में तालाब/ पोखर होते है। जिनका सदुपयोग मछली पालन के लिये किया जा सकता है। इनका स्वामित्व ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, नगर निगम एवं जिला पंचायत के पास होता है। ये...

Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana: Small premium, big protection शुष्क एवं अति शुष्क क्षेत्रो मे कृषि करना किसानो के लिए बड़ा ही जोखिम भरा कार्य है। राज्य मे इस समय किसान खरीफ फसलों जैसे मूंग, बाजरा, तिल, ग्वार इत्यादि की बुवाई कर रहे है। कई किसानो ने क्षेत्र मे बारिश के अनुसार पहले ही बुवाई कर चुके है। इन क्षेत्रो मे प्राकृतिक आपदाओ जैसे कि सूखा पड़ना, बारिश मे अनिश्चितता, आँधी, तूफान, ओले पड़ना आदि से अधिक सामना करना पड़ता है। राज्य के किसानों की उन्नति के लिए सरकार द्वारा काफी सारी योजनाएं चलायी जा रही है। फसल को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना आरंभ की गई है ।  इस योजना का उदेशय वर्षा प्रभावित क्षेत्रो मे किसानो की आय सुनिश्चित रखने के साथ साथ आधुनिक कृषि प्रणाली के उपयोग को प्रोत्साहित करना है। इस योजना के अंतर्गत किसानों को किसी प्राकृतिक आपदा के कारण फसल में होने वाली बर्बादी पर बीमा कवर प्रदान किया जाता है जिसके द्वारा किसानो को होने वाली आर्थिक क्षति की भरपाई हो जाती है । इस योजना मे खरीफ फसलों के बीमा आवेदन किसान 31 जुलाई तक कर सकते है ।  क्या रहता है प्रीमियम अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा 8800 करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत किसानों को खरीफ...

Pollution reduction and wealth creation from agricultural crop wastes with the help of briquetting plant ब्रिकेटिंग प्लांट वानिकी, औद्योगिक और कृषि अपशिष्ट जैसे विविध अवशेषों को जैव-ईंधन के ठोस ब्लॉकों में परिवर्तित करने के लिए एक पर्यावरण के अनुकूल तकनीक है। बेलनाकार आकार के ब्रिकेट्स (white coal) उच्च यांत्रिक दबाव के साथ बाइंडर रहित तकनीक का उपयोग करके बनाए जाते हैं। इसके लिए किसी बाइंडर या केमिकल की जरूरत नहीं है। जैव-ब्रिकेट गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन (Non- renewable fossil fuels) के विकल्प हैं और इसका उपयोग कई विनिर्माण उद्योगों जैसे भट्टों, भट्टियों और बॉयलरों में किया जा सकता है। ब्रिकेटिंग का अर्थ थोक घनत्व वाले कच्चे माल के आकार को कॉम्पैक्ट रूप में कम करना है। जिससे परिवहन, जलने और इसके कैलोरी मान को भी बढ़ाना आसान हो जाता है। पारिस्थितिक जैव-ब्रिकेट्स प्रदूषण मुक्त हैं और हरित परिवेश में भी योगदान करते हैं जो योग्य विदेशी मुद्रा को बचाते हैं। बायो-ब्रिकेट्स के पीछे का आदर्श वाक्य वेल्थ फ्रॉम वेस्ट (Wealth from Waste) है। ग्रामीण भारत में कृषि और प्रदूषण से जुडी हुई दो समस्याएं ग्रामीण भारत में नीचे दी गयी दो प्रमुख समस्याएं हैं - ग्रामीण भारत में, ईंट भट्टे, वायु, जल और मृदा प्रदूषण के सामान्य स्रोत हैं। ईंट भट्टों में कच्ची ईंटों को सेंकने के लिए कोयले (Black Coal) का प्रयोग किया जाता है जैसे...

बिहार में कृषि आधारित उद्योगों की संभावनायें कृषि उत्पाद की अधिक मात्रा गाँवों में उपलब्ध होती है। अतः कृषि उत्पाद पर आधारित उद्यम का विकास गाँवों में सुनिश्चित होना चाहिए। कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ गाँवों के बेरोजगार ग्रामीण युवकों को नये-नये उद्यम लगाने के लिए प्रेरित करना भी आवश्यक है। इस प्रकार के प्रयास बेरोजगार ग्रामीणों को गाँवों से पलायन रोकने तथा अलगाव एवं अन्य सामाजिक बुराईयों में भी कमी आयेगी। कृषि उत्पादों में अनेक ऐसे उद्योग है जिन्हें ग्रामीण एवं बेरोजगार बन्धु अपनाकर अपना सामाजिक-आर्थिक स्थिति बेहतर बना सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कई तरह के उद्योग लगाये जा सकते हैं जैसे मशरुम उद्योग, मधुमक्खी पालन, मछली पालन, पौलटरी फार्म उद्योग, जैविक गुड़ उद्योग, आलू एवं सब्जी आधारित उद्योग, डेयरी उद्योग, लकड़ी का फर्नीचर, फल एवं फूल उद्योग आदि जिसमें प्राथमिक कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण कर उनका मूल्यवर्धन किया जा सकता है। सरकार कृषि आधारित उद्योग में लगने वाली लागत पर सब्सिडी भी दे रही है। गेंहूं प्रमुख खाद्य पदार्थों में एक है तथा आर्थिक विश्लेषण से Kkr हुआ है कि इसका प्रारंभिक बाजार मूल्य, उत्पादन मूल्य के लगभग ही होता है। पारिवारिक उपभोग आवश्यकता से ज्यादा पैदावार अनेक ऐसे उत्पाद तैयार किये जा सकते हैं जिनमें ज्यादा से ज्यादा मुनाफा मिल सकता है। विशेषकर बेकरी उद्योग, दलिया उद्योग, सूजी...

FPO A boon for farm women empowerment and livelihood security भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान सर्वविदित है | एक आंकलन के अनुसार आर्थिक रूप से सक्रिय महिलाओं में से  80 प्रतिशत महिलाओं की जीविका कृषि सम्बन्धी गतिविधि पर निर्भर करती है | हाल में ही, (मई, 2020) फिक्की लेडीज ऑर्गनाइज़ेशन ने देश में महिलाओं के कृषि में योगदान के समीक्षा कर उनके सशक्तिकरण के लिए महिलाओं आधारित कृषक उत्पादन संघ की वकालत की है | उनके अनुसार यह महिलाओं को  वाजिब हक तथा मान्यता प्रदान करने में मददगार होगी | देश के बहुसंख्यक कृषक (लगभग 86%) लघु एवं सीमांत श्रेणी के अंतर्गत आते हैं, जिनके पास औसतन 1.10 हैo से कम जोत है | आने वाले वर्षों में सामाजिक व्यवस्था के कारण इनके संख्या में वृद्धि होने के कारण तथा भूमि की जोत घटना अवश्यसंभावी है | इन श्रेणी के कृषक परिवारों  को खेती के समय होने वाले चुनौतियों जैसे तकनीक, उच्च गुणवत्ता के बीज, उर्वरक, रसायन, कीटनाशक और समुचित वित्त की समस्याओं के कारण जीवन निर्वाह और भी चुनौती पूर्ण होगा | इस का असर परिवार के पुरुष एवं महिला  सदस्य पर पड़ना लाजिमी है | वर्तमान सामाजिक परिवेश में महिला कृषकों  की आर्थिक स्वतन्त्रता लगभग न के बराबर है, तथा वे आर्थिक आवश्यकताओं के पूर्ति हेतु पूर्ण रूप से घर के...

Beekeeping a means of successful employment मधुमक्खी अर्थात मौन हमारे जीवन में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से लाभदायक है। प्रत्यक्ष रुप से इसके पालन से हमें मधु, मोम, रॉयलजैली या राजअवलेह, मधुमक्खी गाेंद आदि बहुमूल्य पदार्थों की प्राप्ति होती है। अप्रत्यक्ष रुप से ये फसलों में पर-परागण की क्रिया करके उनकी पैदावार में वृध्दि कर देती है। हमारे प्रदेश में भूमि के जोत प्राय: बहुत ही छोटे हैं। इसके पालन में अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस व्यवसाय को किसान, बागवान एवं खेतिहर मजदूर भी आसानी से कर सकते हैं। इसमें शारीरिक परिश्रम अधिक न होने से ग्रामीण महिलाएं भी अपने घरेलू कार्य के साथ कर सकती है। इसमें समय भी अधिक नहीं देना पड़ता है। मधुमक्खी पालन में मौन पेटिका एवं अन्य उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए इस व्यवसाय के साथ दूसरे अन्य छोटे उद्योगों को भी बढ़ावा मिलता है। अधिक पूंजी लगने के कारण बेरोजगार नवयुवक भी इसे अपना रोजगार का साधन बना सकता है। मौन या मधुमक्‍खी  मधुमक्खी की चार प्रजातियों में से सिर्फ दो प्रजातियों को ही पाला जा सकता है। भारतीय मधुमक्खी और इटालियन मधुमक्खी। ये दोनो स्वभाव से ही पालतू हैं। भारतीय मधुमक्खी इस मौन का पालन युगों से हमारे देश में परम्परागत मौनगृहों में होते आ रहा है। परन्तु अब लकड़ी के बने आधुनिक मौनगृहों में...

मशरूम की खेती: अतिरिक्त आय का साधन मशरुम एक प्रोटीनयुक्त खाद्य फसल है। इसमें शुष्क भार के आधार पर 28 से 30 प्रतिशत तक उच्च श्रेणी का प्रोटीन होता है। मशरुम खाने से प्रोटीन की कमी से होने वाले रोगों का बचाव होता है। प्रोटीन के अतिरिक्त इसमें विटामिन-सी एवं विटामिन-बी काॅम्प्लेक्स ग्रुप में थाइमिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन, फोलिक एसिड़ तथा कोबालएमिन (बी- 12) है जो कि गर्भवती महिलाओं व बच्चों के लिये आवश्यक है। इसमें लवण जैसे सोडियम, पोटेशियम, फाॅस्फोरस व लोहा प्रचुर मात्रा में होते हैं। मशरुम खाने से खुन की कमी के ‘एनिमिक’ रोगियों को लाभ होता है। सोडियम तथा पोटेशियम का अनुपात अधिक होने के कारण यह उच्च रक्तचाप को भी दूर करता है। मशरुम एक कम कैलोरी देने वाला भोजन है, इसलिये यह मोटापा दूर करने के लिये भी उपयोगी है। इसमें शर्करा तथा स्टार्च नहीं होने के कारण इसे ‘‘डिलाइट आफ डाइबिटिक” कहा जाता है। यह मधुमेह रोगियों के लिये एक वरदान है। इसमें काॅलेस्ट्राॅल बिल्कुल नहीं होता तथा अर्गोस्ट्राॅल होता है जो कि पाचन क्रिया के दौरान विटामिन-डी में बदल जाता है। अतः यह हृदय रोगियों के लिये भी अच्छा भोजन है। राजस्थान में मशरुम की 2 प्रजातियों की खेती आसानी से व्यवसायिक स्तर पर की जाती है। इन प्रजातियों की खेती का उपयुक्त समय निम्नानुसार हैः- सफेद बटन...

Role of A1 and A2 cow Milk in Farmer’s Income गाय के दूध को प्रकृति का सबसे अच्छा भोजन माना गया है, जो उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और सूक्ष्म पोषक तत्वों सहित एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रदान करता है। दूध कैल्शियम और प्रोटीन का एक बड़ा स्रोत है। दूध हमारे लिए मूल और मुख्य भोजन है। गाय के दूध को माँ के दूध के बाद सबसे अच्छा स्रोत कहा जाता है। गाय के दूध के लाभों में आसान पाचन, विकासको बढ़ावा देना, कैल्शियम और आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व प्रदान करना शामिल है। गाय के दूध में 87.7% पानी, 4.9% लैक्टोज (कार्बोहाइड्रेट), 3.4% वसा, 3.3% प्रोटीन और 0.7% खनिज होते है । दूध में कुल प्रोटीन का 82% केसिन और शेष 18% सीरम प्रोटीन होता है ।  केसिन दूध में पाए जाने वाले प्रोटीन का सबसे बड़ा समूह है जो की चार प्रकार का होता है α-S1, α-S2, β‐1(बीटा केसिन)और k-केसिन (कापा केसिन) । केसिन का महत्वपूर्ण कार्य कैल्शियम और फास्फोरस जैसे खनिजों के अवशोषण की क्षमता को बढाना है । A1 और A2 दूध क्या है ? दूध में लगभग 85% पानी होता है। शेष 15% लैक्टोज, प्रोटीन, वसा और खनिज होते है । बीटा-केसिन दूध में कुल प्रोटीन सामग्री का लगभग 30% होता है । बीटा-केसिन दो प्रकार का होता है A1 बीटा-केसिन और A२...